सप्तनादि अपराधा क्षमापना स्तोत्रम्
सप्तनादि अपराधा क्षमापना स्तोत्रम् एक पवित्र संस्कृत स्तोत्र है, जो ईश्वर से जाने-अनजाने में हुए अपराधों और पापों की क्षमा माँगने के लिए रचा गया है। यह स्तोत्र व्यक्ति को आत्मशुद्धि, मानसिक शांति और आध्यात्मिक उत्थान प्रदान करता है।
शास्त्रों में कहा गया है कि मनुष्य जीवन में जाने-अनजाने में सात प्रकार के प्रमुख अपराध होते हैं, जिन्हें सप्तनादि अपराध कहा जाता है। ये अपराध मुख्यतः वाणी, शरीर, मन, कर्म, पूजा, ध्यान और ज्ञान से संबंधित होते हैं। यह स्तोत्र इन्हीं अपराधों की क्षमा याचना के लिए विशेष रूप से समर्पित है।
सप्तनादि अपराधों का विवरण
- वाणी दोष (Speech-related Sins)
- कठोर वाणी, असत्य भाषण, निंदा, कटाक्ष, व्यर्थ वार्तालाप आदि।
- शरीर दोष (Physical Sins)
- किसी को कष्ट देना, हिंसा करना, अनुचित कार्यों में संलिप्त होना।
- मन दोष (Mental Sins)
- बुरी भावना रखना, द्वेष, क्रोध, घृणा, अहंकार, लोभ, वासना आदि।
- कर्म दोष (Karma-related Sins)
- कर्तव्य का पालन न करना, दूसरों के अधिकारों का हनन करना।
- पूजा दोष (Worship-related Sins)
- पूजा में लापरवाही, श्रद्धा का अभाव, अनुचित रीति से पूजन करना।
- ध्यान दोष (Meditation-related Sins)
- ईश्वर का ध्यान करते समय मन का विचलित होना, असंगत विचार आना।
- ज्ञान दोष (Knowledge-related Sins)
- शास्त्रों और धर्म का सही ज्ञान न रखना या गलत व्याख्या करना।
स्तोत्र का उद्देश्य एवं महत्व
- यह स्तोत्र व्यक्ति को अहंकार, क्रोध, ईर्ष्या, मोह और अज्ञान जैसे दोषों से मुक्त करता है।
- यह पापों के प्रायश्चित का एक सरल और प्रभावी साधन है।
- नियमित पाठ से मानसिक शांति, आत्म-सुधार और आध्यात्मिक प्रगति प्राप्त होती है।
- ईश्वर की अनुकंपा और कृपा प्राप्त करने का यह एक श्रेष्ठ उपाय माना जाता है।
- यह स्तोत्र मुक्ति (मोक्ष) प्राप्त करने में सहायक माना जाता है।
स्तोत्र की विशेषताएँ
- यह स्तोत्र भक्त को पवित्रता, आचरण और आस्था में वृद्धि करने में सहायक होता है।
- यह स्तोत्र शिव, विष्णु, देवी, गणेश आदि सभी देवताओं की पूजा में उपयोगी होता है।
- विशेष रूप से श्रावण मास, नवरात्रि, शिवरात्रि, एकादशी और अन्य पवित्र अवसरों पर इसका पाठ करना शुभ माना जाता है।
- इसे संध्या समय, प्रातःकाल या रात्रि में सोने से पहले पढ़ना लाभकारी माना जाता है।
पाठ करने की विधि
- स्वच्छ स्थान पर बैठकर, मन को शांत करके श्रद्धा और समर्पण भाव से इसका पाठ करें।
- यदि संभव हो तो दीपक जलाकर, जल और पुष्प अर्पित कर पाठ करें।
- पाठ के बाद ईश्वर से अपने अपराधों की क्षमा याचना करें और प्रार्थना करें कि वे हमें सत्कर्म की प्रेरणा दें।
सप्तनादि अपराधा क्षमापना स्तोत्रम्
गङ्गे ममापराधानि क्षमस्व शिवजूटजे।
सर्वपापविनाशय त्वां सदा भक्त आश्रये।।
यमुने कृतपापेभ्यः क्षीणं सद्गतियाचकम्।
क्षमस्व दीनं मां देवि त्वामहं शरणं गतः।।
गोदावरि कृतान्येवं पापानीह मया भुवि।
क्षन्तव्योऽहं त्वया देवि शान्तिं कुरु कृपान्विते।।
नर्मदे पापशमनि पादयोः प्रणमामि ते।
अज्ञानकृतपापानि क्षमस्व दयया मम।।
सरस्वति शरण्या त्वं भक्तपापहरेश्वरि।
क्षमस्व दयया देवि दीनस्य कलुषं मम।।
सिन्धो तव कृपायाश्च पात्रं भूयासमद्रिजे।
क्षमस्व कृपया पापं त्वं सदा शरणं मम।।
कावेरि पापहरिणि दीनार्तिहरणे शिवे।
पापं हर मम क्षिप्रं शरणागतवत्सले।।

