पद्मपुराण

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पद्मपुराण का परिचय Padma Purana

शास्त्रोंमें पुराणोंकी बड़ी महिमा है। उन्हें साक्षात् श्रीहरिका रूप बताया गया है। जिस प्रकार सम्पूर्ण जगत्‌को आलोकित करनेके लिये भगवान् सूर्यरूपमें प्रकट होकर हमारे बाहरी अन्धकारको नष्ट करते हैं, उसी प्रकार हमारे हृदयान्धकार – भीतरी अन्धकारको दूर करनेके लिये श्रीहरि ही पुराण-विग्रह धारण करते हैं। जिस प्रकार त्रैवर्णिकोंके लिये वेदोंका स्वाध्याय नित्य करनेकी विधि है, उसी प्रकार पुराणोंका श्रवण भी सबको नित्य करना चाहिये- ‘पुराणं शृणुयान्नित्यम्’ । पुराणोंमें अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष – चारोंका बहुत ही सुन्दर निरूपण हुआ है और चारोंका एक-दूसरेके साथ क्या सम्बन्ध है- इसे भी भलीभाँति समझाया गया है। श्रीमद्भागवतमें लिखा है-

धर्मस्य ह्यापवर्ग्यस्य नार्थोऽर्थायोपकल्पते । नार्थस्य धर्मैकान्तस्य कामो लाभाय हि स्मृतः ।। कामस्य नेन्द्रियप्रीतिर्लाभो जीवेत यावता । जीवस्य तत्त्वजिज्ञासा नार्थो यश्चेह कर्मभिः ॥

(१।२।९-१०)

‘धर्मका फल है- संसारके बन्धनोंसे मुक्ति, भगवान्‌की प्राप्ति। उससे यदि कुछ सांसारिक सम्पत्ति उपार्जन कर ली तो यह उसकी कोई सफलता नहीं है। इसी प्रकार धनका फल है

पद्मपुराणमें ही लिखा है

यो विद्याच्चतुरो वेदान् साङ्गोपनिषदो द्विजः ।

पुराणं च विजानाति यः स तस्माद्विचक्षणः ॥

(सृष्टि० २।५०-५१)

पुराणोंमें पद्मपुराणका स्थान बहुत ऊँचा है। इसे श्री भगवान्‌के पुराणरूप विग्रह का हृदय स्थानीय माना गया है ‘हृदयं पद्मसंज्ञकम्।’ वैष्णवोंका तो यह सर्वस्व ही है। इसमें भगवान् विष्णुका माहात्म्य विशेषरूप से वर्णित होनेके कारण ही यह वैष्णवोंको अधिक प्रिय है। परन्तु पद्मपुराणके अनुसार सर्वोपरि देवता भगवान् विष्णु होनेपर भी उनका ब्रह्माजी तथा भगवान् शङ्करके साथ अभेद प्रतिपादित हुआ है। उसके अनुसार स्वयं भगवान् विष्णु ही ब्रह्मा होकर संसारकी सृष्टिमें प्रवृत्त होतेहैं तथा जबतक कल्पकी स्थिति बनी रहती है, तबतक वे भगवान् विष्णु ही युग-युगमें अवतार धारण करके समूची सृष्टिकी रक्षा करते हैं। पुनः कल्पका अन्त होनेपर वे ही अपना तमःप्रधान रुद्ररूप प्रकट करते हैं और अत्यन्त भयानक आकार धारण करके सम्पूर्ण प्राणियोंका संहार करते हैं। इस प्रकार सब भूतोंका नाश करके संसारको एकार्णवके जलमें निमग्न कर वे सर्वरूपधारी भगवान् स्वयं शेषनागकी शय्यापर शयन करते हैं। पुनः जागनेपर ब्रह्माका रूप धारण करके वे नये सिरेसे संसारकी सृष्टि करने लगते हैं। इस तरह एक ही भगवान् जनार्दन सृष्टि, पालन और संहार करनेके कारण ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव नाम धारण करते हैं। * पद्मपुराणमें तो भगवान् श्रीकृष्णके यहाँतक वचन हैं-सूर्य, शिव, गणेश, विष्णु और शक्तिके उपासक सभी मुझको ही प्राप्त होते हैं। जैसे वर्षाका जल सब ओरसे समुद्रमें ही जाता है, वैसे ही इन पाँचों रूपोंके उपासक मेरे ही पास आते हैं।

पद्मपुराण3
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पद्मपुराणमें तिलक की विधि और पाँच प्रकार की पूजा का वर्णन

