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SanatanWeb.com > Blog > गीतकाव्य > स्तोत्र > श्री विष्णु स्तोत्र > नृसिंह स्तोत्रम्
श्री विष्णु स्तोत्रस्तोत्र

नृसिंह स्तोत्रम्

Sanatani
Last updated: फ़रवरी 11, 2026 5:47 अपराह्न
Sanatani
Published: फ़रवरी 11, 2026
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नृसिंह स्तोत्रम्

नृसिंह स्तोत्रम् भगवान नृसिंह को समर्पित एक प्राचीन और प्रभावशाली स्तोत्र है। यह स्तोत्र मुख्य रूप से भगवान विष्णु के नृसिंह अवतार की स्तुति और उनकी कृपा की कामना के लिए गाया जाता है। नृसिंह अवतार में भगवान विष्णु ने आधे मानव और आधे सिंह के रूप में प्रकट होकर अपने परम भक्त प्रह्लाद की रक्षा की थी और दुष्ट राजा हिरण्यकशिपु का वध किया था।

Contents
  • नृसिंह स्तोत्रम्
  • Narasimha Stotram
  • लक्ष्मी नृसिंह स्तोत्रम्
  • नरसिंह स्तोत्र

इस स्तोत्र का पाठ करने से भय, संकट और शत्रुओं से मुक्ति मिलती है। इसे विशेष रूप से उन परिस्थितियों में पढ़ा जाता है, जब व्यक्ति किसी बड़े संकट या समस्या से घिरा होता है। भक्त यह मानते हैं कि नृसिंह स्तोत्र का नियमित पाठ करने से भगवान नृसिंह की कृपा प्राप्त होती है, जो जीवन की हर कठिनाई को दूर करने में सक्षम हैं।

नृसिंहस्तोत्रम् के कुछ प्रमुख लाभ इस प्रकार हैं:

  1. संकटों से रक्षा: यह स्तोत्र भय और विपत्तियों से सुरक्षा प्रदान करता है। भगवान नृसिंह संकटों से घिरे भक्तों को शीघ्र ही मदद पहुंचाते हैं।
  2. शत्रुनाशक: यह स्तोत्र शत्रुओं और विरोधियों से बचाव के लिए अत्यंत प्रभावशाली माना जाता है। नृसिंह भगवान की शक्ति से व्यक्ति के शत्रुओं का नाश होता है।
  3. मन की शांति: इसका पाठ मानसिक तनाव को कम करता है और भक्त के मन को शांति और स्थिरता प्रदान करता है।
  4. धार्मिक और आध्यात्मिक उत्थान: नृसिंह स्तोत्र का नियमित पाठ व्यक्ति के आध्यात्मिक स्तर को ऊँचा करता है और उसे धार्मिक मार्ग पर आगे बढ़ाता है।

नृसिंहस्तोत्रम् की रचना कई धार्मिक ग्रंथों में वर्णित है, जिनमें से प्रमुख हैं ‘नृसिंह पुराण’ और ‘श्रीमद्भागवतम्’। यह स्तोत्र मंत्रों और स्तुतियों का संग्रह है जो भगवान नृसिंह की महिमा का गुणगान करता है। इसे आदिकवि वाल्मीकि से लेकर कई अन्य ऋषियों द्वारा गाया गया है।

स्त्रोत का नियमित पाठ सुबह या संध्या के समय करना विशेष रूप से शुभ माना जाता है। भक्त इसे पूरी श्रद्धा और विश्वास के साथ गाकर भगवान नृसिंह की कृपा प्राप्त कर सकते हैं।

Narasimha Stotram

ब्रह्मोवाच ॥

नतोऽस्म्यनंताय दुरन्तशक्तये विचित्रवीर्याय पवित्रकर्मणे ।
विश्वस्य सर्गस्थितिसंयमान्गुणैः स्वलीलया संदधतेऽव्ययात्मने ॥ १ ॥

