श्रीमद् भागवत महापुराण

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श्री मद्भागवत महापुराण महात्म्य Sri Madbhagwat Mahapuran Mahatmya

यह श्रीमद्भागवत अत्यन्त गोपनीय रहस्यात्मक पुराण है। यह भगवत्स्वरूपका अनुभव करानेवाला और समस्त वेदोंका सार है। संसारमें फँसे हुए जो लोग इस घोर अज्ञानान्धकारसे पार जाना चाहते हैं, उनके लिये आध्यात्मिक तत्त्वोंको प्रकाशित करनेवाला यह एक अद्वितीय दीपक है। वास्तवमें उन्हींपर करुणा करके बड़े-बड़े मुनियोंके आचार्य श्रीशुकदेवजीने इसका वर्णन किया है। श्रीमद् भागवत महापुराण स्वयं श्री भगवान् के श्रीमुख से ब्रम्हाजी के प्रति कहा गया है श्रीमद् भागवत महापुराण को महर्षि वेदव्यास ने लिखा था, जिन्होंने इसे भगवान के अनंत लीलाओं और भक्तों की अद्भुत कथाओं से भर दिया। यह ग्रंथ हमें बताता है कि भगवान अपने भक्तों के प्रति कितना प्रेम और करुणा रखते हैं, और कैसे वे अपने भक्तों की रक्षा के लिए किसी भी सीमा तक जा सकते हैं।

श्रीमद् भागवत महापुराण के मुख्य उद्देश्यों में से एक है भक्तों को भगवान की अनन्य भक्ति की ओर प्रेरित करना और उन्हें यह सिखाना कि सच्ची भक्ति से ही जीवन का वास्तविक उद्देश्य प्राप्त किया जा सकता है। इस ग्रंथ में विभिन्न अवतारों की कथाएँ हैं, जिनमें भगवान विष्णु ने अपने भक्तों की रक्षा और अधर्म के नाश के लिए अवतार लिया। इन अवतारों में ब्रह्मा, वराह, नृसिंह, वामन, राम और कृष्ण की कथाएँ प्रमुख हैं।

इस ग्रंथ के माध्यम से हमें यह भी सिखाया जाता है कि भगवान की लीलाएँ अपरंपार और अनंत हैं, और वे समय-समय पर विभिन्न रूपों में प्रकट होकर धर्म की स्थापना और अधर्म का नाश करते हैं। श्रीमद् भागवत महापुराण में भगवान कृष्ण की लीलाओं का विशेष महत्व है, जिनमें उनका जन्म, बाल लीलाएँ, गोवर्धन पूजा, रासलीला, और कंस वध आदि की कथाएँ प्रमुखता से वर्णित हैं।

श्रीमद् भागवत महापुराण में हमें ध्रुव, प्रह्लाद, और पांडवों जैसे महान भक्तों की कथाएँ भी मिलती हैं, जिन्होंने कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी भगवान की भक्ति नहीं छोड़ी और अंततः भगवान ने उन्हें अपनी शरण में लिया। इन कथाओं से हमें यह प्रेरणा मिलती है कि चाहे जीवन में कितनी भी कठिनाइयाँ क्यों न आएँ, हमें सच्चे हृदय से भगवान की भक्ति करनी चाहिए और उन पर विश्वास बनाए रखना चाहिए।

इस ग्रंथ का अध्ययन और मनन करने से हमें जीवन के कई महत्वपूर्ण और गहरे सन्देश मिलते हैं, जो हमें एक सच्चे और धार्मिक जीवन की ओर प्रेरित करते हैं। श्रीमद् भागवत महापुराण का पाठन हमें न केवल आध्यात्मिक दृष्टि से लाभान्वित करता है, बल्कि हमें जीवन की वास्तविकता और उसके उद्देश्यों को भी समझने में मदद करता है।

इस पुस्तक में हम श्रीमद् भागवत महापुराण की इन्हीं महत्वपूर्ण कथाओं और उनके गहरे सन्देशों का विस्तार से वर्णन करेंगे, ताकि पाठक इनसे प्रेरणा लेकर अपने जीवन को सही दिशा में ले जा सकें और सच्चे अर्थों में भगवान की भक्ति की महिमा को समझ सकें।