पद्मपुराणमें भगवान् विष्णुके माहात्प्यके साथ- साथ भगवान् श्रीराम तथा श्रीकृष्णके अवतार-चरित्रों तथा उनके परात्पर रूपोंका भी विशदरूपसे वर्णन हुआ है। पातालखण्डमें भगवान् श्रीरामके अश्वमेध यज्ञकी कथाका तो बहुत ही विस्तृत और अद्भुत वर्णन है। इतना ही नहीं, उसमें श्रीअयोध्या और श्रीधाम वृन्दावनका माहात्म्य, श्रीराधा-कृष्ण एवं उनके पार्षदोंका वर्णन, वैष्णवोंकी द्वादशशुद्धि, पाँच प्रकार की पूजा, शालग्राम के स्वरूप और महिमाका वर्णन, तिलक की विधि, भगवत्सेवा-अपराध और उनसे छूटनेके उपाय, तुलसीके वृक्ष तथा भगवन्नाम-कीर्तनकी महिमा, ■ भगवान्‌के चरण-चिह्नोंका परिचय तथा प्रत्येक मासमें भगवान्‌की विशेष आराधनाका वर्णन, मन्त्रचिन्तामणिका उपदेश तथा उसके ध्यान आदिका वर्णन, दीक्षा-विधि, निर्गुण एवं सगुण-ध्यानका वर्णन, भगवद्भक्तिके लक्षण, वैशाख-मासमें माधव-पूजनकी महिमा, वैशाख, ज्येष्ठ और आषाढ़में जलस्थ श्रीहरिके पूजनका माहात्म्य, अश्वत्थकी महिमा, भगवान् श्रीकृष्णका ध्यान, पवित्रारोपणकी विधि, महिमा तथा भिन्न-भिन्न मासोंमें श्रीहरिकी पूजामें काम आनेवाले विविध पुष्पोंका वर्णन, बदरिकाश्रम तथा नारायणकी महिमा, गङ्गाकी महिमा, त्रिरात्र तुलसीव्रतकी विधि और महिमा, गोपीचन्दनके तिलककी महिमा, जन्माष्टमी व्रतकी महिमा, बारह महीनोंकी एकादशियोंके नाम तथा माहात्म्य, एकादशीकी विधि, उत्पत्ति-कथा और महिमाका वर्णन, भगवद्- भक्तिकी श्रेष्ठता, वैष्णवोंके लक्षण और महिमा, भगवान् विष्णुके दसों अवतारोंकी कथा, श्रीनृसिंहचतुर्दशीके व्रतकी महिमा, श्रीमद्भगवद्गीताके अठारहों अध्यायोंका अलग-अलग माहात्म्य, श्रीमद्भागवतका माहात्म्य तथा श्रीमद्भागवतके सप्ताह-पारायणकी विधि, नीलाचल- निवासी भगवान् पुरुषोत्तमकी महिमा आदि-आदि ऐसे अनेकों विषयोंका समावेश हुआ है, जो वैष्णवोंके लिये बड़े ही महत्त्वके हैं। इसीलिये वैष्णवोंमें पद्मपुराणका विशेष समादर है।

