शिव ताण्डव स्तोत्रम्‌ Shiv Tandav Stotra

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शिव ताण्डव स्तोत्रम्‌: एक अद्वितीय महाकाव्य

शिव ताण्डव स्तोत्रम्‌ का परिचय

शिव ताण्डव स्तोत्रम्‌ एक अद्वितीय और प्रभावशाली स्तोत्र है जो भगवान शिव की महिमा का गुणगान करता है। यह स्तोत्र संस्कृत भाषा में लिखा गया है और इसके रचनाकार रावण माने जाते हैं, जो लंका के राजा थे। इस स्तोत्र में शिव के ताण्डव नृत्य का वर्णन है, जो उनके रौद्र रूप का प्रतीक है। ताण्डव नृत्य भगवान शिव का एक अद्वितीय नृत्य है जो सृष्टि की रचना, संरक्षण और संहार को दर्शाता है। शिव ताण्डव स्तोत्रम्‌ का पाठ करने से व्यक्ति के जीवन में अद्भुत सकारात्मक परिवर्तन आ सकते हैं और इसे धार्मिक दृष्टिकोण से भी अत्यधिक महत्वपूर्ण माना जाता है।

शिव ताण्डव स्तोत्रम्‌ का महत्व

शिव ताण्डव स्तोत्रम्‌ की रचना की पृष्ठभूमि बहुत ही रोचक और धार्मिक मान्यताओं से भरी हुई है। रावण, जो भगवान शिव के बड़े भक्त माने जाते हैं, ने इस स्तोत्र की रचना उस समय की थी जब उन्होंने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कठोर तपस्या की थी। शिव ताण्डव स्तोत्रम्‌ में रावण ने अपने अद्वितीय काव्य कौशल और भक्ति को प्रकट किया है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि वह न केवल एक महान योद्धा थे बल्कि एक उत्कृष्ट कवि भी थे।

भक्ति और साधना में उपयोग

शिव ताण्डव स्तोत्रम्‌ का पाठ भगवान शिव के भक्तों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। इसका नियमित पाठ करने से व्यक्ति के जीवन में अद्भुत सकारात्मक परिवर्तन आ सकते हैं और यह उनकी भक्ति और साधना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। भगवान शिव के प्रति अपनी भक्ति को प्रकट करने के लिए शिव ताण्डव स्तोत्रम्‌ का पाठ करना एक उत्कृष्ट माध्यम है।

धार्मिक अनुष्ठानों में महत्व

शिव ताण्डव स्तोत्रम्‌ को विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों और पर्वों में भी गाया जाता है। विशेषकर महाशिवरात्रि के पर्व पर इसका विशेष महत्व है, जब भक्तजन भगवान शिव की पूजा और अर्चना करते हैं। इस स्तोत्र का पाठ करने से शिवभक्तों को भगवान शिव की विशेष कृपा प्राप्त होती है।

शिव ताण्डव स्तोत्रम्‌ की संरचना

छंदों की विशेषता

शिव ताण्डव स्तोत्रम्‌ कुल 17 छंदों में विभाजित है, जिनमें भगवान शिव की महिमा का विस्तृत वर्णन है। प्रत्येक छंद में शिव के विभिन्न रूपों और गुणों का अद्वितीय वर्णन किया गया है। यह स्तोत्र शिव की शक्ति, सौंदर्य, और उनके ताण्डव नृत्य की ऊर्जा को प्रस्तुत करता है।

संस्कृत भाषा की महिमा

यह स्तोत्र संस्कृत भाषा में लिखा गया है, जो अपने आप में अत्यंत समृद्ध और प्राचीन भाषा है। संस्कृत में लिखे गए इस स्तोत्र की भाषा अत्यंत प्रभावशाली और प्रेरणादायक है, जो पाठकों को भगवान शिव के प्रति अपनी भक्ति को और अधिक गहन बनाने में सहायक है।

