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अष्टकम्शिव स्तोत्र

किराताष्टकम्

Sanatani
Last updated: जनवरी 3, 2026 4:51 अपराह्न
Sanatani
Published: जनवरी 3, 2026
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Kirata Ashtakam In Hindi

किराताष्टकम् संस्कृत साहित्य का एक प्रसिद्ध स्तोत्र है, जो भगवान शिव के किरात (शिकारी) रूप का वर्णन करता है। यह स्तोत्र आदिशंकराचार्य द्वारा रचित माना जाता है, हालांकि इसके रचनाकार के बारे में ऐतिहासिक प्रमाण नहीं हैं। यह स्तोत्र भक्तों के बीच भगवान शिव के प्रति भक्ति और उनकी किरात रूप में शक्ति का वर्णन करने के लिए विख्यात है।

Contents
  • Kirata Ashtakam In Hindi
  • किराताष्टकम् का महत्व
  • पाठ और पाठ करने का समय
  • किराताष्टकम् संस्कृत में
  • Kirata Ashtakam In English
  • किराताष्टकम् से संबंधित अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
    • u003cstrongu003eकिराताष्टकम् क्या है?u003c/strongu003e
    • u003cstrongu003eकिराताष्टकम् की रचना किसने की?u003c/strongu003e
    • u003cstrongu003eकिराताष्टकम् का पाठ करने के लाभ क्या हैं?u003c/strongu003e
    • u003cstrongu003eक्या किराताष्टकम् का कोई विशेष दिन है जब इसका पाठ करना चाहिए?u003c/strongu003e
    • u003cstrongu003eकिराताष्टकम् का उच्चारण कैसे किया जाता है?u003c/strongu003e
    • u003cstrongu003eक्या किराताष्टकम् से संबंधित कोई विशेष पूजन की विधि है?u003c/strongu003e

महाभारत के वनपर्व में किरात रूप का विशेष उल्लेख मिलता है। जब अर्जुन तपस्या कर दिव्यास्त्र प्राप्त करना चाहते थे, तो भगवान शिव ने उन्हें किरात (शिकारी) रूप में दर्शन दिए। उन्होंने अर्जुन की परीक्षा ली और उनके साहस, भक्ति और तप का मूल्यांकन किया। इस प्रसंग में शिव का किरात रूप भक्तों को यह संदेश देता है कि भगवान अपने भक्तों की परीक्षा लेते हैं, परंतु अंततः उनकी सहायता करते हैं।

किराताष्टकम् का महत्व

  1. भक्ति और समर्पण: यह स्तोत्र भगवान शिव की महिमा का गुणगान करते हुए भक्तों को उनके प्रति समर्पण और श्रद्धा का भाव प्रदान करता है।
  2. साहस और परीक्षा: शिव के किरात रूप का उल्लेख यह सिखाता है कि जीवन में कठिनाइयों से घबराने के बजाय साहस और तप से उनका सामना करना चाहिए।
  3. ध्यान और शांति: इस स्तोत्र का पाठ मन को शांत करता है और आत्मा में अध्यात्मिक ऊर्जा का संचार करता है।

पाठ और पाठ करने का समय

किराताष्टकम् का पाठ किसी भी दिन किया जा सकता है, लेकिन विशेष रूप से सोमवार और शिवरात्रि के दिन इसका महत्व बढ़ जाता है। इसे पढ़ते समय एकाग्रता और भक्ति भाव रखना आवश्यक है। पाठ करते समय दीप जलाकर भगवान शिव के समक्ष बैठें और मन को शांत करके इसका पाठ करें।

