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नृसिंह स्तोत्रस्तोत्र

नृसिंह गद्यं

Sanatani
Last updated: जनवरी 26, 2026 8:41 अपराह्न
Sanatani
Published: जनवरी 26, 2026
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नृसिंह गद्यं

सिंह गद्यं (Narasimha Gadyam) श्रीरामानुजाचार्य द्वारा रचित एक महत्त्वपूर्ण संस्कृत स्तोत्र है जो भगवान नृसिंह को समर्पित है। यह गद्य है, जो भक्ति, वेदांत और दर्शन के अनूठे मिश्रण के रूप में जाना जाता है। यह स्तोत्र श्रीवैष्णव परंपरा में अत्यंत पूजनीय माना जाता है और इसे विशेषतः पंचांग स्तोत्र (पाँच प्रमुख स्तोत्रों) में शामिल किया जाता है। श्रीरामानुजाचार्य (1017–1137 ई.) दक्षिण भारत के एक महान वैष्णव संत और दर्शनशास्त्री थे। उन्होंने विशिष्टाद्वैत वेदांत (Qualified Non-Dualism) का प्रतिपादन किया और भक्तिमार्ग को दार्शनिक आधार प्रदान किया। उन्होंने श्रीरंगनाथ (भगवान विष्णु) के प्रति अत्यंत गहरी भक्ति व्यक्त की और उनकी स्तुति में कई गद्य स्तोत्रों की रचना की।

Contents
  • नृसिंह गद्यं
  • नृसिंह गद्यं
  • नृसिंह गद्यं का सार
  • नृसिंह गद्यं का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व

नृसिंह गद्यं को श्रीरंग गद्यं और शरणागति गद्यं के साथ मिलाकर देखा जाता है। ऐसा माना जाता है कि रामानुजाचार्य ने भगवान श्रीरंगनाथ के सम्मुख यह गद्य रचनाएँ एक ही दिन, श्रीराम नवमी के दिन प्रस्तुत की थीं।

नृसिंह गद्यं

सत्यज्ञानसुखस्वरूपममलं क्षीराब्धिमध्ये स्थितं
योगारूढमतिप्रसन्नवदनं भूषासहस्रोज्वलम्।
त्र्यक्षं चक्रपिनाकस्नाभयकरान्बिभ्राणमर्कच्छविं
छत्रीभूतफणीन्द्रमिन्दुधवलं लक्ष्मीनृसिंहं भजे।
भक्तिमात्रप्रतीत नमस्ते नमस्ते ।
अखिलमुनिजननिवह विहितसवनकदनकर खरचपलचरितभयद बलवदसुरपतिकृत विविधपरिभवभयचकित
निजपदचलित निखिलमखमुखविरहकृशतरजलजभवमुख सकलसुरवरनिकर कारुण्याविष्कृतचण्ड दिव्य नृसिंहावतार स्फुरितोदग्रतारध्वनिभिन्नाम्बरतार निजरणकरणरभसचलितरणद सुरगणपटुपटहविकटरव
परिगत चटुलभटरवरणित परिभवकर धरणिधर
कुलिशघट्टनोद्भूतध्वनिगम्भीरात्मगर्जितनिर्जितघनाघन
ऊर्जितविकटगर्जितसृष्टखलतर्जित सद्गुणगणोर्जित
योगिजनार्जित सर्वमलवर्जित
लक्ष्मीघनकुचतटनिकटविलुण्ठन विलग्नकुङ्कुम पङ्कशङ्काकरारुण मणिकिरणानुरञ्जितविगत शशाकलङ्क शशाङ्कपूर्णमण्डलवृत्त स्थूलधवलमुक्तामणि विघट्टितदिव्यमहाहार
ललितदिव्यविहार विहितदितिजप्रहार
लीलाकृतजगद्विहार संसृतिदुःखसमूहापहार
विहितदनुजापहार युगान्तभुवनापहार
अशेषप्राणिगणविहित सुकृतदुष्कृत
सुदीर्घदण्डभ्रामित बृहत्कालचक्रभ्रमणकृतिलब्धप्रारम्भ
स्थावरजङ्गमात्मकसकलजगज्जालजल धारणसमर्थ ब्रह्माण्डनामधेय महापिठरकरण प्रवीणकुम्भकार निरस्तसर्वविस्तार निरस्तषड्भावविकार विविधप्रकार त्रिभुवनप्रकार अनिरूपितनिजाकार
नियतभिक्षादिलब्धगतरसपरिमित भोज्यमात्रसन्तोष
बलविजित मदमदननिद्रादिदोषजनधनस्नेहलोभादि दृढबन्धनच्छेद लब्धसौख्य सततकृतयोगाभ्यासनिर्मलान्तःकरणयोगीन्द्रकृतसन्निधान
त्रिजगन्निधान सकलप्रधान मायापिधान सुशुभाभिधान
मदविकसदसुरभटमकुट वनानलनिभनयन
विलसदसिकवचभुजघनवनलवननवरुधिरक्रमकल्पित
मीनशञ्चत्तरङ्गशैवालमहाजलूकदुस्तरपङ्कजलनिवहकलित
महासुरपृतनाकमलिनीविलोलनकेलिप्रिय मत्तवारण
दुष्टजनमारण शिष्टजनतारण
नित्यसुखविचारण सिद्धबलकारण
सुदुष्टासुरदारण सदृशीकृताञ्जन
जनदोषभञ्जन घनचिन्निरञ्जन
निरन्तरकृतभक्तवाञ्छन गतसर्ववाञ्छन
विश्वनाटकसूत्रधार अङ्घ्रिधूलिजातखसिन्धुधार
मध्वसृक्लुतचक्रधार जनितकाम
विगतकाम सुरजनकाम
उद्धृतक्षम निश्चलजनसत्क्रियाक्षम
सुरनतचरण धृतरथचरण विविधसुरविहरण
विगतविकार विकरण विबुधजनशरण
सततप्रीत त्रिगुणव्यतीत प्रणतजनवत्सल नमस्ते नमस्ते ।

