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SanatanWeb.com > Blog > गीतकाव्य > अष्टकम् > पशुपत्यष्टकम्
अष्टकम्

पशुपत्यष्टकम्

Sanatani
Last updated: जनवरी 3, 2026 6:05 अपराह्न
Sanatani
Published: जनवरी 3, 2026
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पशुपत्यष्टकम्

पशुपतींदुपतिं धरणीपतिं भुजगलोकपतिं च सतीपतिम् ।
प्रणतभक्तजनार्तिहरं परं भजत रे मनुजा गिरिजापतिम् ॥1॥

न जनको जननी न च सोदरो न तनयो न च भूरिबलं कुलम् ।
अवति कोऽपि न कालवशं गतं भजत रे मनुजा गिरिजापतिम् ॥2॥

मुरजडिंडिमवाद्यविलक्षणं मधुरपंचमनादविशारदम् ।
प्रमथभूतगणैरपि सेवितं भजत रे मनुजा गिरिजापतिम्  ॥3॥

शरणदं सुखदं शरणान्वितं शिव शिवेति शिवेति नतं नृणाम् ।
अभयदं करुणावरुणालयं भजत रे मनुजा गिरिजापतिम्  ॥4॥

नरशिरोरचितं मणिकुंडलं भुजगहारमुदं वृषभध्वजम् ।
चितिरजोधवलीकृतविग्रहं भजत रे  मनुजा गिरिजापतिम्  ॥5॥

मखविनाशकरं शशिशेखरं सततमध्वरभाजिफलप्रदम् ।
प्रलयदग्धसुरासुरमानवं भजत रे मनुजा गिरिजापतिम्  ॥6॥

मदमपास्य चिरं हृदि संस्थितं मरणजन्मजरामयपीडितम् ।
जगदुदीक्ष्य समीपभयाकुलं भजत रे मनुजा गिरिजापतिम्  ॥7॥

हरिविरंचिसुराधिपपूजितं यमजनेशधनेशनमस्कॄतम् ।
त्रिनयनं भुवनत्रितयाधिपं भजत रे मनुजा गिरिजापतिम्  ॥8॥

पशुपतेरिदमष्टकमद्भुतं विरचितं पृथिवीपतिसूरिणा ।
पठति संश‍ऋणुते मनुजः सदा शिवपुरीं वसते लभते मुदम् ॥9॥

इति श्रीपशुपत्यष्टकं संपूर्णम् ॥

अर्ध नारीश्वर अष्टकम्
चन्द्रशेखर अष्टकम
वैद्यनाथाष्टकम्
शिव नामावल्यष्टकं (नामावली अष्टकं)
तोटकाष्टकम्
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