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SanatanWeb.com > Blog > गीतकाव्य > भजन > विष्णु भजन > जगतमें कोइ नहिं तेरा रे
भजनविष्णु भजन

जगतमें कोइ नहिं तेरा रे

Sanatani
Last updated: जनवरी 24, 2026 2:21 अपराह्न
Sanatani
Published: जनवरी 24, 2026
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जगतमें कोइ नहिं तेरा रे – Jagatamen Koi Nahin Tera Re

 

जगतमें कोइ नहिं तेरा रे ।

छाड वृथा अभिमान त्याग दे मेरा-मेरा रे ॥

काल-करम बस जग-सराय बिच कीन्हा डेरा रे ।

इस सरायमें सभी मुसाफर, रैन बसेरा रे ॥

जिस तनको तू सदा सँवारै, साँझ-सबेरा रे ।

एक दिन मरघट पड़े भसमका होकर देरा रे॥

मात-पिता, भ्राता, सुत-बांधव, नारी-चेरा रे ।

अंत न होय सहाय, काल जब देवै घेरा रे ॥

जंगका सारा भोग सदा कारन दुस्खकेरा रे ।

भज मन इरिका नाम, पार हो भव-जल बेरा रे ।।

दीनदयालु भक्त बत्सल हरि मालिक तेरा रे ।

दीन होय उनके चरनोंमें कर ले डेरा रे ॥

हे हरि ब्रजबासिन मुहिं कीजे
प्रियतम न छिप सकोगे
सौंप दिये मन प्राण उसी को मुखसे गाते उसका नाम
खबर मोरी ले रही हो बागेश्वर गड़ा के हनुमान
खड़ा अपराधी प्रभुके द्वार (Khada Aparaadhee Prabhuke Dvaar)
TAGGED:राग कान्हरा ( Raag Kaanhara )श्री विष्णु चरण वन्दन ( Shree Vishnu Charan Vandan )श्री विष्णु भजन ( Shree Vishnu Bhajan )
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