जानिए सूर्यपुत्र शनिदेव के जन्म से जुडी कथा (शनि जयंती) के बारे में.

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शनि जयंती को शनि देव की जयंती के रूप में चिह्नित किया जाता है। शनि जयंती को शनि अमावस्या के नाम से भी जाना जाता है।  शनि देव, सूर्यदेव के पुत्र हैं और शनि ग्रह और सप्ताह के दिन शनिवार को नियंत्रित करते हैं। शनैश्चर की शरीर-कान्ति इन्द्रनीलमणि के समान है। इनके सिर पर स्वर्ण मुकुट, गले में माला तथा शरीर पर नीले रंग के वस्त्र सुशोभित हैं। ये गिद्ध पर सवार रहते हैं। हाथों में क्रमश: धनुष, बाण. त्रिशूल और वरमुद्रा धारण करते हैं। 

शनि भगवान सूर्य तथा छाया (संवर्णा) के पुत्र हैं। ये क्रूर ग्रह माने जाते हैं। इनकी दृष्टि में जो क्रूरता है, वह इनकी पत्नी के शाप के कारण है। ब्रह्मपुराण में इनकी कथा इस प्रकार आयी है- बचपन से ही शनि देवता भगवान श्रीकृष्ण के परम भक्त थे। वे श्रीकृष्ण के अनुराग में निमग्न रहा करते थे। वयस्क होने पर इनके पिता ने चित्ररथ की कन्या से इनका विवाह कर दिया। इनकी पत्नी सती-साध्वी और परम तेजस्विनी थी। एक रात वह ऋतु स्नान करके पुत्र प्राप्ति की इच्छा से इनके पास पहुँची, पर यह श्रीकृष्ण के ध्यान में निमग्न थे। इन्हें बाह्य संसार की सुधि ही नहीं थी। पत्नी प्रतीक्षा करके थक गई। उसका ऋतुकाल निष्फल हो गया। इसलिए उसने क्रुद्ध होकर शनिदेव को शाप दे दिया कि आज से जिसे तुम देख लोगे, वह नष्ट हो जायेगा। ध्यान टूटने पर शनिदेव ने अपनी पत्नी को मनाया। पत्नी को भी अपनी भूल पर पश्चाताप हुआ, किन्तु शाप के प्रतीकार की शक्ति उसमें न थी, तभी से शनि देवता अपना सिर नीचा करके रहने लगे क्योंकि वह नहीं चाहते थे कि इनके द्वारा किसी का अनिष्ट हो।
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शनि जयंती कब मनाई जाती है।

उत्तर भारतीय पूर्णिमांत कैलेंडर के अनुसार ज्येष्ठ मास की अमावस्या तिथि को शनि जयंती मनाई जाती है। दक्षिण भारतीय अमावस्यांत कैलेंडर के अनुसार शनि जयंती वैशाख मास की अमावस्या तिथि को पड़ती है। यह चंद्र मास का नाम है जो अलग-अलग है और दोनों प्रकार के कैलेंडर में शनि जयंती एक ही दिन पड़ती है।

शनि जयंती वट सावित्री व्रत के साथ मेल खाती है जो अधिकांश उत्तर भारतीय राज्यों में ज्येष्ठ अमावस्या के दौरान मनाया जाता है। शनि जयंती पर भक्त भगवान शनि को प्रसन्न करने के लिए उपवास या उपवास रखते हैं और भगवान शनि का आशीर्वाद लेने के लिए शनि मंदिरों में जाते हैं। ऐसा माना जाता है कि भगवान शनि निष्पक्ष न्याय में विश्वास करते हैं और प्रसन्न होने पर अपने भक्त को सौभाग्य और भाग्य का आशीर्वाद देते हैं। जिन लोगों पर शनि देव की कृपा नहीं होती है, वे जीवन में अपनी मेहनत का कोई पुरस्कार प्राप्त किए बिना वर्षों तक मेहनत करते हैं।

शनि देव को प्रसन्न करने के लिए हवन, होम और यज्ञ करने के लिए बहुत उपयुक्त दिन है। शनि तैलाभिषेकम और शनि शांति पूजा शनि जयंती के दौरान किए जाने वाले सबसे महत्वपूर्ण समारोह हैं। कुंडली में शनि दोष, जिसे साढ़े साती के नाम से जाना जाता है, के प्रभाव को कम करने के लिए उपरोक्त अनुष्ठान किए जाते हैं।

शनि जयंती को शनिश्चर जयंती के नाम से भी जाना जाता है।
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शनि देव और सूर्य देव का विस्तृत वर्णन मत्स्य पुराण के अनुसार.

