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SanatanWeb.com > Blog > गीतकाव्य > शतकम् > नवग्रह सूक्तम्
शतकम्

नवग्रह सूक्तम्

Sanatani
Last updated: जनवरी 24, 2026 5:08 अपराह्न
Sanatani
Published: जनवरी 24, 2026
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नवग्रह सूक्तम्

नवग्रह सूक्तम्(Navagraha Suktam) वैदिक साहित्य का एक महत्वपूर्ण अंश है, जिसमें नवग्रहों—सूर्य, चंद्रमा, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु और केतु—की स्तुति की गई है। यह सूक्तम् मुख्य रूप से वैदिक ज्योतिष और धार्मिक परंपराओं में इन ग्रहों के प्रभाव को संतुलित करने और शुभ फल प्राप्त करने के लिए उपयोग किया जाता है।

Contents
  • नवग्रह सूक्तम्
  • नवग्रहों का महत्व Navagraha Suktam Importance
  • नवग्रह सूक्तम् Navagraha Suktam

नवग्रहों का महत्व Navagraha Suktam Importance

नवग्रहों को वैदिक ज्योतिष में व्यक्ति के जीवन, उसके कर्म और भाग्य को प्रभावित करने वाले मुख्य कारक माना गया है। इन ग्रहों के आधार पर ही कुंडली का निर्माण होता है। प्रत्येक ग्रह एक विशेष ऊर्जा और प्रभाव को दर्शाता है, जो व्यक्ति के जीवन के अलग-अलग पहलुओं को प्रभावित करता है।

नवग्रह सूक्तम् Navagraha Suktam

ॐ शुक्लाम्बरधरं-विँष्णुं शशिवर्ण-ञ्चतुर्भुजम्।
प्रसन्नवदन-न्ध्यायेत्सर्व विघ्नोपशान्तये ॥

ओ-म्भूः ओ-म्भुवः॑ ओग्ं॒ सुवः॑ ओ-म्महः॑ ओ-ञ्जनः ओ-न्तपः॑ ओग्ं स॒त्यं ओ-न्तत्स॑वि॒तुर्वरे᳚ण्य॒-म्भर्गो॑दे॒वस्य॑ धीमहि धियो॒ यो नः॑
प्रचो॒दया᳚त् ॥ ॐ आपो॒ ज्योती॒रसो॒-ऽमृत॒-म्ब्रह्म॒ भूर्भुव॒स्सुव॒रोम् ॥

ममोपात्त-समस्त-दुरितक्षयद्वारा श्रीपरमेश्वर प्रीत्यर्थं आदित्यादि नवग्रह देवता प्रसाद सिद्ध्यर्थं आदित्यादि नवग्रह नमस्कारान् करिष्ये ॥

ॐ आस॒त्येन॒ रज॑सा॒ वर्त॑मानो निवे॒शय॑न्न॒मृत॒-म्मर्त्य॑ञ्च । हि॒र॒ण्यये॑न सवि॒ता रथे॒ना-ऽऽदे॒वो या॑ति॒भुव॑ना वि॒पश्यन्॑ ॥ अ॒ग्नि-न्दू॒तं-वृँ॑णीमहे॒ होता॑रं-विँ॒श्ववे॑दसम् । अ॒स्य य॒ज्ञस्य॑ सु॒क्रतुम्᳚ ॥ येषा॒मीशे॑ पशु॒पतिः॑ पशू॒ना-ञ्चतु॑ष्पदामु॒त च॑ द्वि॒पदा᳚म् । निष्क्री॑तो॒-ऽयं-यँ॒ज्ञिय॑-म्भा॒गमे॑तु रा॒यस्पोषा॒ यज॑मानस्य सन्तु ॥
ॐ अधिदेवता प्रत्यधिदेवता सहिताय आदि॑त्याय॒ नमः॑ ॥ १ ॥

