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Reading: शैलपुत्री स्तोत्रम्
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SanatanWeb.com > Blog > गीतकाव्य > स्तोत्र > पार्वती स्तोत्र > शैलपुत्री स्तोत्रम्
पार्वती स्तोत्रस्तोत्र

शैलपुत्री स्तोत्रम्

Sanatani
Last updated: जनवरी 27, 2026 4:35 अपराह्न
Sanatani
Published: जनवरी 27, 2026
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शैलपुत्री स्तोत्रम्

शैलपुत्री देवी (Shailaputri Stotram), जिन्हें नवदुर्गा के प्रथम स्वरूप के रूप में पूजा जाता है, हिंदू धर्म में अत्यधिक श्रद्धेय और पूजनीय हैं। नवरात्रि के प्रथम दिन शैलपुत्री देवी की पूजा-अर्चना की जाती है। उनका नाम “शैल” (पर्वत) और “पुत्री” (पुत्री) से बना है, जिसका अर्थ है “पर्वतराज हिमालय की पुत्री”। उन्हें माँ पार्वती और सती का अवतार माना जाता है।

Contents
  • शैलपुत्री स्तोत्रम्
  • शैलपुत्री स्तोत्रम्
  • शैलपुत्री स्तोत्रम् का महत्व
  • पूजन विधि
  • शैलपुत्री स्तोत्रम् के लाभ

शैलपुत्री स्तोत्रम् देवी शैलपुत्री की स्तुति के लिए रचा गया एक पवित्र और शक्तिशाली पाठ है। इसे पढ़ने और सुनने से साधक को मानसिक शांति, आत्मबल और सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होती है।

शैलपुत्री स्तोत्रम्

हिमालय उवाच –
मातस्त्वं कृपया गृहे मम सुता जातासि नित्यापि
यद्भाग्यं मे बहुजन्मजन्मजनितं मन्ये महत्पुण्यदम् ।
दृष्टं रूपमिदं परात्परतरां मूर्तिं भवान्या अपि
माहेशीं प्रति दर्शयाशु कृपया विश्वेशि तुभ्यं नमः ॥

श्रीदेव्युवाच –
ददामि चक्षुस्ते दिव्यं पश्य मे रूपमैश्वरम् ।
छिन्धि हृत्संशयं विद्धि सर्वदेवमयीं पितः ॥

श्रीमहादेव उवाच –
इत्युक्त्वा तं गिरिश्रेष्ठं दत्त्वा विज्ञानमुत्तमम् ।
स्वरूपं दर्शयामास दिव्यं माहेश्वरं तदा ॥

शशिकोटिप्रभं चारुचन्द्रार्धकृतशेखरम् ।
त्रिशूलवर हस्तं च जटामण्डितमस्तकम् ॥

भयानकं घोररूपं कालानलसहस्रभम् ।
पञ्चवक्त्रं त्रिनेत्रं च नागयज्ञोपवीतिनम् ॥

द्वीपिचर्माम्बरधरं नागेन्द्रकृतभूषणम् ।
एवं विलोक्य तद्रूपं विस्मितो हिमवान् पुनः ॥

प्रोवाच वचनं माता रूपमन्यत्प्रदर्शय ।
ततः संहृत्य तद्रूपं दर्शयामास तत्क्षणात् ॥

रूपमन्यन्मुनिश्रेष्ठ विश्वरूपा सनातनी ।
शरच्चन्द्रनिभं चारुमुकुटोज्ज्वलमस्तकम् ॥

शङ्खचक्रगदापद्महस्तं नेत्रत्रयोज्ज्वलम् ।
दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धानुलेपनम् ॥

योगीन्द्रवृन्दसंवन्द्यं सुचारुचरणाम्बुजम् ।
सर्वतः पाणिपादं च सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् ॥

दृष्ट्वा तदेतत्परमं रूपं स हिमवान् पुनः ।
प्रणम्य तनयां प्राह विस्मयोत्फुल्ललोचनः ॥

हिमालय उवाच –
मातस्तवेदं परमं रूपमैश्वरमुत्तमम् ।
विस्मितोऽस्मि समालोक्य रूपमन्यत्प्रदर्शय ॥

त्वं यस्य सो ह्यशोच्यो हि धन्यश्च परमेश्वरि ।
अनुगृह्णीष्व मातर्मां कृपया त्वां नमो नमः ॥

श्रीमहादेव उवाच –
इत्युक्ता सा तदा पित्रा शैलराजेन पार्वती ।
तद्रूपमपि संहृत्य दिव्यं रूपं समादधे ॥

नीलोत्पलदलश्यामं वनमालाविभूषितम् ।
शङ्खचक्रगदापद्ममभिव्यक्तं चतुर्भुजम् ॥

एवं विलोक्य तद्रूपं शैलानामधिपस्ततः ।
कृताञ्जलिपुटः स्थित्वा हर्षेण महता युतः ॥

स्तोत्रेणानेन तां देवीं तुष्टाव परमेश्वरीम् ।
सर्वदेवमयीमाद्यां ब्रह्मविष्णुशिवात्मिकाम् ॥

हिमालय उवाच –
मातः सर्वमयि प्रसीद परमे विश्वेशि विश्वाश्रये
त्वं सर्वं नहि किञ्चिदस्ति भुवने तत्त्वं त्वदन्यच्छिवे ।
त्वं विष्णुर्गिरिशस्त्वमेव नितरां धातासि शक्तिः परा
किं वर्ण्यं चरितं त्वचिन्त्यचरिते ब्रह्माद्यगम्यं मया ॥

