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चालीसा

श्री गणेश चालीसा

Sanatani
Last updated: जनवरी 22, 2026 7:11 अपराह्न
Sanatani
Published: जनवरी 22, 2026
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श्री गणेश चालीसा

श्री गणेश चालीसा हिंदू धर्म में भगवान गणेश को समर्पित एक लोकप्रिय भक्ति भजन और प्रार्थना है। यह चालीस छंदों (चालीसा) का एक संग्रह है, जो गणपति की महिमा, उनके गुणों और भक्तों के प्रति उनकी कृपा का वर्णन करता है। भगवान गणेश, जिन्हें विघ्नहर्ता, बुद्धि के दाता और प्रथम पूज्य के रूप में जाना जाता है, हिंदू धर्म में विशेष स्थान रखते हैं। श्री गणेश चालीसा का पाठ भक्तों के लिए आध्यात्मिक शक्ति, सुख-समृद्धि और बाधाओं से मुक्ति का स्रोत माना जाता है। आइए, इस पवित्र रचना के बारे में विस्तार से जानें।

Contents
  • श्री गणेश चालीसा
  • Shree Ganesh Chalisa
  • आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्व
  • पाठ करने का विधि-विधान
  • लोकप्रियता और प्रसार
  • गणेश चालीसा के लाभ

श्री गणेश चालीसा की रचना का श्रेय स्पष्ट रूप से किसी एक लेखक को नहीं दिया जाता, लेकिन इसे लोक परंपरा और भक्ति साहित्य का हिस्सा माना जाता है। कुछ विद्वानों का मानना है कि यह तुलसीदास द्वारा रचित “श्री रामचरितमानस” और “हनुमान चालीसा” की लोकप्रियता से प्रेरित होकर लिखी गई होगी। चालीसा शैली में रचनाएँ भक्ति काव्य की एक सरल और प्रभावशाली विधा हैं, जो आम जन तक आसानी से पहुँचती हैं। यह हिंदी और अवधी जैसी प्रचलित भाषाओं में लिखी गई है, जिससे भक्त इसे आसानी से गा सकें और समझ सकें।

गणेश चालीसा
गणेश चालीसा

Shree Ganesh Chalisa

॥ दोहा ॥
जय गणपति सदगुण सदन,कविवर बदन कृपाल।
विघ्न हरण मंगल करण,जय जय गिरिजालाल॥

॥ चौपाई ॥
जय जय जय गणपति गणराजू।
मंगल भरण करण शुभः काजू॥
जै गजबदन सदन सुखदाता।
विश्व विनायका बुद्धि विधाता॥

वक्र तुण्ड शुची शुण्ड सुहावना।
तिलक त्रिपुण्ड भाल मन भावन॥
राजत मणि मुक्तन उर माला।
स्वर्ण मुकुट शिर नयन विशाला॥

पुस्तक पाणि कुठार त्रिशूलं।
मोदक भोग सुगन्धित फूलं॥
सुन्दर पीताम्बर तन साजित।
चरण पादुका मुनि मन राजित॥

धनि शिव सुवन षडानन भ्राता।
गौरी लालन विश्व-विख्याता॥
ऋद्धि-सिद्धि तव चंवर सुधारे।
मुषक वाहन सोहत द्वारे॥

कहौ जन्म शुभ कथा तुम्हारी।
अति शुची पावन मंगलकारी॥
एक समय गिरिराज कुमारी।
पुत्र हेतु तप कीन्हा भारी॥

भयो यज्ञ जब पूर्ण अनूपा।
तब पहुंच्यो तुम धरी द्विज रूपा॥
अतिथि जानी के गौरी सुखारी।
बहुविधि सेवा करी तुम्हारी॥

अति प्रसन्न हवै तुम वर दीन्हा।
मातु पुत्र हित जो तप कीन्हा॥
मिलहि पुत्र तुहि, बुद्धि विशाला।
बिना गर्भ धारण यहि काला॥

गणनायक गुण ज्ञान निधाना।
पूजित प्रथम रूप भगवाना॥
अस कही अन्तर्धान रूप हवै।
पालना पर बालक स्वरूप हवै॥