ॐ आप्या॑यस्व॒ समे॑तु ते वि॒श्वत॑स्सोम॒ वृष्णि॑यम् । भवा॒ वाज॑स्य सङ्ग॒थे ॥ अ॒प्सुमे॒ सोमो॑ अब्रवीद॒न्तर्विश्वा॑नि भेष॒जा । अ॒ग्निञ्च॑ वि॒श्वश॑म्भुव॒माप॑श्च वि॒श्वभे॑षजीः ॥ गौ॒री मि॑माय सलि॒लानि॒ तक्ष॒त्येक॑पदी द्वि॒पदी॒ सा चतु॑ष्पदी । अ॒ष्टाप॑दी॒ नव॑पदी बभू॒वुषी॑ स॒हस्रा᳚क्षरा पर॒मे व्यो॑मन्न् ॥
ॐ अधिदेवता प्रत्यधिदेवता सहिताय सोमा॑य॒ नमः॑ ॥ २ ॥

ॐ अ॒ग्निर्मू॒र्धा दि॒वः क॒कुत्पतिः॑ पृथि॒व्या अ॒यम् । अ॒पाग्ंरेताग्ं॑सि जिन्वति ॥ स्यो॒ना पृ॑थिवि॒ भवा॑-ऽनृक्ष॒रा नि॒वेश॑नी । यच्छा॑न॒श्शर्म॑ स॒प्रथाः᳚ ॥ क्षेत्र॑स्य॒ पति॑ना व॒यग्ंहि॒ते ने॑व जयामसि । गामश्व॑-म्पोषयि॒त्.ंवा स नो॑ मृडाती॒दृशे᳚ ॥
ॐ अधिदेवता प्रत्यधिदेवता सहिताय अङ्गा॑रकाय॒ नमः॑ ॥ ३ ॥

ॐ उद्बु॑ध्यस्वाग्ने॒ प्रति॑जागृह्येनमिष्टापू॒र्ते सग्ंसृ॑जेथाम॒यञ्च॑ । पुनः॑ कृ॒ण्वग्ग्‍स्त्वा॑ पि॒तरं॒-युँवा॑नम॒न्वाताग्ं॑सी॒त्त्वयि॒ तन्तु॑मे॒तम् ॥ इ॒दं-विँष्णु॒र्विच॑क्रमे त्रे॒धा निद॑धे प॒दम् । समू॑ढमस्यपाग्ं सु॒रे ॥ विष्णो॑ र॒राट॑मसि॒ विष्णोः᳚ पृ॒ष्ठम॑सि॒ विष्णो॒श्श्नप्त्रे᳚स्थो॒ विष्णो॒स्स्यूर॑सि॒ विष्णो᳚र्ध्रु॒वम॑सि वैष्ण॒वम॑सि॒ विष्ण॑वे त्वा ॥
ॐ अधिदेवता प्रत्यधिदेवता सहिताय बुधा॑य॒ नमः॑ ॥ ४ ॥

ओ-म्बृह॑स्पते॒ अति॒यद॒र्यो अर्​हा᳚द्द्यु॒मद्वि॒भाति॒ क्रतु॑म॒ज्जने॑षु ।यद्दी॒दय॒च्चव॑सर्तप्रजात॒ तद॒स्मासु॒ द्रवि॑णन्धेहि चि॒त्रम् ॥ इन्द्र॑मरुत्व इ॒ह पा॑हि॒ सोमं॒-यँथा॑ शार्या॒ते अपि॑बस्सु॒तस्य॑ । तव॒ प्रणी॑ती॒ तव॑ शूर॒शर्म॒न्नावि॑वासन्ति क॒वय॑स्सुय॒ज्ञाः ॥ ब्रह्म॑जज्ञा॒न-म्प्र॑थ॒म-म्पु॒रस्ता॒द्विसी॑म॒तस्सु॒रुचो॑ वे॒न आ॑वः । सबु॒ध्निया॑ उप॒मा अ॑स्य वि॒ष्ठास्स॒तश्च॒ योनि॒मस॑तश्च॒ विवः॑ ॥
ॐ अधिदेवता प्रत्यधिदेवता सहिताय बृह॒स्पत॑ये॒ नमः॑ ॥ ५ ॥