सूर्यदेव को उनकी चार पत्नियों से प्राप्त कुल नौ संतानों में से एक शनि भी हैं। चूंकि सूर्य की उत्पत्ति महर्षि कश्यप व देवमाता अदिति के संयोग से पूर्वकाल में हुई थी। अतः कश्यप गोत्र में उत्पन्न होने के कारण शनि की स्तुति काश्यपेयं महद्युतिम् कहकर भी की जाती है। शनि की उत्पत्ति के संदर्भ में कुछ लोगों का अभिमत है कि शनि की उत्पत्ति महर्षि कश्यप के सान्निध्य में व उनके ही अभिभाकत्व में संपन्न एक यज्ञ के दौरान हुई थी।

मत्स्य पुराण के ग्यारहवें अध्याय में सूर्यवंश परंपरा का वर्णन करते हुए सूतजी ने जो कथा ऋषियों को बतलाई थी, वही कथा यहां दी जा रही है। इस कथा में शनि की उत्पत्ति के बारे में पुष्ट संकेत मिलते हैं।

कथा के अनुसार सूर्य के चार पत्नियां थीं। उनमें से संज्ञा विश्वकर्मा (त्वष्टा) की पुत्री थी। जबकि राज्ञी रेवत की कन्या थी। एक अन्य पत्नी प्रभा थी। चौथी पत्नी छाया संज्ञा के ही शरीर से उत्पन्न हुई थी।

सूर्य पत्नी संज्ञा से वैवस्वत मनु तथां यम नाम के दो पुत्र व यमुना नाम की कन्या उत्पन्न हुई। राज्ञी के रैवत नामक पुत्र व प्रभा के प्रभात नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। इनमें से यम व यमुना जुड़वां उत्पन्न हुए थे। चौथी पत्नी छाया के गर्भ से संज्ञापुत्र मनु के समान ही रंग-रूप वाला पुत्र उत्पन्न हुआ जो सावर्णि कहलाया। इसके बाद सूर्य ने शनि नामक पुत्र व तपती तथा विष्टि नामक कन्याओं को भी छाया के द्वारा ही उत्पन्न किया।

छाया की उत्पत्ति का भी एक कारण था। वह कथा कुछ इस तरह है कि भुवन भास्कर (सूर्य) के तेज को संज्ञा सहन नहीं कर सकी तब उसने अपने ही अंग से छाया नामक अतिसुन्दर स्त्री को उत्पन्न किया और उससे कहा, “हे छाया! तुम मेरे पतिदेव की सेवा-शुश्रूषा करती रहना तथा मेरी संतानों का भी पालन- पोषण तुम मातृवत् ही करना।”

तब छाया ‘ऐसा ही होगा’ कहकर पति की सेवा में चली गई। इधर सूर्यदेव इस रहस्य से अनभिज्ञ थे। वे छाया को संज्ञा ही समझकर यथावत व्यवहार करते रहे। फलस्वरूप छाया गर्भवती हो गई और निश्चित समय पर उसके एक पुत्र उत्पन्न हुआ जो संज्ञानंदन वैवस्वत मनु जैसा रूप-रंग वाला था। बाद में वह छायापुत्र सावर्णि के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

इसके बाद भी सूर्य ने छाया को संज्ञा ही जाना तथा पूर्ववत् व्यवहार करते रहे। इस बार छाया के गर्भ से शनि की उत्पत्ति हुई। फिर छाया ने सूर्य को तपती व विष्टि नामक दो कन्याएं भी दीं।

इस तरह सूर्य को कुल नौ संतानों की प्राप्ति हुई, जिनमें छह पुत्र व तीन कन्याएं थीं। छाया को अपना पुत्र मनु (सावर्णि) अतिप्रिय था। उसके इस व्यवहार को संज्ञानंदन वैवस्वत मनु तो सहन कर लेते थे। लेकिन यम को छाया का यह सौतेला व्यवहार सहन नहीं हुआ। फलतः एक दिन यम क्रोधित हो गए और वे अपना दायां पैर उठाकर उसे मारने की धमकी देने लगे।

यम को ऐसा करते देख छाया ने शाप दिया, “ओ यम! तुम्हारे इसी पैर को कीट (कीड़े) भक्षण करेंगे और फिर इससे पीब व रक्त बहता रहेगा।”

छाया के उस शाप को सुनकर यम अपने पिता सूर्यदेव के पास गए और उनसे बोले, “हे पितु! माता छाया ने मुझे बिना ही किसी कारण के शाप दे डाला है। मेरा इसमें केवल इतना ही दोष था कि बाल-चपलता के कारण मैंने अपना दायां पैर कुछ ही ऊपर उठा लिया था। इससे मुझे तो ऐसा लगता है कि यह हमारी माता नहीं हैं।”