ब्रह्मा के द्वारा सृष्टि का निर्माण Creation of universe by Brahma

सृष्टि की उत्पत्ति और निर्माण का वर्णन करते हुए, श्रीमद् भागवत महापुराण के पहले अध्याय में भगवान ब्रह्मा की कथा है, जिन्होंने भगवान विष्णु के आदेश पर सृष्टि की रचना की। भगवान विष्णु के नाभि से उत्पन्न कमल पर प्रकट होकर ब्रह्मा ने इस जगत का सृजन किया।

श्रीहरि विष्णु के योगनिद्रा में लीन होने के समय, उनकी नाभि से एक दिव्य कमल प्रकट हुआ। इस कमल के ऊपर चार मुखों वाले ब्रह्मा प्रकट हुए। ब्रह्मा जी ने जब चारों ओर देखा तो उन्हें केवल जल ही जल दिखाई दिया। वे इस विचित्र स्थिति को देखकर हैरान हो गए और यह समझने का प्रयास करने लगे कि वे कहाँ हैं और यहाँ कैसे आए।

तभी उन्हें एक दिव्य वाणी सुनाई दी, “तप करो, तप करो।” ब्रह्मा जी ने इस आदेश का पालन किया और वे तपस्या में लीन हो गए। कई वर्षों तक कठोर तपस्या के बाद, भगवान विष्णु ने उन्हें दर्शन दिए और बताया कि यह सम्पूर्ण सृष्टि उनके द्वारा ही बनाई गई है और ब्रह्मा को सृष्टि के निर्माण का कार्य सौंपा गया है।

ब्रह्मा जी ने भगवान विष्णु के आदेश का पालन करते हुए सृष्टि की रचना प्रारंभ की। उन्होंने सबसे पहले चार वेदों का सृजन किया, ताकि धर्म, ज्ञान, यज्ञ और सत्य की स्थापना हो सके। इसके बाद उन्होंने समय, काल, दिशा, तत्व, और अन्य प्राकृतिक तत्वों का निर्माण किया।

ब्रह्मा जी ने अपने मन से विभिन्न ऋषियों, मुनियों, और प्रजापतियों को उत्पन्न किया, जिन्होंने आगे चलकर मनुष्यों, देवताओं, और अन्य जीवों की सृष्टि की। उन्होंने दस प्रमुख प्रजापतियों को उत्पन्न किया, जिनके नाम हैं: मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, वसिष्ठ, दक्ष, भृगु, और नारद। इन प्रजापतियों ने विभिन्न जीवों और योनियों की सृष्टि की।

सृष्टि के निर्माण के पश्चात् ब्रह्मा जी ने विभिन्न लोकों की रचना की, जैसे कि भुलोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक, महर्लोक, जनलोक, तपोलोक, और सत्यलोक। इसके अलावा, उन्होंने पाताल लोक, नागलोक, और अन्य अधोलोकों की भी सृष्टि की।

इस प्रकार ब्रह्मा जी ने भगवान विष्णु के आदेशानुसार इस अद्भुत और विस्तृत सृष्टि की रचना की। सृष्टि की रचना के पश्चात्, उन्होंने भगवान विष्णु की स्तुति की और उनसे आशीर्वाद प्राप्त किया। भगवान विष्णु ने उन्हें आशीर्वाद देते हुए कहा कि वे सृष्टि के पालन और संवर्धन के लिए हर समय उनकी सहायता करेंगे।

Shrimad Bhagwat Mahapuran 2

श्रीमद्भागवतकी महिमा Glory of Shrimad Bhagwat

श्रीमद्भागवतकी महिमा मैं क्या लिखूँ ? उसके आदिके तीन श्लोकोंमें जो महिमा कह दी गयी है, उसके बराबर कौन कह सकता है? उन तीनों श्लोकोंको कितनी ही बार पढ़ चुकनेपर भी जब उनका स्मरण होता है, मनमें अद्भुत भाव उदित होते हैं। कोई अनुवाद उन श्लोकोंकी गम्भीरता और मधुरताको पा नहीं सकता। उन तीनों श्लोकोंसे मनको निर्मल