ओ-म्प्रव॑श्शु॒क्राय॑ भा॒नवे॑ भरध्वम् । ह॒व्य-म्म॒ति-ञ्चा॒ग्नये॒ सुपू॑तम् । यो दैव्या॑नि॒ मानु॑षा ज॒नूग्ंषि॑ अ॒न्तर्विश्वा॑नि वि॒द्म ना॒ जिगा॑ति ॥ इ॒न्द्रा॒णीमा॒सु नारि॑षु सु॒पत्.ंई॑म॒हम॑श्रवम् । न ह्य॑स्या अप॒रञ्च॒न ज॒रसा॒ मर॑ते॒ पतिः॑ ॥ इन्द्रं॑-वोँ वि॒श्वत॒स्परि॒ हवा॑महे॒ जने᳚भ्यः । अ॒स्माक॑मस्तु॒ केव॑लः॥
ॐ अधिदेवता प्रत्यधिदेवता सहिताय शुक्रा॑य॒ नमः॑ ॥ ६ ॥

ॐ शन्नो॑ दे॒वीर॒भिष्ट॑य॒ आपो॑ भवन्तु पी॒तये᳚ । शं​योँर॒भिस्र॑वन्तु नः ॥ प्रजा॑पते॒ न त्वदे॒तान्य॒न्यो विश्वा॑ जा॒तानि॒ परि॒ता ब॑भूव । यत्का॑मास्ते जुहु॒मस्तन्नो॑ अस्तु व॒यग्ग्‍स्या॑म॒ पत॑यो रयी॒णाम् ॥ इ॒मं-यँ॑मप्रस्त॒रमाहि सीदा-ऽङ्गि॑रोभिः पि॒तृभि॑स्सं​विँदा॒नः । आत्वा॒ मन्त्राः᳚ कविश॒स्ता व॑हन्त्वे॒ना रा॑जन्, ह॒विषा॑ मादयस्व ॥
ॐ अधिदेवता प्रत्यधिदेवता सहिताय शनैश्च॑राय॒ नमः॑ ॥ ७ ॥

ओ-ङ्कया॑ नश्चि॒त्र आभु॑वदू॒ती स॒दावृ॑ध॒स्सखा᳚ । कया॒ शचि॑ष्ठया वृ॒ता ॥ आ-ऽयङ्गौः पृश्नि॑रक्रमी॒दस॑नन्मा॒तर॒-म्पुनः॑ । पि॒तर॑ञ्च प्र॒यन्त्सुवः॑ ॥ यत्ते॑ दे॒वी निर्‍ऋ॑तिराब॒बन्ध॒ दाम॑ ग्री॒वास्व॑विच॒र्त्यम् । इ॒दन्ते॒ तद्विष्या॒म्यायु॑षो॒ न मध्या॒दथा॑जी॒वः पि॒तुम॑द्धि॒ प्रमु॑क्तः ॥
ॐ अधिदेवता प्रत्यधिदेवता सहिताय राह॑वे॒ नमः॑ ॥ ८ ॥

ओ-ङ्के॒तुङ्कृ॒ण्वन्न॑के॒तवे॒ पेशो॑ मर्या अपे॒शसे᳚ । समु॒षद्भि॑रजायथाः ॥ ब्र॒ह्मा दे॒वाना᳚-म्पद॒वीः क॑वी॒नामृषि॒र्विप्रा॑णा-म्महि॒षो मृ॒गाणा᳚म् । श्ये॒नोगृध्रा॑णा॒ग्॒स्वधि॑ति॒र्वना॑ना॒ग्ं॒ सोमः॑ प॒वित्र॒मत्ये॑ति॒ रेभन्॑ ॥ सचि॑त्र चि॒त्र-ञ्चि॒तयन्᳚तम॒स्मे चित्र॑क्षत्र चि॒त्रत॑मं-वँयो॒धाम् । च॒न्द्रं र॒यि-म्पु॑रु॒वीरम्᳚ बृ॒हन्त॒-ञ्चन्द्र॑च॒न्द्राभि॑र्गृण॒ते यु॑वस्व ॥
ॐ अधिदेवता प्रत्यधिदेवता सहितेभ्यः केतु॑भ्यो॒ नमः॑ ॥ ९ ॥

॥ ॐ आदित्यादि नवग्रह देव॑ताभ्यो॒ नमो॒ नमः॑ ॥
॥ ॐ शान्ति॒-श्शान्ति॒-श्शान्तिः॑ ॥

विष्णु सूक्तम्
मन्त्र पुष्पम्
नारायण सूक्तम्
श्री काल हस्तीश्वर शतकम् – శ్రీ కాళ హస్తీశ్వర శతకం
सुमती शतकम् – సుమతీ శతకం
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