श्रीरुद्र उवाच ॥

कोपकालो युगांतस्ते हतोऽयमसुरोऽल्पकः ।
तस्सुतं पाह्यु पसृतं भक्तं ते भक्तवत्सल ॥ २ ॥

इन्द्र उवाच ॥

प्रत्यानीताः परम भवता त्रायता नः स्वभागा दैत्याक्रान्तं ह्रदयकमलं त्वद्‌गृहं प्रत्यबोधि ।
कालग्रस्तं कियदिदमहो नाथ शुश्रूषतां ते मुक्तिस्तेषां नहि बहुमता नारसिंहापरैः किम् ॥ ३ ॥

ऋषय ऊचुः ॥

त्वं नस्तपः परममात्थ यदात्मतेजो येनेदमादिपुरुषात्मगतं ससर्ज ॥
तद्विप्रलुप्तममुनाद्य शरण्यपाल रक्षागृहीतवपुषा पुनरन्वमंस्थाः ॥ ४ ॥

पितर ऊचुः ॥

श्राद्धानि नोऽधिबुभुजे प्रसभं तनूजैर्दत्तानि तीर्थसमयेऽपिबत्तिलाम्बु ।
तस्योदरान्नखविदीर्णवपाद्य आर्च्छत्तस्मै नमो नृहरयेऽखिलधर्मगोप्त्रे ॥ ५ ॥

सिद्धा उचुः ॥

यो नो गतिं योगसिद्धामसाधुरहार्षीद्योगतपोबलेन ।
नानादर्प तं नखैर्निर्ददार तस्मै तुभ्यं प्रणताः स्मो नृसिंह ॥ ६ ॥

विद्याधरा ऊचुः ॥

विद्यां पृथग्धारणयाऽनुराद्धां न्यषेधदज्ञो बलवीर्यदृप्तः ।
स येन संख्ये पशुवद्धतस्तं मायानृसिंहं प्रणताः स्म नित्यम् ॥ ७ ॥

नागा ऊचुः ॥

येन पापेन रत्‍नानि स्त्रीरत्‍नानि ह्रतानि नः ।
तद्वक्षःपाटनेनासां दत्तानन्द नमोऽस्तु ते ॥ ८ ॥

मनव ऊचुः ॥

मनवो वयं तव निदेशकारिणो दितिजेन देव परिभूतसेतवः ।
भवत खलः स उपसंह्रतः प्रभो करवाम ते किमनुशाधि किंकरान् ॥ ९ ॥

प्रजापतय ऊचुः ॥

प्रजेशा वयं ते परेशाभिसृष्टा न येन प्रजा वै सृजामो निषिद्धाः ।
स एष त्वया भिन्नवक्षा नु शेते जगन्मंगलं सत्त्वमूर्तेऽवतारः ॥ १० ॥

गन्धर्वा ऊचुः ॥

वयं विभो ते नटनाट्यगायका येनात्मसाद्वीर्यबलौजसा कृताः ।
स एषा नीतो भवता दशामिमां किमुत्पथस्थः कुशलाय कल्पते ॥ ११ ॥

चारणा ऊचुः ॥

हरे तवांघ्रिपङकजं भवापवर्गमाश्रिताः ।
यदेष साधुह्रच्छयस्त्वयाऽसुरः समापितः ॥ १२ ॥

यक्षा ऊचुः ॥

वयमनुचरमुख्याः कर्मभिस्ते मनोज्ञैस्त इह दितिसुतेन प्रापिता वाहकत्वम् ।
स तु जनपरितापं तत्कृतं जानता ते नरहर उपनीतः पंचतां पंचविंश ॥ १३ ॥

किंपुरुषा ऊचुः ॥

वयं किंपुरुषास्त्वं तु महापुरुष ईश्वरः ।
अयं कुपुरुषो नष्टो धिक्कृतः साधुभिर्यदा ॥ १४ ॥

वैतालिका ऊचुः ॥

सभासु सत्रेषु तवामलं यशो गीत्वा सपर्यां महतीं लभामहे ।
यस्तां व्यनैषीद्‌ भृशमेष दुर्जनो दिष्ट्या हतस्ते भगवन्यथामहः ॥ १५ ॥

