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भजनविष्णु भजन

तजो रे मन झूठे सुखकी आसा

Sanatani
Last updated: जनवरी 24, 2026 2:20 अपराह्न
Sanatani
Published: जनवरी 24, 2026
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तजो रे मन झूठे सुखकी आसा

 

तजो रे मन झूठे सुखकी आसा ।

हरि-पद भजो, तजो सब ममता, छोड़ बिषय-अभिलासा ।

बिषयनमें सुख सपनेहुँ नाहीं केवल मात्र दुरासा ।।

कामिनि-सुत, पितु-मातु, बंधु, जस, कीरति, सकल सुपासा।

छिनमहूँ होत बियोग सबन्हते, कठिन काल जग नासा ।।

क्षणभंगुर सब विषय, निरंतर बनत कालके प्रासा ।

इनमें जो कोउ थिर सुख चाहत, सो नित मरत पियासा ।।

प्रभु-पद-पदम सदा अबिनासी, सेवत परम हुलासा ।

मिलै परम सुख, घटै न कंबहूँ, जिनके मन बिस्वासा ।।

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