शिव भुजंगप्रयात स्तोत्रम् – Shiv Bhujang Prayat Stotram With Lyrics
शिवभुजंगप्रयातस्तोत्रम् एक प्रसिद्ध स्तोत्र है, जिसे भगवान शिव की उपासना के लिए लिखा गया है। यह स्तोत्र भगवान शिव के भक्तों द्वारा उनकी कृपा और आशीर्वाद की प्राप्ति के लिए पाठ किया जाता है। इस स्तोत्र का मुख्य उद्देश्य शिव की महिमा का गुणगान करना और उनके प्रति भक्ति प्रकट करना है।
शिवभुजंगप्रयातस्तोत्रम् का महत्व
शिवभुजंगप्रयातस्तोत्रम् का पाठ करने से भक्तों को अनेक लाभ होते हैं, जैसे:
- शांति और सुकून: यह स्तोत्र मानसिक शांति और सुकून प्रदान करता है।
- दुखों का निवारण: भक्तों के जीवन से दुख और कष्ट दूर करने में मदद करता है।
- सकारात्मक ऊर्जा: यह सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है, जिससे भक्तों का मनोबल बढ़ता है।
- शिव की कृपा: शिवभक्तों को शिव की विशेष कृपा प्राप्त होती है।
शिवभुजंगप्रयातस्तोत्रम् का पाठ
इस स्तोत्र का पाठ नियमित रूप से करना चाहिए। यह विशेष रूप से सोमवार के दिन करना लाभकारी माना जाता है। इसके पाठ से न केवल भक्त को आध्यात्मिक लाभ होता है, बल्कि यह उनके जीवन में सुख, शांति और समृद्धि भी लाता है।
शिवभुजंगप्रयातस्तोत्रम् का भावार्थ
इस स्तोत्र में भगवान शिव के विभिन्न गुणों और लीलाओं का वर्णन किया गया है। इसमें शिव की असीम कृपा, दयालुता और उनकी अनंत शक्तियों का उल्लेख है। भक्त इस स्तोत्र का पाठ करते हुए भगवान शिव की महानता का अनुभव करते हैं और उनके प्रति अपनी भक्ति को और भी प्रगाढ़ करते हैं।

शिव भुजंगप्रयात स्तोत्रम् – Shiva Bhujanga Prayata Stotram
श्रीगणेशाय नम: ॥
गलद्दानगंडं मिलद्भृंगखण्डं चलच्चारुशुण्डं जगत्राणशौण्डम् ।
लसद्दंतकाण्डं विपद्भंगचंडं शिवप्रेमपिंडं भजे वक्रतुंडम् ॥ १ ॥
अनाद्यं तमाद्यं परं तत्त्वमर्थं चिदाकारमेकंतुरीयं त्वमेयम् ।
हरिब्रह्ममृग्यं परब्रह्मरूपं मनोवागतीतं मह: शैवमीडे ॥ ॥ २ ॥
स्वशक्त्यादिशक्त्यंतसिंहासनस्थं मनोहारि सर्वाङ्गरत्नादिभूषम् ।
जटाहींदुगङ्गास्थिशश्यर्कमौलिं परं शक्तिमित्रं नम: पंचवक्रम् ॥ ३ ॥
शिवेशानतत्पूरुषाघोरवामादिभिर्ब्रह्माभिर्ह्रन्मुखै: षड्भिरंगै: ।
अनौपम्यषट्त्रिंशतं तत्त्वविद्यामतीतं परं त्वां कथे वेत्ति को वा ॥ ४ ॥
प्रवालप्रवाहप्रभाशोणमर्धं मरुत्वन्मणिश्रीमह:श्याममर्धम् ।
गणस्यूतमेकं वपुश्चेकमंत: स्मरामि स्मरापत्तिसंपत्तिहेतुम् ॥ ५ ॥
स्वसेवासमायातदेवासुरेन्द्रा नमन्मौलिमंदारमालाभिषिक्तम् ।
नमस्यामि शम्भो पदांभोरुहं ते भवांभोधिपोतं भवानी विभाव्यम् ॥ ६ ॥
जगन्नाथ मन्नाथ गौरीसनाथ प्रपन्नानुकंपिन्विपन्नार्तिहारिन् ।
मह:स्तोममूर्ते समस्ते कबन्धो नमस्ते नमस्ते पुनस्ते नमोऽस्तु ॥ ७ ॥
महादेव देवेश देवादिदेव स्मरारे पुरारे यमारे हरेति ॥
ब्रुवाण:स्मरिष्यामि भक्त्या भवंतं ततो मे दयाशीलदेव प्रसीद ॥ ८ ॥
विरूपाक्ष विश्वेश विद्यादिकेश त्रयीमूल शंभो शिव त्र्यंबकत्वम् ।
प्रसीद स्मर त्राहि पश्यावपुष्य क्षमस्वाप्नुहीति क्षपा हि क्षिपाम: ॥ ९ ॥
त्वदन्य:शरण्य: प्रपन्नस्य नेति प्रसीद स्मरन्नेव हन्यास्तु दैन्यम६ ।
नचेत्ते भवद्भक्तंवात्सल्यहानिस्ततो मे दयालो दयां संनिधेहि ॥ १० ॥
अयं दानकालस्त्वहं दानपात्रं भवन्नाथ दातात्वदन्यं न याचे ॥
भवद्भक्तिमेव स्थिरां देहि मह्यं कृपाशील शंभो कृतार्थोऽस्मि तस्मात् ॥ ११ ॥
पशुं वेत्सि चेन्मां त्वमेवाधिरूढ: कलंकीर्ति वा मूर्ध्निधत्सेत्वमेव ।
द्विजिह्व: पुन: सोपि ते कंठभूषा त्वदङ्गीकृता: शर्व सर्वेऽपि धन्या: ॥ १२ ॥
न शक्नोमि कर्तुं परद्रोहलेशं कथं प्रीयसे त्वं न जाने गिरीश ।
तदाहि प्रसन्नोऽसि कस्यापि कांतासुतद्रोहिणो वा पितृद्रोहिणी वा ॥ १३ ॥
स्तुतिं ध्यानमर्चां यथावद्विधातुं भजन्नप्यजानन् महेशावलंबे ।
त्रसंतं सुतं त्रातुमग्र मृकंडोर्यमप्राणनिर्वापणं त्वत्पदाब्जम६ ॥ १४ ॥
अकंठेकलंकदनंगेभुजंगादपाणौकपालादभालेऽनलाक्षात् ।
अमौलौ शशांकादवामेकलत्रादहं देवमन्यं न मन्ये न मन्ये ॥ १५ ॥
इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्य श्रीमच्छंकराचार्य विरचितं
श्रीशिवभुजंगप्रयातस्तोत्रं संपूर्णम् ।