किन्नरा ऊचुः ॥

वयमीश किन्नर गणास्तवानुगा दितिजेन विष्टिममुनाऽनुकारिताः ।
भवता हरे सवृजिनोऽवसादितो नरसिंह नाथ विभवाय नो भव ॥ १६ ॥

विष्णुपार्षदा ऊचुः ॥

अद्वैतद्धरिनररूपमद्‌भुतं ते दृष्टं नः शरणद सर्वलोकशर्म ।
सोऽयं ते विधिकर ईश विप्रशप्तस्तस्येदं निधनमनुग्रहाय विद्मः ॥ १७ ॥

इति श्रीमद्भागवतांगर्गतं नृसिंहस्तोत्रं संपूर्णम् ।

Download Narasimha Stotram PDF

लक्ष्मी नृसिंह स्तोत्रम्

श्रीगणेशाय नमः ।

श्रीमत्पयोनिधिनिकेतन चक्रपाणे भोगीन्द्रभोगमणिरंजितपुण्यमूर्ते ।
योगीश शाश्‍वत शरण्यभवाब्दिपोत लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलंबम् ॥ १ ॥

ब्रह्मेन्द्ररुद्रमरुदर्ककिरीटकोटिसंघट्टितांघ्रिकमलामलकांतिकांत ।
लक्ष्मीलसत्कुचसरोरुहराजगंसलक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलंबम् ॥ २

संसारघोरगहने चरतो मुरारे मारोग्रभीकरमृगप्रवरार्दितस्य ।
आर्तस्य मत्सरनिदाहनिपीडितस्य लक्ष्मीनृसिंह० ॥ ३ ॥

संसारकूपमतिघोरमगाधमूलं संप्राप्य दुःखशतसर्पसमाकुलस्य ।
दीनस्य देव कृपणापदमागस्य लक्ष्मीनृसिंह० ॥ ४ ॥

संसारसागरविशलकरालकालनक्रग्रसननिग्रहविग्रहस्य ।
व्यग्रस्य रागरसनोर्मिनिपीडितस्य लक्ष्मीनृसिंह० ॥ ५ ॥

संसारवृक्षमघबीजमनंतकर्मशाखाशतं करणपत्रमनंगपुष्पम् ।
आरुह्य दुःखफलितं पततो दयालो लक्ष्मीनृसिंह० ॥ ६ ॥

संसारसर्पघनवक्त्रभयोग्रतीव्रद्रंष्ट्राकरालविषदग्धविनष्टमूर्ते ।
नागारिवाहन सुधाब्धिनिवास शौरे लक्ष्मीनृसिंह० ॥ ७ ॥

संसारदावदहनारुतभिकरोरुज्वालावलीभिरतिदग्धतनूरुहस्य ।
त्वत्पादपद्मसरसीशरणगतस्य लक्ष्मीनृसिंह० ॥ ८ ॥

संसारजालपतितस्य जगन्निवास सर्वेन्द्रियार्थबडिशार्थझषोपमस्य ।
प्रोत्खंडितप्रचुरतालिकमस्तकस्य लक्ष्मीनृसिंह० ॥ ९ ॥

संसारभीकरकरींद्रकलाभिघातनिष्पिष्टमर्मवपुषः सकलार्तिनाश ।
प्राणप्रयाणभवभीतिसमाकुलस्य लक्ष्मीनृसिंह० ॥ १० ॥

अंधस्य मे ह्रतविवेकमहाधनस्य चोरैः प्रभो बलिभिरिन्द्रियनामधेयैः ।
मोहांधकूपकुहरे विनिपातितस्य लक्ष्मीनृसिंह० ॥ ११ ॥

लक्ष्मीपते कमलनाभ सुरेश विष्णो वैकुंठ कृष्ण मधुसूदन पुष्कराक्ष ।
ब्रह्मण्य केशव जनार्दन वासुदेव देवेश देहि कृपणस्य करावलम्बम् ॥ १२ ॥

