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SanatanWeb.com > Blog > गीतकाव्य > कवचम् > एकादशमुखि हनुमत्कवचम्
कवचम्स्तोत्रहनुमान स्तोत्रम्

एकादशमुखि हनुमत्कवचम्

Sanatani
Last updated: जनवरी 22, 2026 5:29 अपराह्न
Sanatani
Published: जनवरी 22, 2026
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एकादशमुखि हनुमत्कवचम् एक शक्तिशाली स्तोत्र है, जिसमें भगवान हनुमान के ग्यारह रूपों की स्तुति की गई है। यह कवच भक्तों को सुरक्षा, शक्ति, साहस और आध्यात्मिक उन्नति प्रदान करता है। ऐसा माना जाता है कि इस कवच का नित्य पाठ करने से व्यक्ति को सभी प्रकार के भय, नकारात्मक ऊर्जा, बुरी शक्तियों और ग्रह दोषों से मुक्ति मिलती है।

Contents
  • कवच का महत्व
  • कब और कैसे करें पाठ?
  • Ekadash Mukhi Hanuman Kavach

कवच का महत्व

  • सुरक्षा कवच: इस कवच के पाठ से व्यक्ति को जीवन के सभी संकटों से रक्षा मिलती है।
  • शत्रुनाशक: यह शत्रुओं से रक्षा करता है और बुरी शक्तियों का नाश करता है।
  • भूत-प्रेत बाधा निवारक: इस स्तोत्र का जाप करने से नकारात्मक शक्तियां दूर रहती हैं।
  • ग्रह दोष निवारण: विशेषकर शनि और राहु-केतु से संबंधित दोषों को शांत करने के लिए यह प्रभावी है।
  • आध्यात्मिक उन्नति: यह आत्मबल, भक्ति और मन की स्थिरता प्रदान करता है।

कब और कैसे करें पाठ?

  • इस कवच का नित्य प्रातःकाल और संध्या समय शुद्ध मन से पाठ करना श्रेष्ठ माना गया है।
  • मंगलवार और शनिवार को हनुमान जी के समक्ष दीप जलाकर श्रद्धा से इस स्तोत्र का पाठ करने से विशेष लाभ मिलता है।
  • इसे लाल आसन पर बैठकर पढ़ना शुभ माना जाता है।
  • इसका कम से कम 11 बार या 21 बार पाठ करने से शीघ्र फल प्राप्त होते हैं।

Ekadash Mukhi Hanuman Kavach

(रुद्रयामलतः)

श्रीदेव्युवाच
शैवानि गाणपत्यानि शाक्तानि वैष्णवानि च ।
कवचानि च सौराणि यानि चान्यानि तानि च ॥ 1॥
श्रुतानि देवदेवेश त्वद्वक्त्रान्निःसृतानि च ।
किंचिदन्यत्तु देवानां कवचं यदि कथ्यते ॥ 2॥

ईश्वर उवाच
श‍ऋणु देवि प्रवक्ष्यामि सावधानावधारय ।
हनुमत्कवचं पुण्यं महापातकनाशनम् ॥ 3॥
एतद्गुह्यतमं लोके शीघ्रं सिद्धिकरं परम् ।
जयो यस्य प्रगानेन लोकत्रयजितो भवेत् ॥ 4॥

ॐ अस्य श्रीएकादशवक्त्रहनुमत्कवचमालामंत्रस्य
वीररामचंद्र ऋषिः । अनुष्टुप्छंदः । श्रीमहावीरहनुमान् रुद्रो देवता ।
ह्रीं बीजम् । ह्रौं शक्तिः । स्फें कीलकम् ।
सर्वदूतस्तंभनार्थं जिह्वाकीलनार्थं,
मोहनार्थं राजमुखीदेवतावश्यार्थं
ब्रह्मराक्षसशाकिनीडाकिनीभूतप्रेतादिबाधापरिहारार्थं
श्रीहनुमद्दिव्यकवचाख्यमालामंत्रजपे विनियोगः ।

