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Reading: श्री गणेश सूक्तम् (ऋग्वेद)
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SanatanWeb.com > Blog > गीतकाव्य > सूक्तम् > श्री गणेश सूक्तम् (ऋग्वेद)
सूक्तम्

श्री गणेश सूक्तम् (ऋग्वेद)

Sanatani
Last updated: जनवरी 24, 2026 7:13 अपराह्न
Sanatani
Published: जनवरी 24, 2026
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श्री गणेश सूक्तम् (ऋग्वेद)

गणपति सूक्तम्(Sri Ganesha Suktam) ऋग्वेद के द्वितीय मण्डल में पाया जाता है और इसे ऋग्वेद संहिता 2.23 के रूप में संदर्भित किया जाता है। यह सूक्त भगवान गणेश की स्तुति के लिए प्रसिद्ध है और वैदिक काल से ही गणपति उपासकों द्वारा इसका पाठ किया जाता रहा है।

Contents
  • श्री गणेश सूक्तम् (ऋग्वेद)
  • गणपति सूक्तम् का महत्व
  • श्री गणेश सूक्तम् की उपासना और लाभ
  • श्री गणेश सूक्तम् – Sri Ganesha (Ganapati) Suktam

गणपति सूक्तम् का महत्व


गणपति सूक्तम्(Sri Ganesha Suktam) वैदिक परंपरा में अद्भुत स्थान रखता है क्योंकि यह गणपति शब्द के सबसे प्रारंभिक उल्लेखों में से एक है। इसे ऋषि गृत्समद द्वारा रचित माना जाता है। इस सूक्त में गणपति को देवताओं के अधिपति, बुद्धि के दाता, और विघ्नों के नाशक के रूप में वर्णित किया गया है।

श्री गणेश सूक्तम् की उपासना और लाभ

गणपति सूक्तम् का नित्य पाठ करने से—

  1. बुद्धि और विवेक की वृद्धि होती है।
  2. विघ्नों का नाश होता है और कार्यों में सफलता मिलती है।
  3. आध्यात्मिक उन्नति होती है और साधना में सहायता मिलती है।
  4. संस्कृत भाषा एवं वैदिक उच्चारण में सुधार आता है।

श्री गणेश सूक्तम् – Sri Ganesha (Ganapati) Suktam

आ तू न॑ इन्द्र क्षु॒मन्त᳚-ञ्चि॒त्र-ङ्ग्रा॒भं स-ङ्गृ॑भाय ।
म॒हा॒ह॒स्ती दक्षि॑णेन ॥ १ ॥

वि॒द्मा हि त्वा᳚ तुविकू॒र्मिन्तु॒विदे᳚ष्ण-न्तु॒वीम॑घम् ।
तु॒वि॒मा॒त्रमवो᳚भिः ॥ २ ॥

न॒ हि त्वा᳚ शूर दे॒वा न मर्ता᳚सो॒ दित्स᳚न्तम् ।
भी॒म-न्न गां-वाँ॒रय᳚न्ते ॥ ३ ॥

एतो॒न्विन्द्रं॒ स्तवा॒मेशा᳚नं॒-वँस्वः॑ स्व॒राजम्᳚ ।
न राध॑सा मर्धिषन्नः ॥ ४ ॥

प्र स्तो᳚ष॒दुप॑ गासिष॒च्छ्रव॒त्साम॑ गी॒यमा᳚नम् ।
अ॒भिराध॑साजुगुरत् ॥ ५ ॥

आ नो᳚ भर॒ दक्षि॑णेना॒भि स॒व्येन॒ प्र मृ॑श ।
इन्द्र॒ मानो॒ वसो॒र्निर्भा᳚क् ॥ ६ ॥

उप॑क्रम॒स्वा भ॑र धृष॒ता धृ॑ष्णो॒ जना᳚नाम् ।
अदा᳚शूष्टरस्य॒ वेदः॑ ॥ ७ ॥

इन्द्र॒ य उ॒ नु ते॒ अस्ति॒ वाजो॒ विप्रे᳚भि॒-स्सनि॑त्वः ।
अ॒स्माभि॒-स्सुतं स॑नुहि ॥ ८ ॥

स॒द्यो॒जुव॑स्ते॒ वाजा᳚ अ॒स्मभ्यं᳚-विँ॒श्वश्च᳚न्द्राः ।
वशै᳚श्च म॒क्षू ज॑रन्ते ॥ ९ ॥

ग॒णाना᳚-न्त्वा ग॒णप॑तिं हवामहे
क॒वि-ङ्क॑वी॒नामु॑प॒मश्र॑वस्तमम् ।
ज्ये॒ष्ठ॒राज॒-म्ब्रह्म॑णा-म्ब्रह्मणस्पत॒
आ नः॑ शृ॒ण्वन्नू॒तिभि॑स्सीद॒ साद॑नम् ॥ १० ॥

नि षु सी᳚द गणपते ग॒णेषु॒ त्वामा᳚हु॒र्विप्र॑तम-ङ्कवी॒नाम् ।
न ऋ॒ते त्वत्क्रि॑यते॒ कि-ञ्च॒नारे म॒हाम॒र्क-म्म॑घवञ्चि॒त्रम॑र्च ॥ ११ ॥

अ॒भि॒ख्यानो᳚ मघव॒न्नाध॑माना॒न्त्सखे᳚ बो॒धि व॑सुपते॒ सखी᳚नाम् ।
रणं᳚ कृधि रणकृत्सत्यशु॒ष्माभ॑क्ते चि॒दा भ॑जा रा॒ये अ॒स्मान् ॥ १२ ॥

गणपति सूक्तम् वेदों में गणेश जी के प्राचीनतम उल्लेखों में से एक है। यह स्पष्ट करता है कि गणपति न केवल विघ्नहर्ता हैं, बल्कि ज्ञान, वाणी और बुद्धि के अधिपति भी हैं। जो व्यक्ति श्रद्धा और विधि-विधान से इस सूक्त का पाठ करता है, उसे जीवन में सफलता और आध्यात्मिक शांति प्राप्त होती है।

यदि आप इसे संपूर्ण वैदिक पद्धति से पढ़ना चाहते हैं, तो उचित उच्चारण और छंदानुसार इसका अभ्यास करना चाहिए, जिससे अधिकतम लाभ प्राप्त हो सके।

रात्रि सूक्तम्
गो सूक्तम्
विष्णु सूक्तम्
श्री दुर्गा अथर्वशीर्षम्
श्रद्धा सूक्तम्
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