यन्माययोर्जितवपुःप्रचुरप्रवाहमग्नार्थमत्र निवहोरुकरावलंबम् ।
लक्ष्मीनृसिंहचरणाब्जमधुव्रतेन स्तोत्रं कृतं सुखकरं भुवि शंकरेण ॥ १३ ॥

इति श्रीमत्परमहंसश्रीमच्छंकराचार्याविरचितं लक्ष्मीनृसिंहस्तोत्रम् संपूर्णम् ।

नरसिंह स्तोत्र

उदयरवि सहस्रद्योतितं रूक्षवीक्षं प्रळय जलधिनादं कल्पकृद्वह्नि वक्त्रम् ।
सुरपतिरिपु वक्षश्छेद रक्तोक्षिताङ्गं प्रणतभयहरं तं नारसिंहं नमामि ॥

प्रळयरवि कराळाकार रुक्चक्रवालं विरळय दुरुरोची रोचिताशांतराल ।
प्रतिभयतम कोपात्त्युत्कटोच्चाट्टहासिन् दह दह नरसिंहासह्यवीर्याहितंमे ॥१॥

सरस रभसपादा पातभाराभिराव प्रचकितचल सप्तद्वन्द्व लोकस्तुतस्त्त्वम् ।
रिपुरुधिर निषेकेणैव शोणाङ्घ्रिशालिन् दह दह नरसिंहासह्यवीर्याहितंमे ॥२॥

तव घनघनघोषो घोरमाघ्राय जङ्घा परिघ मलघु मूरु व्याजतेजो गिरिञ्च ।
घनविघटतमागाद्दैत्य जङ्घालसङ्घो दह दह नरसिंहासह्यवीर्याहितंमे ॥३॥

कटकि कटकराजद्धाट्ट काग्र्यस्थलाभा प्रकट पट तटित्ते सत्कटिस्थातिपट्वी ।
कटुक कटुक दुष्टाटोप दृष्टिप्रमुष्टौ दह दह नरसिंहासह्यवीर्याहितंमे ॥४॥

प्रखर नखर वज्रोत्खात रोक्षारिवक्षः शिखरि शिखर रक्त्यराक्तसंदोह देह ।
सुवलिभ शुभ कुक्षे भद्र गंभीरनाभेदह दह नरसिंहासह्यवीर्याहितंमे ॥५॥

स्फुरयति तव साक्षात्सैव नक्षत्रमाला क्षपित दितिज वक्षो व्याप्तनक्षत्रमागर्म् ।
अरिदरधर जान्वासक्त हस्तद्वयाहो दह दह नरसिंहासह्यवीर्याहितंमे ॥६॥

कटुविकट सटौघोद्घट्टनाद्भ्रष्टभूयो घनपटल विशालाकाश लब्धावकाशम् ।
करपरिघ विमदर् प्रोद्यमं ध्यायतस्ते दह दह नरसिंहासह्यवीर्याहितंमे ॥७॥

हठलुठ दल घिष्टोत्कण्ठदष्टोष्ठ विद्युत् सटशठ कठिनोरः पीठभित्सुष्ठुनिष्ठाम् ।
पठतिनुतव कण्ठाधिष्ठ घोरांत्रमाला दह दह नरसिंहासह्यवीर्याहितंमे ॥८॥

हृत बहुमिहि राभासह्यसंहाररंहो हुतवह बहुहेति ह्रेपिकानंत हेति ।
अहित विहित मोहं संवहन् सैंहमास्यम् दह दह नरसिंहासह्यवीर्याहितंमे ॥९॥

गुरुगुरुगिरिराजत्कंदरांतगर्तेव दिनमणि मणिशृङ्गे वंतवह्निप्रदीप्ते ।
दधदति कटुदंष्प्रे भीषणोज्जिह्व वक्त्रे दह दह नरसिंहासह्यवीर्याहितंमे ॥१०॥