नृसिंह गद्यं का सार

नृसिंह गद्यं एक प्रकार की करुणा की याचना है। इसमें श्रीरामानुजाचार्य भगवान नृसिंह से प्रार्थना करते हैं कि वे उन्हें संसार बंधन से मुक्त करें, अपनी शरण में लें और अपनी कृपा से मोक्ष प्रदान करें।

इस गद्य में श्रीनृसिंह के निम्न गुणों की महिमा का वर्णन किया गया है:

  • उग्रता और सौम्यता का समन्वय – भगवान नृसिंह अपने भक्तों के लिए अत्यंत सौम्य और करुणामय हैं, परंतु दुष्टों के लिए उग्र और विनाशक हैं।
  • शरणागतवत्सलता – नृसिंह भगवान का सबसे मुख्य गुण यह है कि वे शरण में आए हुए को कभी निराश नहीं करते। यही भाव रामानुजाचार्य इस गद्य में व्यक्त करते हैं।
  • भक्तवत्सलता – प्रह्लाद जैसे भक्त के लिए उन्होंने स्वयं अवतार लिया, यही उनके कृपालु स्वरूप का प्रतीक है।

नृसिंह गद्यं का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व

  1. भय और संकट के समय पाठ – यह माना जाता है कि नृसिंह गद्यं का पाठ करने से व्यक्ति को भय, संकट और मानसिक व्यथा से मुक्ति मिलती है।
  2. मोक्ष की प्राप्ति की भावना – इसमें भक्ति और आत्मसमर्पण के माध्यम से मुक्ति की कामना की गई है, जो वैष्णव परंपरा की विशेषता है।
  3. दर्शन और भक्ति का समन्वय – यह गद्य न केवल भक्ति की चरम अभिव्यक्ति है, बल्कि दर्शनशास्त्र का भी उत्कृष्ट उदाहरण है।

श्रीवैष्णव संप्रदाय में इस गद्य का पाठ विशेष पर्वों, उत्सवों और व्यक्तिगत उपासना में किया जाता है। रामानुजाचार्य का यह स्तोत्र शरणागतिवेदांत की मूल आत्मा को दर्शाता है। यह एक ऐसी भक्ति की मिसाल है जो ज्ञान और वैराग्य से संयुक्त है।

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