करके फिर इस प्रकार भगवान्का ध्यान कीजिये –

ध्यायतश्चरणाम्भोजं भावनिर्जितचेतसा ।

औत्कण्ठ्याश्रुकलाक्षस्य हृद्यासीन्मे शनैर्हरिः ॥

प्रेमातिभरनिर्भिन्नपुलकाङ्गोऽतिनिर्वृतः।

आनन्दसम्प्लवे लीनो नापश्यमुभयं मुने ॥

रूपं भगवतो यत्तन्मनः कान्तं शुचापहम् ।

अपश्यन् सहसोत्तस्थे वैक्लव्याद् दुर्मना इव ॥

मुझको श्रीमद्भागवतमें अत्यन्त प्रेम है। मेरा विश्वास और अनुभव है कि इसके पढ़ने और सुननेसे मनुष्यको ईश्वरका सच्चा ज्ञान प्राप्त होता है और उनके चरणकमलोंमें अचल भक्ति होती है। इसके पढ़नेसे मनुष्यको दृढ़ निश्चय हो जाता है कि इस संसारको रचने और पालन करनेवाली कोई सर्वव्यापक शक्ति है एक अनन्त त्रिकाल सच, चेतन शक्ति दिखात। सिरजत, पालत, हरत, जग, महिमा बरनि न जात ॥ एक अनन्त त्रिकाल सच, चेतन शक्ति दिखात। सिरजत, पालत, हरत, जग, महिमा बरनि न जात ॥

इसी एक शक्तिको लोग ईश्वर, ब्रह्म, परमात्मा इत्यादि अनेक नामोंसे पुकारते हैं। भागवतके पहले ही श्लोकमें वेदव्यासजीने ईश्वरके स्वरूपका वर्णन किया है कि जिससे इस संसारकी सृष्टि, पालन और संहार होते हैं, जो त्रिकालमें सत्य है- अर्थात् जो सदा रहा भी, है भी और रहेगा भी- और जो अपने प्रकाशसे अन्धकारको सदा दूर रखता है, उस परम सत्यका हम ध्यान करते हैं। उसी स्थानमें श्रीमद्भागवतका स्वरूप भी इस प्रकारसे संक्षेपमें वर्णित है कि इस भागवतमें – जो दूसरोंकी बढ़ती देखकर डाह नहीं करते, ऐसे साधुजनोंका सब प्रकारके स्वार्थसे रहित परम धर्म और वह जाननेके योग्य ज्ञान वर्णित है जो वास्तवमें सब कल्याणका देनेवाला और आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक-इन तीनों प्रकारके तापोंको मिटानेवाला है। और ग्रन्थोंसे क्या, जिन सुकृतियोंने पुण्यके कर्म कर रखे हैं और जो श्रद्धासे भागवतको पढ़ते या सुनते हैं, वे इसका सेवन करनेके समयसे ही अपनी भक्तिसे ईश्वरको अपने हृदयमें अविचलरूपसे स्थापित कर लेते हैं। ईश्वरका ज्ञान और उनमें भक्तिका परम साधन-ये दो पदार्थ जब किसी प्राणीको प्राप्त हो गये तो कौन-सा पदार्थ रह गया, जिसके लिये मनुष्य कामना करे और ये दोनों पदार्थ श्रीमद्भागवतसे पूरी मात्रामें प्राप्त होते हैं। इसीलिये यह पवित्र ग्रन्थ मनुष्यमात्रका उपकारी है। जबतक मनुष्य भागवतको पढ़े नहीं और उसकी इसमें श्रद्धा न हो, तबतक वह समझ नहीं सकता कि ज्ञान-भक्ति-वैराग्यका यह कितना विशाल समुद्र है। भागवतके पढ़नेसे उसको यह विमल ज्ञान हो जाता है कि एक ही परमात्मा प्राणी-प्राणीमें बैठा हुआ है और जब उसको यह ज्ञान हो जाता है, तब वह अधर्म करनेका मन नहीं करता;