इनके अतिरिक्त सृष्टिक्रमका वर्णन, युग आदिका काल-मान, ब्रह्माजीके द्वारा रचे हुए विविध साँका वर्णन, मरीचि आदि प्रजापति, रुद्र तथा स्वायम्भुव मनु आदिकी उत्पत्ति और उनकी सन्तान-परम्पराका वर्णन, देवता, दानव, गन्धर्व, नाग और राक्षसोंकी उत्पत्तिका वर्णन, मरुद्रणोंकी उत्पत्ति तथा चौदह मन्वन्तरोंका वर्णन, पृथुके चरित्र तथा सूर्यवंशका वर्णन, पितरों तथा श्राद्धके विभिन्न अङ्गोंका वर्णन, श्राद्धोपयोगी तीर्थोंका वर्णन, विविध श्राद्धोंकी विधि, चन्द्रमाकी उत्पत्ति, पुष्कर आदि विविध तीर्थोंकी महिमा तथा उन तीर्थोंमें वास करने- वालोंके द्वारा पालनीय नियम, आश्रमधर्मका निरूपण, अन्नदान एवं दम आदि धर्मोकी प्रशंसा, नाना प्रकारके व्रत, स्त्रान और तर्पणकी विधि, तालाबोंकी प्रतिष्ठा, वृक्षारोपणकी विधि, सत्सङ्गकी महिमा, उत्तम ब्राह्मण तथा गायत्री मन्त्रकी महिमा, अधम ब्राह्मणोंका वर्णन, ब्राह्मणोंके जीविकोपयोगी कर्म और उनका महत्त्व तथा गौओंकी महिमा और गोदानका फल, द्विजोचित आचार तथा शिष्टाचारका वर्णन, पितृभक्ति, पातिव्रत्य, समता, अद्रोह और विष्णु-भक्तिरूप पाँच महायज्ञोंके विषयमें पाँच आख्यान, पतिव्रताकी महिमा और कन्यादानका फल, सत्यभाषणकी महिमा, पोखरे खुदाने, वृक्ष लगाने, पीपलकी पूजा करने, पौंसले चलाने, गोचरभूमि छोड़ने, देवालय बनवाने और देवताओंकी पूजा करनेका माहात्म्य, रुद्राक्षकी उत्पत्ति और महिमा, श्रीगङ्गाजीकी उत्पत्ति, गणेशजीकी महिमा और उनकी स्तुति एवं पूजाका फल, मनुष्ययोनिमें उत्पन्न हुए दैत्य एवं देवताओंके लक्षण, भगवान् सूर्यका तथा संक्रान्तिमें दानका माहात्म्य, भगवान् सूर्यकी उपासना और उसका फल, विविध प्रकारके पुत्रोंका वर्णन, ब्रह्मचर्य, साङ्गोपाङ्गधर्म तथा धर्मात्मा एवं पापियोंकी मृत्युका वर्णन, नैमित्तिक तथा आभ्युदयिक आदि दानोंका वर्णन, देहकी उत्पत्ति, उसकी अपवित्रता, जन्म-मरण और जीवनके कष्ट तथा संसारकी दुःखरूपताका वर्णन, पापों और पुण्योंके फलोंका वर्णन, नरक और स्वर्गमें जानेवाले पुरुषोंका वर्णन, ब्रह्मचारीके पालन करने योग्य नियम, ब्रह्मचारी शिष्यके धर्म, स्नातक एवं गृहस्थके धर्मोका वर्णन, गृहस्थधर्ममें भक्ष्याभक्ष्यका विचार तथा दानधर्मका वर्णन, वानप्रस्थ एवं संन्यास-आश्रमोंके धर्मोका वर्णन, संन्यासीके नियम, स्त्री-सङ्गकी निन्दा, भजनकी महिमा, ब्राह्मण, पुराण और गङ्गाकी महत्ता, जन्म आदिके दुःख तथा हरिभजनकी आवश्यकता, तीर्थयात्राकी विधि, माघ, वैशाख तथा कार्तिक मासोंका माहात्म्य, यमराजकी आराधना, गृहस्थाश्रस्‌की प्रशंसा, दीपावली-कृत्य, गोवर्धन पूजा तथा यमद्वितीयाके दिन करने योग्य कृत्योंका वर्णन, वैराग्यसे भगवद्भजनमें प्रवृत्ति आदि-आदि अनेकों सर्वोपयोगी तथा सबके लिये ज्ञातव्य एवं धारण करने योग्य धार्मिक विषयोंका वर्णन हुआ है, जिनके कारण पद्मपुराण आस्तिक हिंदूमात्रके लिये परम आदरकी वस्तु है।

पद्मपुराण१
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पद्मपुराण की संरचना Structure of Padmapuran

पद्मपुराण में कुल में ५५००० से भी अधिक श्लोक हैं, जो इसे अन्य पुराणों की तुलना में बहुत विस्तृत बनाता है। इसे मुख्यतः छह खंडों में विभाजित किया गया है:

  1. सृष्टि खंड: इसमें ब्रह्मांड की उत्पत्ति और सृष्टि की कथाएँ हैं।
  2. भूमि खंड: इसमें पृथ्वी, उसके भूगोल और तीर्थ स्थानों का वर्णन है।
  3. स्वर्ग खंड: इसमें देवताओं, उनकी कथाएँ और स्वर्ग के लोकों का विवरण है।
  4. पाताल खंड: इसमें पाताल लोक और वहां रहने वाले असुरों का वर्णन है।
  5. उत्तर खंड: इसमें धर्म, नीति, व्रत और उपासना के नियम बताए गए हैं।
  6. काल खंड: इसमें समय के महत्व और उसकी गणना का विवरण है।

पद्मपुराण की प्रमुख कथाएँ Major stories of Padmapuran

पद्मपुराण में कई रोचक और शिक्षाप्रद कथाएँ हैं जो हमें नैतिकता और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती हैं। इनमें से कुछ प्रमुख कथाएँ निम्नलिखित हैं:

हिरण्याक्ष और वराह अवतार Hiranyaksha and Varaha Avatar

इस कथा में हिरण्याक्ष नामक असुर ने पृथ्वी को पाताल लोक में छिपा दिया था। तब भगवान विष्णु ने वराह अवतार धारण कर पृथ्वी को बचाया और हिरण्याक्ष का वध किया। यह कथा हमें सिखाती है कि धर्म और सत्य की रक्षा के लिए भगवान सदा उपस्थित रहते हैं।

दक्ष यज्ञ और सती की कथा Story of Daksh Yagya and Sati

राजा दक्ष द्वारा आयोजित यज्ञ में भगवान शिव को आमंत्रित न करने और सती के आत्मदाह की कथा पद्मपुराण में विस्तार से वर्णित है। इस कथा से हमें यह सिखने को मिलता है कि अहंकार और अनादर का परिणाम कितना भयंकर हो सकता है।

रामायण की कथा Story of Ramayana

पद्मपुराण में रामायण की कथा का भी विस्तृत वर्णन है। भगवान राम के जीवन की घटनाओं, उनके वनवास, रावण वध और सीता की अग्निपरीक्षा का सुंदर विवरण मिलता है। यह कथा हमें कर्तव्य, धर्म और मर्यादा का पालन करने की प्रेरणा देती है।

पद्मपुराण की उपासना विधियाँ Padma Purana Worship Methods

पद्मपुराण में विभिन्न देवताओं की उपासना की विधियाँ वर्णित हैं। इनमें से कुछ प्रमुख उपासना विधियाँ निम्नलिखित हैं:

भगवान शिव की उपासना

भगवान शिव की उपासना करने के लिए पद्मपुराण में रुद्राभिषेक और महामृत्युंजय मंत्र का विशेष महत्व बताया गया है। शिवलिंग की पूजा और बिल्व पत्र अर्पण करने से भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है।

भगवान विष्णु की उपासना

भगवान विष्णु की उपासना के लिए विष्णु सहस्रनाम का पाठ और तुलसी के पत्तों का अर्पण करने का विशेष महत्व है। पद्मपुराण में भगवान विष्णु की उपासना की विधि का विस्तृत वर्णन है।

पद्मपुराण हिंदी में Padma Purana In Hindi Padma, Puran In English

पद्मपुराण
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પદ્મપુરાણ ગુજરાતી Padma Puran In Gujarati

पद्मपुराण पर आधारित अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न और उनके उत्तर: Padma Purana FAQs

Q1: पद्मपुराण किसने रचा था?

A1: पद्मपुराण की रचना महर्षि वेदव्यास ने की थी।

Q2: पद्मपुराण में कितने खंड हैं?

A2: पद्मपुराण में कुल 5 खंड हैं: सृष्टिखंड, भूखण्ड, स्वर्गखंड, पातालखंड, और उत्तरखंड।

Q3: पद्मपुराण का मुख्य विषय क्या है?

A3: पद्मपुराण का मुख्य विषय सृष्टि की उत्पत्ति, देवी-देवताओं की कथाएं, और धर्म, नीति तथा भक्ति का महत्त्व है।

Q4: पद्मपुराण में विष्णु की किस अवतार की कथा विशेष रूप से वर्णित है?

A4: पद्मपुराण में भगवान विष्णु के राम अवतार की कथा विशेष रूप से वर्णित है।

Q5: पद्मपुराण का पाठ करने से क्या लाभ होता है?

A5: पद्मपुराण का पाठ करने से धार्मिक ज्ञान की प्राप्ति, पुण्य का अर्जन, और आध्यात्मिक शांति मिलती है।

Q6: पद्मपुराण का सबसे बड़ा खंड कौन सा है?

A6: पद्मपुराण का सबसे बड़ा खंड ‘उत्तरखंड’ है।

Q7: पद्मपुराण में किस देवी की महिमा का वर्णन है?

A7: पद्मपुराण में देवी लक्ष्मी की महिमा का विस्तृत वर्णन है।

Q8: पद्मपुराण का नाम ‘पद्मपुराण’ क्यों पड़ा?

A8: पद्मपुराण का नाम ‘पद्मपुराण’ इसलिए पड़ा क्योंकि इसमें कमल (पद्म) से उत्पन्न होने वाले भगवान विष्णु और उनके विभिन्न रूपों का वर्णन किया गया है।

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