शिव ताण्डव स्तोत्रम्‌ के लाभ

मानसिक शांति और सकारात्मक ऊर्जा

शिव ताण्डव स्तोत्रम्‌ का नियमित पाठ करने से मानसिक शांति और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। इसके शब्दों और ध्वनि तरंगों का मन और मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव पड़ता है, जिससे व्यक्ति तनावमुक्त और मानसिक रूप से स्वस्थ रहता है।

आध्यात्मिक विकास

यह स्तोत्र व्यक्ति के आध्यात्मिक विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसके पाठ से व्यक्ति की आत्मिक शक्ति बढ़ती है और उसे आत्म-साक्षात्कार की दिशा में अग्रसर होने में सहायता मिलती है।

शिव ताण्डव स्तोत्रम्‌ के पाठ की विधि

शिव ताण्डव स्तोत्रम्‌ का पाठ करने के लिए प्रातःकाल का समय अत्यंत शुभ माना जाता है। इसे शुद्ध और शांत स्थान पर बैठकर, भगवान शिव की प्रतिमा या चित्र के सामने, धूप-दीप जलाकर करना चाहिए। पाठ करते समय ध्यान केंद्रित रखना अत्यंत आवश्यक है। प्रत्येक छंद का उच्चारण स्पष्ट और शुद्ध रूप से करना चाहिए। पाठ के दौरान भगवान शिव के रूप का ध्यान और उनकी महिमा का स्मरण करना चाहिए।

शिव ताण्डव स्तोत्रम्‌ और विज्ञान

ध्वनि तरंगों का प्रभाव

शिव ताण्डव स्तोत्रम्‌ के पाठ के दौरान उत्पन्न ध्वनि तरंगों का हमारे मस्तिष्क और शरीर पर गहरा प्रभाव पड़ता है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी इसका महत्व स्वीकार किया गया है। यह हमारे मस्तिष्क को शांति और संतुलन प्रदान करता है।

योग और ध्यान में उपयोग

योग और ध्यान के अभ्यास में भी शिव ताण्डव स्तोत्रम्‌ का विशेष महत्व है। इसके पाठ से ध्यान की गुणवत्ता में सुधार होता है और योग साधना में भी यह सहायक होता है।

संगीत और नृत्य में उपयोग

आधुनिक समय में भी शिव ताण्डव स्तोत्रम्‌ का विशेष महत्व है। इसे विभिन्न संगीत और नृत्य प्रस्तुतियों में भी शामिल किया जाता है। इसके माध्यम से कलाकार भगवान शिव की महिमा का गुणगान करते हैं और दर्शकों को मंत्रमुग्ध करते हैं।

प्रेरक वक्तव्यों में उपयोग

शिव ताण्डव स्तोत्रम्‌ के छंदों का उपयोग प्रेरक वक्तव्यों और भाषणों में भी किया जाता है। इसके प्रभावशाली शब्द और अर्थ व्यक्ति को प्रेरित और प्रोत्साहित करते हैं।

Shiv Tandav
शिव ताण्डव स्तोत्रम्‌ Shiv Tandav Stotra 2

शिव ताण्डव स्तोत्रम्‌ अर्थ सहितShiv Tandav Stotra Lyrics With Meaning

जटाटबीगळूज्जलप्रबाहपावितस्थले
गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजङ्गतुङ्गमालिव्लाम्‌।
डमइमइमइमन्निनादवइमर्वयं
चकार चण्डताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम्‌॥ १ ॥
अर्थ:
जिन्होंने जटारूपी अटवी (वन) से निकलती हुई गङ्गाजीके गिरते हुए
प्रवाहोंसे पवित्र किये गये गलेमें सर्पोकी लटकती हुई विशाल मालाको
धारणकर, डमरूके डम-डम शाब्दोंसे मण्डित प्रचण्ड ताण्डव (नृत्य) किया,
वे शिवजी हमारे कल्याणका विस्तार करें ॥ १ ॥

