नवग्रह कवचम्(Navagraha Kavacham) एक महत्वपूर्ण हिन्दू मंत्र है जो नवग्रहों (सूर्य, चंद्रमा, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु और केतु) की शांति और इनके दुष्प्रभावों से बचाव के लिए पढ़ा जाता है। यह कवच व्यक्ति को मानसिक, शारीरिक, और आत्मिक शांति प्रदान करने के साथ-साथ जीवन में आने वाली कठिनाइयों और बाधाओं से सुरक्षा भी प्रदान करता है। नवग्रह कवचम् का पाठ करने से ग्रहों के अच्छे प्रभाव बढ़ते हैं और बुरे प्रभावों से मुक्ति मिलती है।
नवग्रह कवचम् के महत्व
नवग्रहों का हमारे जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ता है। हिन्दू धर्म के अनुसार, हर व्यक्ति के जीवन में किसी न किसी ग्रह का प्रभाव रहता है, जो व्यक्ति के स्वास्थ्य, कार्य, परिवार, और वित्तीय स्थिति पर असर डालता है। जब ये ग्रह शुभ होते हैं, तो व्यक्ति की स्थिति अच्छी रहती है, लेकिन जब ये ग्रह अशुभ होते हैं, तो जीवन में कठिनाईयां और समस्याएं आती हैं। नवग्रह कवचम् का नियमित पाठ इन समस्याओं से निजात दिलाने में सहायक होता है।
- शारीरिक सुरक्षा: यह कवच व्यक्ति को शारीरिक कष्टों और बीमारियों से बचाता है।
- मानसिक शांति: ग्रहों के अशुभ प्रभाव से मानसिक अशांति, तनाव और अवसाद दूर होता है।
- आध्यात्मिक उन्नति: यह कवच व्यक्ति को आध्यात्मिक उन्नति और शांति की दिशा में मार्गदर्शन प्रदान करता है।
- व्यक्तिगत जीवन: पारिवारिक जीवन में सुख-शांति और समृद्धि बढ़ाने के लिए भी यह कवच उपयोगी है।
- धन और समृद्धि: यह आर्थिक उन्नति के लिए भी सहायक माना जाता है।
नवग्रह कवचम्
शिरो मे पातु मार्ताण्डः कपालं रोहिणीपतिः।
मुखमङ्गारकः पातु कण्ठश्च शशिनन्दनः।
बुद्धिं जीवः सदा पातु हृदयं भृगुनन्दनः।
जठरञ्च शनिः पातु जिह्वां मे दितिनन्दनः।
पादौ केतुः सदा पातु वाराः सर्वाङ्गमेव च।
तिथयोऽष्टौ दिशः पान्तु नक्षत्राणि वपुः सदा।
अंसौ राशिः सदा पातु योगाश्च स्थैर्यमेव च।
गुह्यं लिङ्गं सदा पान्तु सर्वे ग्रहाः शुभप्रदाः।
अणिमादीनि सर्वाणि लभते यः पठेद् ध्रुवम्।
एतां रक्षां पठेद् यस्तु भक्त्या स प्रयतः सुधीः।
स चिरायुः सुखी पुत्री रणे च विजयी भवेत्।
अपुत्रो लभते पुत्रं धनार्थी धनमाप्नुयात्।
दारार्थी लभते भार्यां सुरूपां सुमनोहराम्।
रोगी रोगात् प्रमुच्येत बद्धो मुच्येत बन्धनात्।
जले स्थले चान्तरिक्षे कारागारे विशेषतः।
यः करे धारयेन्नित्यं भयं तस्य न विद्यते।
ब्रह्महत्या सुरापानं स्तेयं गुर्वङ्गनागमः।
सर्वपापैः प्रमुच्येत कवचस्य च धारणात्।
नारी वामभुजे धृत्वा सुखैश्वर्यसमन्विता।
काकवन्ध्या जन्मवन्ध्या मृतवत्सा च या भवेत्।
बह्वपत्या जीववत्सा कवचस्य प्रसादतः।
नवग्रह कवचम् के लाभ
- ग्रह दोष निवारण: यह कवच व्यक्ति के जीवन में ग्रहों के दोषों को समाप्त करता है और शुभ फल देता है।
- शांति और समृद्धि: इससे जीवन में शांति और समृद्धि आती है।
- कष्टों का नाश: यह ग्रहों के दुष्प्रभाव से होने वाले कष्टों से मुक्ति दिलाता है।
- समय का लाभ: जीवन में आने वाले अच्छे समय का पूरा लाभ लेने के लिए यह कवच लाभकारी है।
नवग्रह कवचम् पर पूछे जाने वाले प्रश्न
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नवग्रह कवचम् क्या है?
नवग्रह कवचम् एक प्राचीन हिन्दू मंत्र है, जिसे नवग्रहों (सूर्य, चन्द्रमा, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु और केतु) की शांति और अच्छे प्रभावों के लिए जपते हैं। यह कवच व्यक्ति को ग्रहों की प्रतिकूल स्थिति से सुरक्षा प्रदान करता है और उसे जीवन में समृद्धि, सफलता और शांति प्राप्त करने में मदद करता है।
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नवग्रह कवचम् का पाठ कब करना चाहिए?
नवग्रह कवचम् का पाठ विशेष रूप से उन दिनों में करना लाभकारी होता है, जब ग्रहों की स्थिति अशुभ हो या जब व्यक्ति को ग्रहों के दुष्प्रभावों का सामना करना पड़ रहा हो। इसे रविवार से शनिवार तक किसी भी दिन सूर्योदय के समय या विशेष नक्षत्रों में पाठ किया जा सकता है। यह मंत्र सुबह के समय अधिक प्रभावी होता है।
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नवग्रह कवचम् का लाभ क्या है?
नवग्रह कवचम् के जप से व्यक्ति को नवग्रहों के दुष्प्रभावों से मुक्ति मिलती है। यह मंत्र मानसिक शांति, शारीरिक स्वास्थ्य, समृद्धि, और परिवार में सुख-संपत्ति लाने के लिए लाभकारी माना जाता है। इसके नियमित जप से ग्रहों के शुभ प्रभाव बढ़ते हैं और जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आते हैं।
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क्या नवग्रह कवचम् का जप व्यक्तिगत रूप से किया जा सकता है?
जी हां, नवग्रह कवचम् का जप किसी भी व्यक्ति द्वारा व्यक्तिगत रूप से किया जा सकता है। हालांकि, यदि व्यक्ति विशेष ग्रहों के प्रभाव से प्रभावित हो, तो उसे किसी योग्य गुरु से मार्गदर्शन प्राप्त करना अच्छा रहता है। जप के लिए विशेष मंत्रों और विधियों का पालन करना आवश्यक होता है, जिससे इसका पूरा लाभ मिल सके।
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नवग्रह कवचम् का जप करने की सही विधि क्या है?
नवग्रह कवचम् का जप करने के लिए सबसे पहले शुद्ध स्थान पर बैठकर ध्यान लगाना चाहिए। जप करते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि मन एकाग्र हो और शरीर शुद्ध हो। एक निश्चित संख्या में जप (जैसे 108 बार) करना उत्तम रहता है। यह मंत्र जपते समय विशेष रूप से शांति और धैर्य बनाए रखना महत्वपूर्ण होता है।



