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SanatanWeb.com > Blog > गीतकाव्य > स्तोत्र > कृष्ण स्तोत्र > कुंज विहारी स्तोत्रम
कृष्ण स्तोत्रस्तोत्र

कुंज विहारी स्तोत्रम

Sanatani
Last updated: जनवरी 24, 2026 7:58 अपराह्न
Sanatani
Published: जनवरी 24, 2026
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कुंज विहारी स्तोत्रम

कुंज विहारी स्तोत्रम(Kunj Vihari Stotram) भगवान श्रीकृष्ण की महिमा का गान करने वाला एक प्रसिद्ध स्तोत्र है। इसमें भगवान श्रीकृष्ण के विभिन्न रूपों, लीलाओं और उनके दिव्य स्वरूप का वर्णन किया गया है। यह स्तोत्र उन भक्तों के लिए अत्यंत उपयोगी माना जाता है, जो भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति में तल्लीन रहना चाहते हैं और उनके आशीर्वाद की कामना करते हैं।

Contents
  • कुंज विहारी स्तोत्रम
  • कुंज विहारी स्तोत्रम का महत्त्व
  • कुंज विहारी स्तोत्रम के श्लोक
  • कुंज विहारी स्तोत्रम के पाठ विधि

“कुंज विहारी” शब्द का तात्पर्य है – वह जो कुंज (वनों, उपवनों) में विहार करते हैं। यह नाम विशेष रूप से श्रीकृष्ण की ब्रजभूमि की लीलाओं से जुड़ा हुआ है, जहां वे गोपियों के साथ रासलीला करते थे और अपनी बांसुरी की मधुर ध्वनि से संपूर्ण ब्रज को मंत्रमुग्ध कर देते थे।

कुंज विहारी स्तोत्रम का महत्त्व

  1. भक्ति जागरण: कुंज विहारी स्तोत्रम का पाठ भगवान कृष्ण के प्रति भक्त के हृदय में भक्ति उत्पन्न करता है।
  2. मन की शांति: इसे पढ़ने या सुनने से मन शांत होता है और आध्यात्मिक ऊर्जा प्राप्त होती है।
  3. विघ्नों का नाश: यह स्तोत्र भक्तों के जीवन में आने वाले कष्टों और बाधाओं को दूर करने में सहायक माना गया है।
  4. पारिवारिक सुख: कुंज विहारी स्तोत्रम का नियमित पाठ करने से परिवार में शांति, प्रेम और समृद्धि बनी रहती है।

कुंज विहारी स्तोत्रम के श्लोक

इन्द्रनीलमणिमञ्जुलवर्णः फुल्लनीपकुसुमाञ्चितकर्णः ।
कृष्णलाभिरकृशोरसिहारी सुन्दरो जयति कुञ्जविहारी ॥

राधिकावदनचन्द्रचकोरः सर्ववल्लववधूधृतिचोरः ।
चर्चरीचतुरताञ्चितचारी चारुतो जयति कुञ्जविहारी ॥

सर्वताः प्रतिथकौलिकपर्वध्वंसनेन हृतवासवगर्वः ।
गोष्ठरक्षणकृते गिरिधारी लीलया जयति कुञ्जविहारी ॥

रागमण्डलविभूषितवंशी विभ्रमेणमदनोत्सवशंसी-
स्तूयमानचरितः शुकशारिश्रोणिभिर्जयति कुञ्जविहारी ॥

शातकुम्भरुचिहारिदुकूलः केकिचन्द्रकविराजितचूडः ।
नव्ययौवनलसद्व्रजनारीरञ्जनो जयति कुञ्जविहारी ॥

स्थासकीकृतसुगन्धिपटीरः स्वर्णकाञ्चिपरिशोभिकटीरः ।
राधिकोन्नतपयोधरवारीकुञ्जारो जयति कुञ्जविहारी ॥

गौरधातुतिलकोज्ज्वलफालः केलिचञ्चलितचम्पकमालः ।
अद्रिकन्दरगृहेष्वभिसारी सुभ्रुवां जयति कुञ्जविहारी ॥

विभ्रमोच्चलदृगञ्चलनृत्यक्षिप्तगोपललनाखिलकृत्यः ।
प्रेममत्तवृषभानुकुमारीनागरो जयति कुञ्जविहारी ॥

अष्टकं मधुरकुञ्जविहारी क्रीडया पठति यः किल हारी ।
स प्रयाति विलसत्परभागं तस्य पादकमलार्चनरागम् ॥

कुंज विहारी स्तोत्रम के पाठ विधि

  1. प्रातःकाल या संध्या समय में स्नान करके शुद्ध होकर भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति या तस्वीर के सामने दीपक जलाएं।
  2. कुंज विहारी स्तोत्रम का उच्चारण शुद्ध भाव और ध्यान के साथ करें।
  3. पाठ के पश्चात भगवान श्रीकृष्ण को तुलसी दल अर्पित करें और उनकी आरती करें।
नवग्रह ध्यान स्तोत्रम्
चंद्र कवचम्
नृसिंह गद्यं
योगशान्तिप्रदं गणाधीश स्तोत्रम्
शिव भुजंग स्तोत्रम्
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