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SanatanWeb.com > Blog > गीतकाव्य > अष्टकम् > श्रीहरिशरणाष्टकम्‌
अष्टकम्श्री विष्णु स्तोत्रस्तोत्र

श्रीहरिशरणाष्टकम्‌

Sanatani
Last updated: जनवरी 3, 2026 5:07 अपराह्न
Sanatani
Published: जनवरी 3, 2026
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श्रीहरिशरणाष्टकम्‌

ध्येयं वदन्ति शिवमेव हि केचिदन्ये
शाक्तिं गणेशमपरे तु दिवाकरं वै ।
रूपैस्तु तैरपि विभासि यतस्त्वमेव
तस्मात्त्वमेव शरणं मम दीनबन्धो*॥१॥

कोई शिवको ही ध्येय बताते हैं तथा कोई शक्तिको, कोई गणेशको और कोई भगवान्‌ भास्करको ध्येय कहते हैं; उन सब रूपोंमें आप ही भास रहे हैं, इसलिये हे दीनबन्धो ! मेरी शरण तो एकमात्र आप ही हैं ॥ १ ॥


नो सोद्रो न जनको जननी न जाया
नैवात्मजो न च कुलं विपुलं बलं वा।
संदूरयते न किल कोऽपि सहायको मे। तस्मा०॥ २ ॥

भ्राता, पिता, माता, स्त्री, पुत्र, कुल एवं प्रचुर बल–इनमेंसे कोई भी मुझे अपना सहायक नहीं दीखता; अतः हे दीनबन्धो ! आप ही मेरी एकमात्र शरण हैं ॥ २ ॥


नोपासिता मदमपास्य मया महान्तस्तीर्थानि चास्तिकधिया न हि सेवितानि ।
देवार्चनं च विधिवन्न कृतं कदापि। तस्मा०॥ ३ ॥

मैंने न तो अभिमानको छोड़कर महात्माओंकी आराधना की, न आस्तिकबुद्धिसे तीर्थोका सेवन किया है और न कभी विधिपूर्वक देवताओंका पूजन ही किया है; अत: हे दीनबन्धो । अब आप ही मेरी एकमात्र शरण हैं॥ ३ ॥

दुर्वासना मम सदा परिकर्षयन्ति चित्तं शरीरमपि रोगगणा दहन्ति ।
सञ्जीवनं च परहस्तगतं सदैव। तस्मा०॥ ४॥

दुर्वासनाएँ मेरे चित्रको सदा खींचती रहती हैं, रोगसमूह सर्वदा शरीरको तपाते रहते हैं और जीवन तो सदैव परवश ही है; अतः हे दीनबन्धो ! आप ही मेरी एकमात्र शरण हैं ॥ ४ ॥

पूर्व कृतानि दुरितानि सया तु यानि
स्मृत्वाखिलानि हृदयं परिकम्पते मे।
ख्याता च ते पतितपावनता तु यस्मात्‌। तस्मा? ५॥

पहले मुझसे जो-जो पाप बने हँ, उन सबको याद कर-करके मेरा हृदय काँपता है; किन्तु तुम्हारी पतितपावनता तो प्रसिद्ध ही है, अतः हे दीनबन्धो ! अब आप ही मेरी एकमात्र शरण हैं ॥ ५॥


दुःखं जराजननजं विविधाश्च रोगाः
काकश्वसूक्ररजनिर्निरये चा पातः।
ते विस्मृतेः फलमिदं विततं हि लोके । तस्मा०॥ ६॥

प्रभो ! आपको भूलनेसे जरा-जन्मादिसम्भूत दुःख, नाना व्याधियाँ, काक, कुत्ता, शूकरादि योनियाँ तथा नरकादिमें पतन–ये ही फल संसारमें विस्तृत हैं, अतः हे दीनबन्धो ! अब आप ही मेरी एकमात्र गति हैं ॥ ६॥


नीचोऽपि पापवलितोऽपि विनिन्दितोऽपि
ब्रूयात्तवाहमिति यस्तु क्रिलैकवारम्‌।
तं यच्छसीश निजलोकमिति व्रतं ते। तस्मा? ७॥

नीच, महापापी अथवा निन्दित ही क्यों न हो; किन्तु जो एक बार भी यह कह देता है कि ‘मैं आपका हूँ, उसीको आप अपना धाम दे देते हैं, हे नाथ ! आपका यही व्रत है; अतः हे दीनबन्धो ! अब आप ही मेरी एकमात्र गति हें ॥७॥


वेदेषु धर्मवचनेषु तथागमेषु
रामायणेऽपि च पुराणकदम्बके वा।
सर्वत्र सर्वविधिना गदितस्त्वमेव। तस्मा ८॥

वेद, धर्मशास्त्र, आगम, रामायण तथा पुराण समूहमें भी सर्वत्र सब प्रकार आपहीका कीर्तन है; अतः हे दीनबन्धो ! अब आप ही मेरी एकमात्र गति हैं॥ ८ ॥

इति श्रीमत्परमहँसस्वामिन्रह्मानन्दविरचितं श्रीहरिशरणाष्टकं सम्पूर्णम्‌ ।

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