श्रीमद्भागवतकी पूजन विधि तथा विनियोग, न्यास एवं ध्यान Method of worship of Shrimad Bhagwat

प्रातःकाल स्नानके पश्चात् अपना नित्य-नियम समाप्त करके पहले भगवत्-सम्बन्धी स्तोत्रों एवं पदोंके द्वारा मंगलाचरण और वन्दना करे। इसके बाद आचमन और प्राणायाम करके –

ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टु वासस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः ॥ १॥

इत्यादि मन्त्रोंसे शान्तिपाठ करे। इसके पश्चात् भगवान् श्रीकृष्ण, श्रीव्यासजी, शुकदेवजी तथा श्रीमद्भागवत-ग्रन्थकी षोडशोपचारसे पूजा करनी चाहिये। यहाँ श्रीमद्भागवत-पुस्तकके षोडशोपचार पूजनकी मन्त्रसहित विधि दी जा रही है, इसीके अनुसार श्रीकृष्ण आदिकी भी पूजा करनी चाहिये। निम्नांकित वाक्य पढ़कर पूजनके लिये संकल्प करना चाहिये। संकल्पके समय दाहिने हाथकी अनामिका अंगुलिमें कुशकी पवित्री पहने और हाथमें जल लिये रहे। संकल्पवाक्य इस प्रकार है-

  • ॐ तत्सत् । ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः ओ३मद्यैतस्य ब्रह्मणो द्वितीयपरार्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे जम्बूद्वीपे
  • भरतखण्डे आर्यावर्तेकदेशान्तर्गते पुण्यस्थाने कलियुगे कलिप्रथमचरणे अमुकसंवत्सरे अमुकमासे अमुकपक्षे अमुकयोगवारांशकलग्नमुहूर्तकरणान्वितायां शुभपुण्य- तिथौ अमुकवासरे अमुकगोत्रोत्पन्नस्य अमुकशर्मणः (वर्मणः गुप्तस्य वा) मम सकुटुम्बस्य सपरिवारस्य श्रीगोवर्धनधरणचरणारविन्दप्रसादात् सर्वसमृद्धिप्राप्त्यर्थं भगवदनुग्रहपूर्वक भगवदीयप्रेमोपलब्धये च श्रीभगव- न्नामात्मक भगवत्स्वरूपश्रीभागवतस्य पाठेऽधिकार- सिद्ध्यर्थं श्रीमद्भागवतस्य प्रतिष्ठां पूजनं चाहं करिष्ये ।

तदस्तु मित्रावरुणा तदग्ने शंय्योऽस्मभ्यमिदमस्तु शस्तम् ।

अशीमहि गाधमुत प्रतिष्ठां नमो दिवे बृहते सादनाय ॥ २ ॥

इस प्रकार संकल्प करके 

यह मन्त्र पढ़कर श्रीमद्भागवतकी सिंहासन या अन्य किसी आसनपर स्थापना करे। तत्पश्चात् – पुरुषसूक्तके एक-एक मन्त्रद्वारा क्रमशः पोडश- – उपचार अर्पण करते हुए पूजन करे।