अधरित विबुधाब्धि ध्यानधैयर्ं विदीध्य द्विविध विबुधधी श्रद्धापितेंद्रारिनाशम् ।
विदधदति कटाहोद्घट्टनेद्धाट्टहासं दह दह नरसिंहासह्यवीर्याहितंमे ॥११॥

त्रिभुवन तृणमात्र त्राण तृष्णंतु नेत्र त्रयमति लघिताचिर्विर्ष्ट पाविष्टपादम् ।
नवतर रवि ताम्रं धारयन् रूक्षवीक्षं दह दह नरसिंहासह्यवीर्याहितंमे ॥१२॥

भ्रमद भिभव भूभृद्भूरिभूभारसद्भिद् भिदनभिनव विदभ्रू विभ्र मादभ्र शुभ्र ।
ऋभुभव भय भेत्तभार्सि भो भो विभाभिदर्ह दह नरसिंहासह्यवीर्याहितंमे ॥१३॥

श्रवण खचित चञ्चत्कुण्ड लोच्चण्डगण्ड भ्रुकुटि कटुललाट श्रेष्ठनासारुणोष्ठ ।
वरद सुरद राजत्केसरोत्सारि तारे दह दह नरसिंहासह्यवीर्याहितंमे ॥१४॥

प्रविकच कचराजद्रत्न कोटीरशालिन् गलगत गलदुस्रोदार रत्नाङ्गदाढ्य ।
कनक कटक काञ्ची शिञ्जिनी मुद्रिकावन् दह दह नरसिंहासह्यवीर्याहितंमे ॥१५॥

अरिदरमसि खेटौ बाणचापे गदां सन्मुसलमपि दधानः पाशवयार्ंकुशौ च ।
करयुगल धृतान्त्रस्रग्विभिन्नारिवक्षो दह दह नरसिंहासह्यवीर्याहितंमे ॥१६॥

चट चट चट दूरं मोहय भ्रामयारिन् कडि कडि कडि कायं ज्वारय स्फोटयस्व ।
जहि जहि जहि वेगं शात्रवं सानुबंधं दह दह नरसिंहासह्यवीर्याहितंमे ॥१७॥

विधिभव विबुधेश भ्रामकाग्नि स्फुलिङ्ग प्रसवि विकट दंष्प्रोज्जिह्ववक्त्र त्रिनेत्र ।
कल कल कलकामं पाहिमां तेसुभक्तं दह दह नरसिंहासह्यवीर्याहितंमे ॥१८॥

कुरु कुरु करुणां तां साङ्कुरां दैत्यपूते दिश दिश विशदांमे शाश्वतीं देवदृष्टिम् ।
जय जय जय मुर्तेऽनार्त जेतव्य पक्षं दह दह नरसिंहासह्यवीर्याहितंमे ॥१९॥

स्तुतिरिहमहितघ्नी सेवितानारसिंही तनुरिवपरिशांता मालिनी साऽभितोऽलम् ।
तदखिल गुरुमाग्र्य श्रीधरूपालसद्भिः सुनिय मनय कृत्यैः सद्गुणैर्नित्ययुक्ताः ॥२०॥

लिकुच तिलकसूनुः सद्धितार्थानुसारी नरहरि नुतिमेतां शत्रुसंहार हेतुम् ।
अकृत सकल पापध्वंसिनीं यः पठेत्तां व्रजति नृहरिलोकं कामलोभाद्यसक्तः ॥२१॥

इति कविकुलतिलक श्री त्रिविक्रमपण्डिताचार्यसुत
नारायणपण्डिताचार्य विरचितम् श्री नरसिंह स्तुतिः संपूणर्म्

॥भारतीरमणमुख्यप्राणांतगर्त श्री कृष्णापर्णमस्तु ॥

श्री वेङ्कटेश्वर स्तोत्रम्
श्री लक्ष्मीनृसिंहाष्टकम्
अष्ट लक्ष्मी स्तोत्रम्
परशुराम स्तवन्
गोपाल स्तुति
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