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SanatanWeb.com > Blog > गीतकाव्य > आरती > शनि देव आरती
आरती

शनि देव आरती

Sanatani
Last updated: जनवरी 21, 2026 5:44 अपराह्न
Sanatani
Published: जनवरी 21, 2026
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शनि देव(Shani Dev Aarti) हिंदू धर्म के प्रमुख देवताओं में से एक माने जाते हैं, जिन्हें न्याय के देवता और कर्मों के फल देने वाले के रूप में पूजा जाता है। शनि देव को नवग्रहों में से एक माना जाता है, और ये ज्योतिष शास्त्र में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। शनि देव को भगवान सूर्य और उनकी पत्नी छाया का पुत्र कहा जाता है। इन्हें “शनैश्चर” भी कहा जाता है, जिसका अर्थ है धीरे-धीरे चलने वाला। शनि का प्रभाव व्यक्ति के जीवन में सुख-दुःख, अच्छे-बुरे कर्मों का प्रतिफल देता है।

Contents
    • शनि देव आरती का महत्व
  • आरती श्री शनि देव जी की

शनि देव की कृपा प्राप्त करने के लिए, शनि देव की आराधना और पूजा-अर्चना की जाती है। खासतौर पर शनि देव की आरती का विशेष महत्व होता है। ऐसा माना जाता है कि जो व्यक्ति श्रद्धा और विश्वास से शनि देव की आरती करता है, उसे शनि की साढ़ेसाती और ढैया के प्रभाव से मुक्ति मिलती है। साथ ही शनि देव की कृपा से जीवन के सभी कष्ट दूर होते हैं।

शनि देव आरती का महत्व

  1. कष्टों का निवारण: शनि देव को कर्मों के आधार पर फल देने वाले देवता माना जाता है। उनकी आरती करने से जीवन में आने वाले सभी कष्ट और बाधाएं दूर होती हैं।
  2. शनि दोष से मुक्ति: ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, शनि देव की आराधना से शनि दोष, साढ़ेसाती और ढैया के प्रभाव को कम किया जा सकता है।
  3. धन, समृद्धि और सफलता: शनि देव की कृपा से धन-धान्य की प्राप्ति होती है, व्यवसाय में सफलता मिलती है, और समृद्धि का अनुभव होता है।
  4. न्याय और धर्म का पालन: शनि देव को न्यायप्रिय देवता माना जाता है। उनकी आरती और पूजा करने से व्यक्ति के जीवन में न्याय, सत्य और धर्म का मार्ग प्रशस्त होता है।

शनि देव की आरती शनि देव की महिमा का गुणगान करती है। इसे शनिवार के दिन करना विशेष रूप से लाभकारी माना जाता है। नीचे शनि देव की आरती प्रस्तुत है:

आरती श्री शनि देव जी की

जय जय जय श्री शनि देव भक्तन हितकारी,सूर्य पुत्र प्रभुछाया महतारी ॥ जय जय जय शनि देव. ।।

वक्र दृष्टि चतुर्भुजा धारी, नीलाम्बर धार नाथ गज की असवारी ॥ जय. ।।

श्याम अंग क्रीट मुकुट शीश राजित दिपत है लिलारी, मुक्तन की माल गले शोभित बलिहारी ॥ जय. ॥

मोदक मिष्ठान पान चढ़त हैं सुपारी, लोहा तिल तेल उड़द महिषी अति प्यारी ॥ जय. ॥

देव दनुज ऋषि मुनी सुमिरत नर नारी, विश्वनाथ धरत ध्यान शरण हैं तुम्हारी ।। जय जय जय श्री शनि देव. ॥

ॐ जय जगदीश हरे आरती
मां नर्मदाजी की आरती
पित्तर जी की आरती
कामाक्षा माँ की आरती 
वैष्णो देवी की आरती
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