श्रीमद्भागवत सप्ताहकी आवश्यक विधि

मुहूर्तविचार Auspicious Time

पहले विद्वान् ज्योतिषीको बुलाकर उनके द्वारा कथा-प्रारम्भके लिये शुभ मुहूर्तका विचार करा लेना चाहिये। नक्षत्रोंमें हस्त, चित्रा, स्वाती, विशाखा, अनुराधा, पुनर्वसु, पुष्य, रेवती, अश्विनी, मृगशिरा, श्रवण, धनिष्ठा तथा पूर्वाभाद्रपदा उत्तम हैं। तिथियोंमें द्वितीया, तृतीया, पञ्चमी, षष्ठी, दशमी, एकादशी तथा द्वादशीको इस कार्यके लिये श्रेष्ठ बतलाया गया है। सोम, बुध, गुरु एवं शुक्र – ये वार सर्वोत्तम हैं। तिथि, वार और नक्षत्रका विचार करनेके साथ ही यह भी देख लेना चाहिये कि शुक्र या गुरु अस्त, बाल अथवा वृद्ध तो नहीं हैं। कथारम्भका मुहूर्त भद्रादि दोषोंसे रहित होना चाहिये। उस दिन पृथ्वी जागती हो, वक्ता और श्रोताका चन्द्रबल ठीक हो। लग्नमें शुभ ग्रहोंका योग अथवा उनकी दृष्टि हो। शुभ ग्रहोंकी स्थिति केन्द्र या त्रिकोणमें हो तो उत्तम है। आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, आश्विन, कार्तिक और मार्गशीर्ष (अगहन) ये मास कथा आरम्भ करनेके लिये श्रेष्ठ बतलाये गये हैं। किन्हीं विद्वानोंके मतसे चैत्र और पौषको छोड़कर सभी मास ग्राह्य हैं।

Shrimad Bhagwat Mahapuran 1

श्रीमद्भागवत सप्ताहकी कथाके लिये स्थान Place for story of Shrimad Bhagwat week

सप्ताहकथाके लिये उत्तम एवं पवित्र स्थानकी व्यवस्था हो। जहाँ अधिक लोग सुविधासे बैठ सकें, ऐसे स्थानमें कथाका आयोजन उत्तम है। नदीका तट, उपवन (बगीचा), देवमन्दिर अथवा अपना निवास स्थान- ये सभी कथाके लिये उपयोगी स्थल हैं, स्थान लिपा-पुता स्वच्छ हो। नीचेकी भूमि गोबर और पीली मिट्टीसे लीपी गयी हो। अथवा पक्का आँगन हो तो उसे धो दिया गया हो। उसपर पवित्र एवं सुन्दर आसन बिछे हों। ऊपरसे चंदीवा तना हो। चंदोवा आदि किसी भी कार्यमें नीले रंगके वस्त्रका उपयोग न किया जाय। यजमानके हाथसे सोलह हाथ लम्बा और उतना ही चौड़ा कथा-मण्डप बने। उसे केलेके खम्भोंसे सजाया जाय। हरे बाँसके खंभे लगाये जायें। नूतन पल्लवोंकी बंदनवारों, पुष्पमालाओं और ध्वजा-पताकाओंसे मण्डपको भलीभाँति सुसज्जित किया जाय। उसपर ऊपरसे सुन्दर चंदोवा तान दिया जाय। उस मण्डपके दक्षिण- पश्चिम भागमें कथावाचक और मुख्य श्रोताके बैठनेके लिये स्थान हो। शेष भागमें देवताओं और कलश आदिका स्थापन किया जाय। कथावाचकके बैठनेके लिये ऊँची चौकी रखी जाय। उसपर शुद्ध आसन (नया गद्दा) बिछाया जाय। पीछे तथा पार्श्वभागमें मसनद एवं तकिये रख दिये जायें। श्रीमद्भागवतको स्थापित करनेके लिये एक छोटी- सी चौकी या आधारपीठ बनवाकर उसपर पवित्र वस्त्र बिछा दिया जाय। उसपर आगे बतायी जानेवाली विधिके अनुसार अष्टदल कमल बनाकर पूजन करके श्रीमद्भागवतकी पुस्तक स्थापित की जाय। कथावाचक विद्वान्, सर्वशास्त्रकुशल, दृष्टान्त देकर श्रोताओंको समझानेमें समर्थ, सदाचारी एवं सद्‌गुणसम्पन्न ब्राह्मण हों। उनमें सुशीलता, कुलीनता, गम्भीरता तथा श्रीकृष्णभक्तिका होना भी परमावश्यक है। वक्ताको असूया तथा परनिन्दा आदि दोषसे सर्वथा रहित निःस्पृह होना चाहिये। श्रीमद्भागवतकी पुस्तकको रेशमी वस्त्रसे आच्छादित करके छत्र चॅवरके साथ डोलीमें अथवा अपने मस्तकपर रखकर कथामण्डपमें लाना और स्थापित करना चाहिये। उस समय गीत- वाद्य आदिके द्वारा उत्सव मनाना चाहिये। कथामण्डपसे अनुपयोगी वस्तुएँ हटा देनी चाहिये। इधर-उधर दीवालोंमें भगवान् और उनकी लीलाओंके स्मारक चित्र लगा देने चाहिये। वक्ताका मुँह यदि उत्तरकी ओर हो तो मुख्य श्रोताका मुख पूर्वकी ओर होना चाहिये। यदि वक्ता पूर्वाभिमुख हो तो श्रोताको उत्तराभिमुख होना चाहिये। सप्ताह-कथा एक महान् यज्ञ है। इसे सुसम्पन्न करनेके लिये अन्य सुहृद्-सम्बन्धियोंको भी सहायक बना लेना चाहिये। अर्थकी भी समुचित व्यवस्था पहलेसे ही कर लेना उत्तम है। पाँच-सात दिन पहलेसे ही दूर-दूरतक कथाका समाचार भेज देना चाहिये और सबसे यह अनुरोध करना चाहिये कि वे स्वयं उपस्थित होकर सप्ताह-कथा श्रवण करें। अधिक समय न दे सकें तो भी एक दिन अवश्य पधारकर कथाश्रवणका लाभ लें। दूरसे आये हुए अतिथियोंके ठहरने और भोजनादिकी व्यवस्था भी करनी चाहिये। वक्ताको व्रत ग्रहण करनेके लिये एक दिन पहले ही क्षौर करा लेना चाहिये। सप्ताह-प्रारम्भ होनेके एक दिन पूर्व ही देवस्थापन, पूजनादि कर लेना उत्तम है। वक्ता प्रतिदिन सूर्योदयसे पूर्व ही स्नानादि करके संक्षेपसे सन्ध्या-वन्दनादिका नियम पूरा कर ले और कथामें कोई विघ्न न आये, इसके लिये नित्यप्रति गणेशजीका पूजन कर लिया करे।