जटाकटाहसम््रमश्रसन्निलिम्पनिर्झरी-
विलोळलवीचिवल्लरीविराजमानमूर्दनि ।
धगद्धगद्धगज्ज्वलल्ललाटपड्डपावके
किशोरचन्द्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम ॥ २॥
अर्थ:
जिनका मस्तक जटारूपी
कड़ाहमें वेगसे घूमती हुई गङ्गाकी चञ्चल तस्ङ्ग-लताओंसे सुशोभित हो रहा
है, ललाटामि धक्‌-धक्‌ जल रही है, सिरपर बाल चन्द्रमा विराजमान हैं, उन
(भगवान्‌ शिव) में मेरा निरन्तर अनुराग हो ॥ २ ॥

धराधरेन्द्रनन्दिनीविलासनन्धुनन्धुरस्फुरदिगन्तसन्ततिप्रमोदमानमानसे ।
कृपाकटाक्षधोरणीनिरुद्धदुर्धरापदि
क्वचिद्दिगम्बरे मनो विनोदमेतु वस्तुनि ॥ ३ ॥
अर्थ:
गिरिराजकिंदोरी पार्बतीके विलासकारोपयोगी शिरोभूषणसे खमस्त॒दिशार्ओको प्रकाशित हेते देख जिनका मन आनन्दित हो रहा हैः जिनकी निरन्तर छपाद्टिसे कठिन आपत्तिका भी निवारण हो जाता है; एसे किंसी दिगम्बर तततवम मेरा मन विनोद करे ॥ २ ॥

जटाभुजङ्गपिङ्ठलस्फुरत्फणामणिप्रभा-
कदम्बकुङ्कमद्रवप्रलिप्तदिग्वधूमुखे ।
मदान्धसिन्धुरस्फुरत्त्वगुत्तरीयमेदुरे
मनो विनोदमद्भुतं बिभर्तु भूतभर्तरि ॥ ४ ॥
अर्थ:
जिनके जटाजूटवर्ती भुजड़मोंके फणोंकी मणियोंका फैलता
हुआ पिङ्गल प्रभापुञ्ज दिशारूपिणी अङ्गनाओंके मुखपर कुङ्कमरागका अनुलेप कर रहा है, मतवाले हाथीके हिलते हुए चमडेका उत्तरीय जतला (नाह)
धारण करनेसे स्निग्धवर्ण हुए उन भूतनाथमें मेरा चित्त अद्भुत विनोद करे ॥ ४ ॥

सहस्त्रलोचनप्रभृत्यशेषलेखरेखरप्रसूनधूलिधोरणीविधूसराङ्ध्रिपीठ भू: ।
भुजङ्गराजमालया निबद्धजाटजूटक:
श्रियै चिराय जायतां चकोरबन्धुशेखरः ॥ ५ ॥
अर्थ:
जिनकी चरणपादुकाएँ इन्द्र आदि समस्त देवताओंके [ प्रणाम
करते समय ] मस्तकवर्ती कुसुमोंकी धूलिसे धूसरित हो रही हैं; नागराज (शेष) के हारसे बँधी हुई जटावाले वे भगवान्‌ चन्द्रशेखर मेरे लये चिरस्थायिनी सम्पत्तिके साधक हों ॥ ५॥

ललाटचत्वरज्वलद्धनञ्जयस्फुलिङ्गभा-
निपीतपञ्चसायकं नमन्निलिम्पनायकम्‌ ।
सुधामयूखरेखया विराजमानशेखरं महाकपालि सम्पदे शिरो जराङमस्तु नः ॥६॥

अर्थ: जिसे रुखाट-वेदीपर प्रज्वलति हुई अगनिके स्फुलिङ्गके तेजते कामदेवको नष्ट कर । ` डाला थाः जिसे इन्द्र नमस्कार किया करते ई; सुधाकरकी कलासे सुशोभित मुक्रुटवाखा वह ( श्नीमहादेवजीका ) उत वि्ार ङ्लाटवाा जटिक मस्त हमारी सम्पत्तिका साधक हो ॥ ६ ॥