त्वं स्वाहाखिलदेवतृप्तिजननी विश्वेशि त्वं वै स्वधा
पितॄणामपि तृप्तिकारणमसि त्वं देवदेवात्मिका ।
हव्यं कव्यमपि त्वमेव नियमो यज्ञस्तपो दक्षिणा
त्वं स्वर्गादिफलं समस्तफलदे देवेशि तुभ्यं नमः ॥

रूपं सूक्ष्मतमं परात्परतरं यद्योगिनो विद्यया
शुद्धं ब्रह्ममयं वदन्ति परमं मातः सुदृप्तं तव ।
वाचा दुर्विषयं मनोऽतिगमपि त्रैलोक्यबीजं शिवे
भक्त्याहं प्रणमामि देवि वरदे विश्वेश्वरि त्राहिमाम् ॥

उद्यत्सूर्यसहस्रभां मम गृहे जातां स्वयं लीलया
देवीमष्टभुजां विशालनयनां बालेन्दुमौलिं शिवाम् ।
उद्यत्कोटिशशाङ्ककान्तिनयनां बालां त्रिनेत्रां परां
भक्त्या त्वां प्रणमामि विश्वजननी देवि प्रसीदाम्बिके ॥

रूपं ते रजताद्रिकान्तिविमलं नागेन्द्रभूषोज्ज्वलं
घोरं पञ्चमुखाम्बुजत्रिनयनैईमैः समुद्भासितम् ।
चन्द्रार्धाङ्कितमस्तकं धृतजटाजूटं शरण्ये शिवे
भक्त्याहं प्रणमामि विश्वजननि त्वां त्वं प्रसीदाम्बिके ॥

रूपं ते शारदचन्द्रकोटिसदृशं दिव्याम्बरं शोभनं
दिव्यैराभरणैर्विराजितमलं कान्त्या जगन्मोहनम् ।
दिव्यैर्बाहुचतुष्टयैर्युतमहं वन्दे शिवे भक्तितः
पादाब्जं जननि प्रसीद निखिलब्रह्मादिदेवस्तुते ॥

रूपं ते नवनीरदद्युतिरुचिफुल्लाब्जनेत्रोज्ज्वलं,
कान्त्या विश्वविमोहनं स्मितमुखं रत्नाङ्गदैर्भूषितम् ।
विभ्राजद्वनमालयाविलसितोरस्कं जगत्तारिणि
भक्त्याहं प्रणतोऽस्मि देवि कृपया दुर्गे प्रसीदाम्बिके ॥

मातः कः परिवर्णितुं तव गुणं रूपं च विश्वात्मकं
शक्तो देवि जगत्रये बहुगुणैर्देवोऽथवा मानुषः ।
तत् किं स्वल्पमतिब्रवीमि करुणां कृत्वा स्वकीयै-
र्गुणैर्नो मां मोहय मायया परमया विश्वेशि तुभ्यं नमः ॥

अद्य मे सफलं जन्म तपश्च सफलं मम ।
यत्त्वं त्रिजगतां माता मत्पुत्रीत्वमुपागता ॥

धन्योऽहं कृतकृत्योऽहं मातस्त्व निजलीलया ।
नित्यापि मद्गृहे जाता पुत्रीभावेन वै यतः ॥

शैलपुत्री स्तोत्रम् का महत्व

  1. आध्यात्मिक शुद्धि: शैलपुत्री स्तोत्रम् के नियमित पाठ से साधक की आत्मा शुद्ध होती है और वह उच्च आध्यात्मिक स्तर पर पहुंच सकता है।
  2. शक्ति और साहस: यह स्तोत्रम् मानसिक शक्ति, साहस और सकारात्मकता प्रदान करता है।
  3. सफलता का मार्ग: देवी शैलपुत्री की कृपा से जीवन में आने वाली बाधाओं का नाश होता है और सफलता का मार्ग प्रशस्त होता है।
  4. चंद्र दोष निवारण: शैलपुत्री देवी का संबंध चंद्रमा से है। उनके स्तोत्र के पाठ से चंद्र दोष का निवारण होता है और मन को शांति मिलती है।

पूजन विधि

शैलपुत्री देवी की पूजा नवरात्रि के पहले दिन की जाती है। पूजन विधि इस प्रकार है:

  1. स्नान करके शुद्ध वस्त्र धारण करें।
  2. पूजा स्थल को गंगाजल से शुद्ध करें।
  3. देवी शैलपुत्री की मूर्ति या चित्र स्थापित करें।
  4. उन्हें अक्षत, पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित करें।
  5. शैलपुत्री स्तोत्रम् का पाठ करें और उनकी आरती करें।

शैलपुत्री स्तोत्रम् के लाभ

  1. मन की शांति: यह स्तोत्रम् मानसिक शांति और संतुलन प्रदान करता है।
  2. धार्मिक लाभ: इसका पाठ करने से व्यक्ति को पुण्य की प्राप्ति होती है।
  3. संकट निवारण: जीवन के संकट और कठिनाइयों का समाधान मिलता है।
  4. स्वास्थ्य लाभ: यह स्तोत्रम् शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाता है।

शैलपुत्री देवी वृषभ (बैल) पर सवार होती हैं। उनके दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कमल का फूल होता है। उनके मस्तक पर अर्धचंद्र सुशोभित है। उनका स्वरूप शांत, सौम्य और अत्यंत शक्तिशाली है।

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