पिता के कथनों को सुनकर यम को वैराग्य उत्पन्न हो गया और वे गोकर्ण तीर्थ में जाकर पत्ते, फल, वायु का आहार करते हुए तपस्या में लीन हो गए। बीस हजार वर्ष तक वे भगवान शिव की आराधना करते रहे। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर जब शिव प्रगट हो गए तब यम ने वर के रूप में उनसे धर्माधर्म के निर्णायक का पद, लोकपालत्व व पितरों का आधिपत्य मांग लिया।

इधर संज्ञा के कृत्य को जानकर सूर्यदेव उसके पिता त्वष्टा (विश्वकर्मा) के पास गए। तब विश्वकर्मा ने उन्हें बताया कि संज्ञा घोड़ी के रूप में उनके पास आई अवश्य थी। लेकिन पति की जानकारी के बिना उस रूप में उसके आने से उन्होंने उसे कोई स्थान नहीं दिया। इस प्रकार दोनों स्थानों से निराश होकर वह भूतल स्थित मरुदेश में चली गई।

तब विश्वकर्मा ने सूर्यदेव से प्रार्थना कर उनके तेज को कम कर दिया। लेकिन पैरों का तेज देखने में वे असमर्थ रहे। अतः सूर्यदेव के पैरों का तेज यथावत् रहा। इसी कारण पूजा आदि कार्यों में कहीं पर सूर्य के पैर नहीं बनाये जाते । यदि कोई पैरों वाले सूर्य का आकार बनाकर पूजा आदि करता है तो वह निन्दित पापियों की गति प्राप्त करता है तथा संसार में अनेक प्रकार के कष्टों को झेलकर कुष्टी होता है । इसलिए धर्मात्मा जनों को मन्दिरों में अथवा चित्रों में देवाधिदेव भगवान् सूर्य की प्रतिमा का पैर नहीं बनाना चाहिए ।

इधर विश्वकर्मा द्वारा अत्यन्त सुन्दर स्वरूप पाकर देवताओं के अधिपति भगवान भास्कर, अतिशय तेजस्वी घोड़े का रूप धारण कर पृथ्वी लोक को गये और वहाँ अति कामुक हो बड़वा रूपधारिणी त्वाष्ट्री के मुख को अपने मुख से लगाकर अपनी कामवासना प्रकट की । सूर्य के उस महान एवं तेजस्वी अश्वरूप को देखकर त्वाष्ट्री संज्ञा ‘यह कोई अन्य पुरुष है’ इस आशंका से भयभीत हो, अपने मन में अति क्षुब्ध हुई और अपने नासापुटों (थूथड़ों) से उसके वीर्य को बाहर गिरा दिया। अश्वरूपधारी भगवान् भास्कर के उस वीर्य से दोनों अश्विनीकुमारों की उत्पत्ति हुई । नासिका के अग्र भाग से निकलने के कारण वे नासत्य तथा दन नाम से विख्यात हुए । कुछ दिनों बाद श्रश्वरूपधारी भगवान् विवस्वान को पहचान कर त्वाष्ट्री बहुत ही सन्तुष्ट हुई और अतिशय श्रानन्दित हो पति के साथ विमान पर चढ़कर स्वर्ग लोक को गई ।

छाया पुत्र सावर्णि मनु आज भी सुमेरु गिरि पर तपस्या में निरत हैं। द्वितीय पुत्र शनि में अपनी उम्र तपस्या के प्रभाव से ग्रहों की पदवी प्राप्त की । यमुना और तपती नामक दोनों कन्याएँ नही के रूप में परिणत हो गई और तीसरी कन्या विष्टि (भद्रा) समय (मुहूर्तो) में अत्यन्त घोर रूप धारण कर कर व्यवस्थित हुई ! वैवस्वत मनु के अत्यन्त पराक्रमी और तेजस्वी दस पुत्र हुए। जिनमें सर्वप्रथम इल पुत्रेष्टि यज्ञ करने से उत्पन्न हुआ था । अन्य छोटे नव पुत्र इक्ष्वाकु, कुशनाभ, अरिष्ट, पृष्ठ, नरिष्यन्त, करुष, महाबली शर्याति, पृषत्र और नाभाग नाम से विख्यात थे, जो सब के सब दिव्य गुणों से सम्पन्न थे ।

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जप का वैदिक उपासना और मंत्र

“ॐ शं नो देवीरभिष्टय आपो भवन्तु पीतये। शं योरभि स्रवन्तु नः।”

शनि देव पौराणिक मंत्र

“नीलांजनसमाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम् ।

छायामार्तण्डसम्भूत तं नमामि शनैश्चरम्।”

शनि देव बीज मंत्र

ॐ प्रां प्रीं प्रौं सः शनैश्चराय नमः

सामान्य मंत्र

ॐ शं शनैश्चराय नमः

इनमें से किसी एक का श्रद्धानुसार नित्य एक निश्चित संख्या में जप करना चाहिए। जप का समय संध्यकाल तथा कुल संख्या 23000 होनी चाहिये।

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