किराताष्टकम् संस्कृत में

प्रत्यर्थिव्रात- वक्षःस्थलरुधिर- सुरापानमत्तं पृषत्कं
चापे सन्धाय तिष्ठन् हृदयसरसिजे मामके तापहन्ता।
पिञ्छोत्तंसः शरण्यः पशुपतितनयो नीरदाभः प्रसन्नो
देवः पायादपाया- च्छबरवपुरसौ सावधानः सदा नः।
आखेटाय वनेचरस्य गिरिजासक्तस्य शम्भोः सुत-
स्त्रातुं यो भुवनं पुरा समजनि ख्यातः किराताकृतिः।
कोदण्डच्छुरिकाधरो घनरवः पिञ्छावतंसोज्ज्वलः
स त्वं मामव सर्वदा रिपुगणत्रस्तं दयावारिधे।
यो मां पीडयति प्रसह्य सततं देव त्वदेकाश्रयं
भित्वा तस्य रिपोरुरश्छुरिकया शाताग्रया दुर्मतेः।
देव त्वत्करपङ्कजो- ल्लसितया श्रीमत्किराताकृते
तत्प्राणान् वितरान्तकाय भगवन् कालारिपुत्राञ्जसा।
विद्धो मर्मसु दुर्वचोभिरसतां सन्तप्तशल्योपमै-
र्दृप्तानां द्विषतामशान्तमनसां खिन्नोऽस्मि यावद् भृशम्।
तावत्त्वं छुरिकाशरासन- धरश्चित्ते ममाविर्भवन्
स्वामिन् देव किरातरूप शमय प्रत्यर्थिगर्वं क्षणात्।
हर्तुं वित्तमधर्मतो मम रताश्चोराश्च ये दुर्जना-
स्तेषां मर्मसु ताडयाशु विशिखैस्त्वत्- कार्मुकान्निःसृतैः।
शास्तारं द्विषतां किरातवपुषं सर्वार्थदं त्वामृते
पश्याम्यत्र पुरारिपुत्र शरणं नान्यं प्रपन्नोऽस्म्यहम्।
यक्षप्रेतपिशाच- भूतनिवहा दुःखप्रदा भीषणा
बाधन्ते नरशोणितोत्सुकधियो ये मां रिपुप्रेरिताः।
चापज्या- निनदैस्त्वमीश सकलान् संहृत्य दुष्टग्रहान्
गौरीशात्मज दैवतेश्वर किराताकार संरक्ष माम्।
द्रोग्धुं ये निरताः त्वदीयपद- पद्मैकान्तभक्ताय मे
मायाच्छन्नकलेवरा- श्रुविषदानाद्यैः सदा कर्मभिः।
वश्यस्तम्भन- मारणादिकुशल- प्रारम्भदक्षानरीन्
दुष्टान् संहर देवदेव शबराकार त्रिलोकेश्वर।
तन्वा वा मनसा गिरापि सततं दोषं चिकीर्षन्त्यलं
त्वत्पादप्रणतस्य मे निरपराधस्यापि ये मानवाः।
सर्वान् संहर तान् गिरीशसुत मे तापत्रयौघानपि
त्वामेकं शबराकृते भयहरं नाथं प्रपन्नोऽस्म्यहम्।
क्लिष्टो राजभटैस्तदापि परिभूतोऽहं खलैः शत्रुभि-
श्चान्यैर्घोरतरै- र्विपज्जलनिधौ मग्नोऽस्मि दुःखातुरः।
हा हा किं करवै विभो शबरवेषं त्वामभीष्टार्थदं
वन्देऽहं परदैवतं कुरु कृपानाथार्तबन्धो मयि।
स्तोत्रं यः प्रजपेत् प्रशान्तकरणैर्नित्यं किराताष्टकं
सः क्षिप्रं वशगान् करोति नृपतीनाबद्ध- वैरानपि।
संहृत्यात्मविरोधिनः खलजनान् दुष्टग्रहानप्यसौ
यात्यन्ते यमदूतभीतिरहितो दिव्यां गतिं शाश्वतीम्।