करारभालपद्धिकाधगद्धगद्ध करालभालळपड़िका धगब्डगन्डगज्ज्वलद्वनञ्जयाहुतीकृतप्रचण्डपञ्चसायके ।
धराधरेन्द्रनन्दिनीकुचाग्रचित्रपत्रक
प्रकल्पनैकशिल्पिनि त्रिलोचने रतिर्मम ॥ ७॥

अर्थ: जिन्होंने अपने विकराल भालपट्टपर धक्‌-धक्‌
जलती हुई अमिमेँ प्रचण्ड कामदेवको हवन कर दिया था, गिरिराजकिशोरीके
स्तनोंपर पत्रभङ्ग-रचना करनेके एकमात्र कारीगर उन भगवान्‌ त्रिलोचनमें मेरी
धारणा लगी रहे ॥ ७॥

नवीनमेघमण्डलीनिरूब्हदुर्धरस्फुरत्कु
हूनिशीथिनीतमः प्रबन्धनन्डकन्धरः ।
निलिम्पनिर्झरीधरस्तनोतु कृत्तिसिन्धुरः
‘कलानिधानबन्धुरः श्रियं जगदधुरन्धरः ॥ ८॥ .
अर्थ:
जिनके कण्ठमें नवीन मेघमालासे घिरी हुई
अमावस्याकी आधी रातके समय फैलते हुए दुरूह अन्धकारके समान श्यामता
अङ्कित है; जो गजचर्म लपेटे हुए हैं, वे संसारभारको धारण करनेवाले चन्द्रमा
[ के सम्पर्क ] से मनोहर कान्तिवाले भगवान्‌ गङ्गाधर मेरी सम्पत्तिका विस्तार
करें ॥ ८ ॥

प्रफुल्लनीलपङ्कजप्रपञ्चाकालिमप्रभा-
वलम्बिकण्ठकन्दलीरुचिप्रबन्धकन्धरम्‌ ।
स्मरच्छिदं पुरच्छिदं भवच्छिदं मखच्छिदं
गाजच्छिदान्धकच्छिदं तमन्तकच्छिदं भजे ॥ ९॥
अर्थ:
॥ जिनका कण्ठदेश सिठे हुए. नीर कमलसमृहकीं स्याम प्रभाका अनुकरण करनेवाली हरिणीकी-सी छबिवारे चिहृसे सुशोभित हे तथा जो कामदेव, निपुर, भव (संसार ); दक्षयज्ञ, हाथी; अन्धकासुर ओर यमराजका भी उच्छेदन करनेवाठे हे उन मै भजता द| ९।

अखरवसर्वमङ्गलाकलाकदम्बभञ्जरी
रसप्रवाहमाधुरी विलम्भणामधुत्रतम्‌ ।
खरान्तङ़ पुरान्तकं भवान्तकं मखान्तकं
गजान्तकान्धकान्तकं तमन्तकान्तकं भजे ॥१०॥
अर्थ:
जो अभिमानरहित पार्वतीकी कलारूप कदम्बमञ्जरीके मकरन्द्खोतको बढ्ती हुई माधुरीके पान करनेवाले मधुप हैं तथा कामदेव, त्रिपुर, भव, दक्ष-यज्ञ, हाथी, अन्धकासुर और यमराजका भी अन्त करनेवाले हैं, उन्हें में भजता । जिनके हूँ ॥ १० ॥