श्रीमद्भागवतकी जी की आरती Shrimad Bhagwat’s Aarti

आरती अतिपावन पुराण की।
धर्म भक्ति विज्ञान खान की।।

महापुराण भागवत निर्मल।
शुक-मुख-विगलित निगम-कल्प-फल।।

परमानन्द-सुधा रसमय फल।
लीला रति रस रसिनधान की।।

आरती अतिपावन पुराण की।
धर्म भक्ति विज्ञान खान की।।

कलिमल मथनि त्रिताप निवारिणी।
जन्म मृत्युमय भव भयहारिणी ।।

सेवत सतत सकल सुखकारिणी।
सुमहौषधि हरि चरित गान की।।

आरती अतिपावन पुराण की।
धर्म भक्ति विज्ञान खान की।।

विषय विलास विमोह विनाशिनी।
विमल विराग विवेक विनाशिनी।।

भागवत तत्व रहस्य प्रकाशिनी।
परम ज्योति परमात्मा ज्ञान को।।

आरती अतिपावन पुराण की।
धर्म भक्ति विज्ञान खान की।।

परमहंस मुनि मन उल्लासिनी।
रसिक ह्रदय रस रास विलासिनी।।

भुक्ति मुक्ति रति प्रेम सुदासिनी।
कथा अकिंचन प्रिय सुजान की।।

आरती अतिपावन पुराण की।
धर्म भक्ति विज्ञान खान की।।

Shrimad Bhagwat Mahapuran

श्रीमद् भागवत महापुराण सटीक 1 Bhagwat Mahapuran Gita Press

श्रीमद् भागवत महापुराण सटीक 2 Bhagwat Mahapuran Hindi

Shrimad Bhagwat Mahapuran In English Part 1

Shrimad Bhagwat Mahapuran In English Part 2

श्रीमद्भागवत महापुराण नेपाली Shreemad Bhagwat Mahapuran Nepali

શ્રીમદ ભાગવત મહાપુરાણ ગુજરાતી Shrimad Bhagwat Mahapuran In Gujarati

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