Kirata Ashtakam In English

Pratyarthivraata- Vakshah’sthalarudhira- Suraapaanamattam Pri’shatkam
Chaape Sandhaaya Tisht’han Hri’dayasarasije Maamake Taapahantaa.
Pinchhottamsah’ Sharanyah’ Pashupatitanayo Neeradaabhah’ Prasanno
Devah’ Paayaadapaayaa- Chchhabaravapurasau Saavadhaanah’ Sadaa Nah’.
Aakhet’aaya Vanecharasya Girijaasaktasya Shambhoh’ Suta-
Straatum Yo Bhuvanam Puraa Samajani Khyaatah’ Kiraataakri’tih’.
Kodand’achchhurikaadharo Ghanaravah’ Pinchhaavatamsojjvalah’
Sa Tvam Maamava Sarvadaa Ripuganatrastam Dayaavaaridhe.
Yo Maam Peed’ayati Prasahya Satatam Deva Tvadekaashrayam
Bhitvaa Tasya Riporurashchhurikayaa Shaataagrayaa Durmateh’.
Deva Tvatkarapankajo- Llasitayaa Shreematkiraataakri’te
Tatpraanaan Vitaraantakaaya Bhagavan Kaalaariputraanjasaa.
Viddho Marmasu Durvachobhirasataam Santaptashalyopamai-
Rdri’ptaanaam Dvishataamashaantamanasaam Khinno’smi Yaavad Bhri’sham.
Taavattvam Chhurikaasharaasana- Dharashchitte Mamaavirbhavan
Svaamin Deva Kiraataroopa Shamaya Pratyarthigarvam Kshanaat.
Hartum Vittamadharmato Mama Rataashchoraashcha Ye Durjanaa-
Steshaam Marmasu Taad’ayaashu Vishikhaistvat- Kaarmukaannih’sri’taih’.
Shaastaaram Dvishataam Kiraatavapusham Sarvaarthadam Tvaamri’te
Pashyaamyatra Puraariputra Sharanam Naanyam Prapanno’smyaham.
Yakshapretapishaacha- Bhootanivahaa Duh’khapradaa Bheeshanaa
Baadhante Narashonitotsukadhiyo Ye Maam Ripupreritaah’.
Chaapajyaa- Ninadaistvameesha Sakalaan Samhri’tya Dusht’agrahaan
Gaureeshaatmaja Daivateshvara Kiraataakaara Samraksha Maam.
Drogdhum Ye Nirataah’ Tvadeeyapada- Padmaikaantabhaktaaya Me
Maayaachchhannakalevaraa- Shruvishadaanaadyaih’ Sadaa Karmabhih’.
Vashyastambhana- Maaranaadikushala- Praarambhadakshaanareen
Dusht’aan Samhara Devadeva Shabaraakaara Trilokeshvara.
Tanvaa Vaa Manasaa Giraapi Satatam Dosham Chikeershantyalam
Tvatpaadapranatasya Me Niraparaadhasyaapi Ye Maanavaah’.
Sarvaan Samhara Taan Gireeshasuta Me Taapatrayaughaanapi
Tvaamekam Shabaraakri’te Bhayaharam Naatham Prapanno’smyaham.
Klisht’o Raajabhat’aistadaapi Paribhooto’ham Khalaih’ Shatrubhi-
Shchaanyairghoratarai- Rvipajjalanidhau Magno’smi Duh’khaaturah’.
Haa Haa Kim Karavai Vibho Shabaravesham Tvaamabheesht’aarthadam
Vande’ham Paradaivatam Kuru Kri’paanaathaartabandho Mayi.
Stotram Yah’ Prajapet Prashaantakaranairnityam Kiraataasht’akam
Sah’ Kshipram Vashagaan Karoti Nri’pateenaabaddha- Vairaanapi.
Samhri’tyaatmavirodhinah’ Khalajanaan Dusht’agrahaanapyasau
Yaatyante Yamadootabheetirahito Divyaam Gatim Shaashvateem.

किराताष्टकम् से संबंधित अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

  1. u003cstrongu003eकिराताष्टकम् क्या है?u003c/strongu003e

    उत्तर: किराताष्टकम् भगवान शिव की उपासना के लिए रचित एक महत्वपूर्ण स्तुति है, जिसे संत अद्वैत आश्रित ने लिखा है। इसमें शिव के विभिन्न स्वरूपों की महिमा का वर्णन किया गया है।

  2. u003cstrongu003eकिराताष्टकम् की रचना किसने की?u003c/strongu003e

    उत्तर: किराताष्टकम् की रचना संत अद्वैत आश्रित ने की थी जो महान संत और भक्त थे। यह स्तुति भगवान शिव के प्रति उनकी भक्ति को दर्शाती है।

  3. u003cstrongu003eकिराताष्टकम् का पाठ करने के लाभ क्या हैं?u003c/strongu003e

    उत्तर: किराताष्टकम् का पाठ करने से भक्ति और श्रद्धा बढ़ती है, मानसिक शांति प्राप्त होती है, और भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है। यह विशेष रूप से उन भक्तों के लिए लाभकारी है जो शिव की आराधना करते हैं।

  4. u003cstrongu003eक्या किराताष्टकम् का कोई विशेष दिन है जब इसका पाठ करना चाहिए?u003c/strongu003e

    उत्तर: शिवरात्रि के दिन या श्रावण मास में विशेष रूप से किराताष्टकम् का पाठ करना बेहद फलदायी माना जाता है। इस दौरान शिव की कृपा प्राप्त करने के लिए भक्त अधिकतर इस स्तुति का पाठ करते हैं।

  5. u003cstrongu003eकिराताष्टकम् का उच्चारण कैसे किया जाता है?u003c/strongu003e

    उत्तर: किराताष्टकम् का उच्चारण ध्यानपूर्वक और श्रद्धा के साथ करना चाहिए। सही सांगीतिक लय और उच्चारण सुनिश्चित करने के लिए भक्तगण इसके ग्रंथों या वीडियो में उपलब्ध शिक्षाओं का पालन कर सकते हैं।

  6. u003cstrongu003eक्या किराताष्टकम् से संबंधित कोई विशेष पूजन की विधि है?u003c/strongu003e

    उत्तर: किराताष्टकम् का पाठ करने से पहले भगवान शिव का अभिषेक करना और पूजन सामग्री अर्पित करना शुभ होता है। यह भक्त की श्रद्धा को और भी बढ़ाता है।

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