अथ करन्यासः ।
ॐ ह्रौं आंजनेयाय अंगुष्ठभ्यां नमः ।
ॐ स्फें रुद्रमूर्तये तर्जनीभ्यां नमः ।
ॐ स्फें वायुपुत्राय मध्यमाभ्यां नमः ।
ॐ स्फें अंजनीगर्भाय अनामिकाभ्यां नमः ।
ॐ स्फें रामदूताय कनिष्ठिकाभ्यां नमः ।
ॐ ह्रौं ब्रह्मास्त्रादिनिवारणाय करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः ।

अथ अंगन्यासः ।
ॐ ह्रौं आंजनेयाय हृदयाय नमः ।
ॐ स्फें रुद्रमूर्तये शिरसे स्वाहा ।
ॐ स्फें वायुपुत्राय शिखायै वषट् ।
ॐ ह्रौं अंजनीगर्भाय कवचाय हुम् ।
ॐ स्फें रामदूताय नेत्रत्रयाय वौषट् ।
ॐ ह्रौं ब्रह्मास्त्रादिनिवारणाय अस्त्राय फट् ।
इति न्यासः ।

अथ ध्यानम् ।
ॐ ध्यायेद्रणे हनुमंतमेकादशमुखांबुजम् ।
ध्यायेत्तं रावणोपेतं दशबाहुं त्रिलोचनं
हाहाकारैः सदर्पैश्च कंपयंतं जगत्त्रयम् ।
ब्रह्मादिवंदितं देवं कपिकोटिसमन्वितं
एवं ध्यात्वा जपेद्देवि कवचं परमाद्भुतम् ॥

दिग्बंधाः
ॐ इंद्रदिग्भागे गजारूढहनुमते ब्रह्मास्त्रशक्तिसहिताय
चौरव्याघ्रपिशाचब्रह्मराक्षसशाकिनीडाकिनीवेतालसमूहोच्चाटनाय
मां रक्ष रक्ष स्वाहा ।

ॐ अग्निदिग्भागे मेषारुढहनुमते अस्त्रशक्तिसहिताय चौरव्याघ्र-
पिशाचब्रह्मराक्षसशाकिनीडाकिनीवेतालसमूहोच्चाटनाय
मां रक्ष रक्ष स्वाहा ।

ॐ यमदिग्भागे महिषारूढहनुमते खड्गशक्तिसहिताय चौरव्याघ्र-
पिशाचब्रह्मराक्षसशाकिनीडाकिनीवेतालसमूहोच्चाटनाय
मां रक्ष रक्ष स्वाहा ।

ॐ निऋर्तिदिग्भागे नरारूढहनुमते खड्गशक्तिसहिताय चौरव्याघ्र-
पिशाचब्रह्मराक्षसशाकिनीडाकिनीवेतालसमूहोच्चाटनाय
मां रक्ष रक्ष स्वाहा ।

ॐ वरुणदिग्भागे मकरारूढहनुमते प्राणशक्तिसहिताय
चौरव्याघ्र पिशाचब्रह्मराक्षसशाकिनीडाकिनीवेतालसमूहोच्चाटनाय
मां रक्ष रक्ष स्वाहा ।

ॐ वायुदिग्भागे मृगारूढहनुमते अंकुशशक्तिसहिताय
चौरव्याघ्रपिशाचब्रह्मराक्षसशाकिनीडाकिनीवेतालसमूहोच्चाटनाय
मां रक्ष रक्ष स्वाहा ।

ॐ कुबेरदिग्भागे अश्वारूढहनुमते गदाशक्तिसहिताय
चौरव्याघ्र पिशाचब्रह्मराक्षसशाकिनीडाकिनीवेतालसमूहोच्चाटनाय
मां रक्ष रक्ष स्वाहा ।

ॐ ईशानदिग्भागे राक्षसारूढहनुमते पर्वतशक्तिसहिताय
चौरव्याघ्र पिशाचब्रह्मराक्षसशाकिनीडाकिनीवेतालसमूहोच्चाटनाय
मां रक्ष रक्ष स्वाहा ।

