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SanatanWeb.com > Blog > गीतकाव्य > आरती > ॐ जय जगदीश हरे आरती
आरतीश्री विष्णु स्तोत्र

ॐ जय जगदीश हरे आरती

Sanatani
Last updated: जनवरी 3, 2026 7:21 अपराह्न
Sanatani
Published: जनवरी 3, 2026
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ॐ जय जगदीश हरे आरती

ॐ जय जगदीश हरे आरती हिंदू धर्म में सबसे लोकप्रिय और व्यापक रूप से गाई जाने वाली आरतियों में से एक है। यह भगवान विष्णु को समर्पित है, जिन्हें विश्व के पालनहार के रूप में पूजा जाता है। यह आरती भक्तों के बीच विशेष रूप से प्रिय है और इसे घरों, मंदिरों और धार्मिक समारोहों में उत्साह के साथ गाया जाता है। ॐ जय जगदीश हरे आरती की रचना 19वीं शताब्दी में पंडित शारदा शरण त्रिपाठी द्वारा की गई थी। ऐसा माना जाता है कि उन्होंने इस आरती को भगवान विष्णु के प्रति अपनी भक्ति और श्रद्धा को व्यक्त करने के लिए लिखा था। यह आरती अपनी सरल भाषा और गहन भक्ति भाव के कारण जल्द ही लोकप्रिय हो गई। यह हिंदी भाषा में लिखी गई है, जिसके कारण इसे समझना और गाना आसान है। यह आरती विशेष रूप से उत्तर भारत में बहुत प्रचलित है, लेकिन अब यह पूरे भारत और विश्व में बसे हिंदू समुदायों में गाई जाती है।

Contents
  • ॐ जय जगदीश हरे आरती
  • Om Jai Jagdish Hare
  • आरती का महत्व
    • आरती का गायन और विधि

Om Jai Jagdish Hare

ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी ! जय जगदीश हरे ।
भक्त जनों के संकट, क्षण में दूर करे ॥ ॐ जय जगदीश हरे…

जो ध्यावे फल पावे, दुःख विनसे मन का, स्वामी दुःख विनसे मन का ।
सुख सम्पत्ति घर आवे, कष्ट मिटे तन का ॥ ॐ जय जगदीश हरे…

मात-पिता तुम मेरे, शरण गहूँ मैं किसकी, स्वामी शरण गहूँ मैं किसकी ।
तुम बिन और न दूजा, आस करूँ मैं जिसकी ॥ ॐ जय जगदीश हरे…

तुम पूरण परमात्मा, तुम अन्तर्यामी, स्वामी तुम अन्तर्यामी ।
पारब्रह्म परमेश्वर, तुम सबके स्वामी ॥ ॐ जय जगदीश हरे…

तुम करुणा के सागर, तुम पालन-कर्ता, स्वामी तुम पालन-कर्ता ।
मैं मूरख खल कामी, मैं सेवक तुम स्वामी, कृपा करो भर्ता॥ ॐ जय जगदीश हरे…

तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति, स्वामी सबके प्राणपति ।
किस विधि मिलूँ गोसाईं, तुमको मैं कुमति ॥ ॐ जय जगदीश हरे…

दीनबन्धु दुखहर्ता, तुम ठाकुर मेरे, स्वामी तुम रक्षक मेरे ।
अपने हाथ उठा‌ओ, अपनी शरण लगाओ, द्वार पड़ा मैं तेरे ॥ ॐ जय जगदीश हरे…

विषय-विकार मिटा‌ओ, पाप हरो देवा, स्वमी कष्ट हरो देवा ।
श्रद्धा-भक्ति बढ़ा‌ओ, श्रद्धा-प्रेम बढ़ा‌ओ, सन्तन की सेवा ॥ ॐ जय जगदीश हरे…

तन मन धन सब है तेरा, स्वामी सब कुछ है तेरा ।
तेरा तुझको अर्पण, क्या लागे मेरा ॥ ॐ जय जगदीश हरे…

श्री जगदीशजी की आरती, जो कोई नर गावे, स्वामी जो कोई नर गावे ।
कहत शिवानन्द स्वामी, सुख संपत्ति पावे ॥ ॐ जय जगदीश हरे…

ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी ! जय जगदीश हरे ।
भक्त जनों के संकट, क्षण में दूर करे ॥ ॐ जय जगदीश हरे…

ॐ जय जगदीश हरे आरती लिरिक्स

आरती का महत्व

ॐ जय जगदीश हरे आरती भगवान विष्णु के विभिन्न गुणों और उनकी महिमा का वर्णन करती है। यह भक्तों को उनके प्रति श्रद्धा और समर्पण की भावना को प्रबल करने में मदद करती है। इस आरती को गाने से मन को शांति मिलती है और आत्मा का भगवान के साथ गहरा संबंध स्थापित होता है। यह आरती न केवल धार्मिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से भी एकजुटता का प्रतीक है। इसे सामूहिक रूप से गाने से भक्तों में आपसी प्रेम और भाईचारा बढ़ता है।

आरती का गायन और विधि

ॐ जय जगदीश हरे आरती को प्रायः सायंकाल या प्रभात में पूजा के अंत में गाया जाता है। इसे गाने की प्रक्रिया निम्नलिखित है:

  1. पूजा की तैयारी: भक्त पहले भगवान विष्णु की मूर्ति या चित्र के सामने दीपक, अगरबत्ती, और फूल आदि से पूजा करते हैं।
  2. दीप प्रज्वलन: एक थाली में घी या तेल का दीपक जलाया जाता है, जिसमें कपूर भी डाला जा सकता है।
  3. आरती का गायन: भक्त सामूहिक रूप से या एकल रूप से इस आरती को गाते हैं। गायन के दौरान दीपक को भगवान के सामने गोलाकार गति में घुमाया जाता है।
  4. प्रसाद वितरण: आरती के बाद प्रसाद भक्तों में बांटा जाता है।

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