जयत्वदभविभ्रमभ्रमद्ुजङ्गमशधसदविनिगंमतकरमस्फुरत्करालभालहव्यवाट्‌ ।
धिमिद्धिमिद्धिमिद्ध्वनन्प्रदङ्गतुङ्गमङ्ल` ध्वनिक्रमप्रबतिंतप्रचण्डताण्डवः शिवः ॥११॥
अर्थ:
जिनके हूँ ॥ १० ॥ मस्तकपर बड़े वेगके साथ घूमते हुए भुजङ्गके फुफकारनेसे ललाटकी भयंकर अग्नि क्रमशः धधकती हुई फैल रही है, धिमि-धिमि नजते हुए मृदङ्गके गम्भीर मङ्गल घोषके क्रमानुसार प्रचण्ड ताण्डव हो रहा हे, उन भगवान्‌ शाङ्करकी जय हो ॥ ११ ॥

दषद्विचित्रतरपयोथजज्गमोक्तिकलरजोगंरिष्रलनलोष्टयोः
सुहदिपश्षपश्चयोः तरणारविन्दचक्षुषोः म्रजामहीमहेन्द्रयोः
समश्रृत्तिकः कद्‌ सदाशिवं भजाम्यहम्‌ ॥१२॥
अर्थ:
पत्थर ओर खुन्दर विनामः . सप ओर मुक्ताकी माख्मः बह्ुमूर्य रत्न तथा मिद्रीके देकेतनैः मित्रया शचुपश्च्मेः तृण अथवा कमललोचना तरणीरमे, ग्रजा ओर प्रथ्वीके महाराजम ` समानभाव रखता हुआ मैं कब सदारिवको भजूँगा ॥ १२ ॥

कदानिलीम्पनिज्ञरीनिङ्ञ्गकोटरे वसन्‌
विथुक्तदुमतिः सदा शिरःसखमञ्जछि वहन्‌ ।
विलोरलोलरोचनो ललामभाललग्नकः
शिवेति मन्त्रसु्चरन्‌ कदा सुखी भवाम्यहम्‌ ॥ १३ ॥
अर्थ:
सुन्दर ललाटवाले भगवान्‌
चन्द्रशेखरमै दत्तचित्त हो अपने कुविचारोंको त्यागकर गङ्गाजीके तटवर्ती
निकुञ्जके भीतर रहता हुआ सिरपर हाथ जोड़ डबडबायी हुई विह्ृळ आँखोंसे
“शिव’ मन्त्रका उच्चारण करता हुआ मैं कब सुखी होऊँगा ? ॥ १३ ॥

इमं हि नित्यमेवमुक्तमुत्तमोत्तमं स्तवं
पठन्स्मरन्ल्रुवन्नरो विशुद्डिमेति सन्ततम्‌ ।
हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नान्यथा गतिं
विमोहनं हि देहिनां सुशङ्करस्थ चिन्तनम्‌॥ १४ ॥
अर्थ:
जो मनुष्य इस प्रकारसे उक्त इस उत्तमोत्तम स्तोत्रका नित्य पाठ, स्मरण और वर्णन करता
रहता है, वह सदा शुद्ध रहता है और शीघ्र ही सुरगुरु श्रीशङ्करजीकी अच्छी भक्ति
प्राप्त कर लेता है, वह विरुद्धगतिको नहीं प्राप्त होता; क्योंकि श्रीशिवजीका अच्छी
प्रकारका चिन्तन प्राणिवर्गके मोहका नाश करनेवाला है ॥ १४ ॥

पूजावसानसमये दशवक्त्रगीतं
यः शम्भुपूजनपरै पठति प्रदोषे।
तस्य स्थिरां रथगजेन्द्रतुरङ्गयुक्तां
लक्ष्मीं सदैव सुमुखीं प्रददाति झाम्भुः ॥ ९५ ॥
अर्थ:
सायङ्कालमें
पूजा समाप्त होनेपर रावणके गाये हुए इस शम्भुपूजनसम्बन्धी स्तोत्रका जो पाठ करता है, भगवान्‌ शङ्कर उस मनुष्यको रथः हाथी घोड़ोंसे युक्त सदा सिर रहनेवाढी अनुकूल सम्पत्ति देते ॥ १५ ॥ `

इति श्रीरावणकृतं शिवताण्डवस्तोत्रं सम्पूर्णम्‌ ।

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