ॐ अंतरिक्षदिग्भागे वर्तुलहनुमते मुद्गरशक्तिसहिताय
चौरव्याघ्र पिशाचब्रह्मराक्षसशाकिनीडाकिनीवेतालसमूहोच्चाटनाय
मां रक्ष रक्ष स्वाहा ।

ॐ भूमिदिग्भागे वृश्चिकारूढहनुमते वज्रशक्तिसहिताय
चौरव्याघ्र पिशाचब्रह्मराक्षसशाकिनीडाकिनीवेतालसमूहोच्चाटनाय
मां रक्ष रक्ष स्वाहा ।

ॐ वज्रमंडले हंसारूढहनुमते वज्रशक्तिसहिताय चौरव्याघ्र-
पिशाचब्रह्मराक्षसशाकिनीडाकिनीवेतालसमूहोच्चाटनाय
मां रक्ष रक्ष स्वाहा ।

मालामंत्रः ।
ॐ ह्रीं यीं यं प्रचंडपराक्रमाय एकादशमुखहनुमते
हंसयतिबंध-मतिबंध-वाग्बंध-भैरुंडबंध-भूतबंध-
प्रेतबंध-पिशाचबंध-ज्वरबंध-शूलबंध-
सर्वदेवताबंध-रागबंध-मुखबंध-राजसभाबंध-
घोरवीरप्रतापरौद्रभीषणहनुमद्वज्रदंष्ट्राननाय
वज्रकुंडलकौपीनतुलसीवनमालाधराय सर्वग्रहोच्चाटनोच्चाटनाय
ब्रह्मराक्षससमूहोच्चाटानाय ज्वरसमूहोच्चाटनाय राजसमूहोच्चाटनाय
चौरसमूहोच्चाटनाय शत्रुसमूहोच्चाटनाय दुष्टसमूहोच्चाटनाय
मां रक्ष रक्ष स्वाहा ॥ 1 ॥

ॐ वीरहनुमते नमः ।
ॐ नमो भगवते वीरहनुमते पीतांबरधराय कर्णकुंडलाद्या-
भरणालंकृतभूषणाय किरीटबिल्ववनमालाविभूषिताय
कनकयज्ञोपवीतिने कौपीनकटिसूत्रविराजिताय
श्रीवीररामचंद्रमनोभिलषिताय लंकादिदहनकारणाय
घनकुलगिरिवज्रदंडाय अक्षकुमारसंहारकारणाय
ॐ यं ॐ नमो भगवते रामदूताय फट् स्वाहा ॥

ॐ ऐं ह्रीं ह्रौं हनुमते सीतारामदूताय सहस्रमुखराजविध्वंसकाय
अंजनीगर्भसंभूताय शाकिनीडाकिनीविध्वंसनाय किलिकिलिचुचु कारेण
विभीषणाय वीरहनुमद्देवाय ॐ ह्रीं श्रीं ह्रौ ह्रां फट् स्वाहा ॥

ॐ श्रीवीरहनुमते हौं ह्रूं फट् स्वाहा ।
ॐ श्रीवीरहनुमते स्फ्रूं ह्रूं फट् स्वाहा ।
ॐ श्रीवीरहनुमते ह्रौं ह्रूं फट् स्वाहा ।
ॐ श्रीवीरहनुमते स्फ्रूं फट् स्वाहा ।
ॐ ह्रां श्रीवीरहनुमते ह्रौं हूं फट् स्वाहा ।
ॐ श्रीवीरहनुमते ह्रैं हुं फट् स्वाहा ।

ॐ ह्रां पूर्वमुखे वानरमुखहनुमते
लं सकलशत्रुसंहारकाय हुं फट् स्वाहा ।

ॐ आग्नेयमुखे मत्स्यमुखहनुमते
रं सकलशत्रुसकलशत्रुसंहारकाय हुं फट् स्वाहा ।

ॐ दक्षिणमुखे कूर्ममुखहनुमते
मं सकलशत्रुसकलशत्रुसंहारकाय हुं फट् स्वाहा ।

ॐ नैऋर्तिमुखे वराहमुखहनुमते
क्षं सकलशत्रुसकलशत्रुसंहारकाय हुं फट् स्वाहा ।

ॐ पश्चिममुखे नारसिंहमुखहनुमते
वं सकलशत्रुसकलशत्रुसंहारकाय हुं फट् स्वाहा ।

ॐ वायव्यमुखे गरुडमुखहनुमते
यं सकलशत्रुसकलशत्रुसंहारकाय हुं फट् स्वाहा ।

ॐ उत्तरमुखे शरभमुखहनुमते
सं सकलशत्रुसकलशत्रुसंहारकाय हुं फट् स्वाहा ।

ॐ ईशानमुखे वृषभमुखहनुमते हूं
आं सकलशत्रुसकलशत्रुसंहारकाय हुं फट् स्वाहा ।

ॐ ऊर्ध्वमुखे ज्वालामुखहनुमते
आं सकलशत्रुसकलशत्रुसंहारकाय हुं फट् स्वाहा ।

ॐ अधोमुखे मार्जारमुखहनुमते
ह्रीं सकलशत्रुसकलशत्रुसंहारकाय हुं फट् स्वाहा ।

ॐ सर्वत्र जगन्मुखे हनुमते
स्फ्रूं सकलशत्रुसकलशत्रुसंहारकाय हुं फट् स्वाहा ।

ॐ श्रीसीतारामपादुकाधराय महावीराय वायुपुत्राय कनिष्ठाय
ब्रह्मनिष्ठाय एकादशरुद्रमूर्तये महाबलपराक्रमाय
भानुमंडलग्रसनग्रहाय चतुर्मुखवरप्रसादाय
महाभयरक्षकाय यं हौम् ।

ॐ हस्फें हस्फें हस्फें श्रीवीरहनुमते नमः एकादशवीरहनुमन्
मां रक्ष रक्ष शांतिं कुरु कुरु तुष्टिं कुरु करु पुष्टिं कुरु कुरु
महारोग्यं कुरु कुरु अभयं कुरु कुरु अविघ्नं कुरु कुरु
महाविजयं कुरु कुरु सौभाग्यं कुरु कुरु सर्वत्र विजयं कुरु कुरु
महालक्ष्मीं देहि हुं फट् स्वाहा ॥

फलश्रुतिः
इत्येतत्कवचं दिव्यं शिवेन परिकीर्तितम् ।
यः पठेत्प्रयतो भूत्वा सर्वान्कामानवाप्नुयात् ॥

द्विकालमेककालं वा त्रिवारं यः पठेन्नरः ।
रोगान् पुनः क्षणात् जित्वा स पुमान् लभते श्रियम् ॥

मध्याह्ने च जले स्थित्वा चतुर्वारं पठेद्यदि ।
क्षयापस्मारकुष्ठादितापत्रयनिवारणम् ॥

यः पठेत्कवचं दिव्यं हनुमद्ध्यानतत्परः ।
त्रिःसकृद्वा यथाज्ञानं सोऽपि पुण्यवतां वरः ॥

देवमभ्यर्च्य विधिवत्पुरश्चर्यां समारभेत् ।
एकादशशतं जाप्यं दशांशहवनादिकम् ॥

यः करोति नरो भक्त्या कवचस्य समादरम् ।
ततः सिद्धिर्भवेत्तस्य परिचर्याविधानतः ॥

गद्यपद्यमया वाणी तस्य वक्त्रे प्रजायते ।
ब्रह्महत्यादिपापेभ्यो मुच्यते नात्र संशयः ॥

एकादशमुखिहनुमत्कवचं समाप्त ॥

एकादशमुखि हनुमत्कवचम् एक अत्यंत प्रभावशाली स्तोत्र है जो व्यक्ति को भयमुक्त, शक्तिशाली और आध्यात्मिक रूप से सशक्त बनाता है। इसके नियमित पाठ से न केवल भौतिक लाभ प्राप्त होते हैं, बल्कि यह आध्यात्मिक उन्नति और आत्मशुद्धि का भी माध्यम है।

त्रिवेणी स्तोत्रम्
कंद षष्टि कवचम् (तमिल्)
शैलपुत्री स्तोत्रम्
श्री कृष्णाश्रय स्तोत्रम्
देवी आनंद लहरी स्तोत्रम्
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