बनि शिशु रुदन जबहिं तुम ठाना।
लखि मुख सुख नहिं गौरी समाना॥
सकल मगन, सुखमंगल गावहिं।
नाभ ते सुरन, सुमन वर्षावहिं॥

शम्भु, उमा, बहुदान लुटावहिं।
सुर मुनिजन, सुत देखन आवहिं॥
लखि अति आनन्द मंगल साजा।
देखन भी आये शनि राजा॥

निज अवगुण गुनि शनि मन माहीं।
बालक, देखन चाहत नाहीं॥
गिरिजा कछु मन भेद बढायो।
उत्सव मोर, न शनि तुही भायो॥

कहत लगे शनि, मन सकुचाई।
का करिहौ, शिशु मोहि दिखाई॥
नहिं विश्वास, उमा उर भयऊ।
शनि सों बालक देखन कहयऊ॥

पदतहिं शनि दृग कोण प्रकाशा।
बालक सिर उड़ि गयो अकाशा॥
गिरिजा गिरी विकल हवै धरणी।
सो दुःख दशा गयो नहीं वरणी॥

हाहाकार मच्यौ कैलाशा।
शनि कीन्हों लखि सुत को नाशा॥
तुरत गरुड़ चढ़ि विष्णु सिधायो।
काटी चक्र सो गज सिर लाये॥

बालक के धड़ ऊपर धारयो।
प्राण मन्त्र पढ़ि शंकर डारयो॥
नाम गणेश शम्भु तब कीन्हे।
प्रथम पूज्य बुद्धि निधि, वर दीन्हे॥

बुद्धि परीक्षा जब शिव कीन्हा।
पृथ्वी कर प्रदक्षिणा लीन्हा॥
चले षडानन, भरमि भुलाई।
रचे बैठ तुम बुद्धि उपाई॥

चरण मातु-पितु के धर लीन्हें।
तिनके सात प्रदक्षिण कीन्हें॥
धनि गणेश कही शिव हिये हरषे।
नभ ते सुरन सुमन बहु बरसे॥

तुम्हरी महिमा बुद्धि बड़ाई।
शेष सहसमुख सके न गाई॥
मैं मतिहीन मलीन दुखारी।
करहूं कौन विधि विनय तुम्हारी॥

भजत रामसुन्दर प्रभुदासा।
जग प्रयाग, ककरा, दुर्वासा॥
अब प्रभु दया दीना पर कीजै।
अपनी शक्ति भक्ति कुछ दीजै॥

॥ दोहा ॥
श्री गणेश यह चालीसा,पाठ करै कर ध्यान।
नित नव मंगल गृह बसै,लहे जगत सन्मान॥

सम्बन्ध अपने सहस्र दश,ऋषि पंचमी दिनेश।
पूरण चालीसा भयो,मंगल मूर्ती गणेश॥

आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्व

श्री गणेश चालीसा का पाठ भक्तों के लिए कई मायनों में महत्वपूर्ण है:

  • सांस्कृतिक एकता: यह चालीसा भारत के विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग धुनों और भावों के साथ गाई जाती है, जो सांस्कृतिक एकता को दर्शाती है।
  • विघ्नों का नाश: गणेश जी को विघ्नहर्ता कहा जाता है। इस चालीसा का नियमित पाठ जीवन की बाधाओं को दूर करने में सहायक माना जाता है।
  • बुद्धि और समृद्धि: गणपति बुद्धि, ज्ञान और धन के दाता हैं। यह चालीसा पढ़ने से मानसिक शांति और आर्थिक उन्नति की कामना की जाती है।
  • प्रथम पूजा का प्रतीक: किसी भी शुभ कार्य से पहले गणेश जी की पूजा की परंपरा है। चालीसा का पाठ इस परंपरा को और सशक्त बनाता है।

पाठ करने का विधि-विधान

श्री गणेश चालीसा का पाठ करने के लिए कुछ सामान्य नियम अपनाए जाते हैं:

  • शुद्धता: पाठ से पहले स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
  • समय: सुबह या शाम का समय उत्तम माना जाता है, विशेषकर बुधवार को, जो गणेश जी का दिन है।
  • पूजा सामग्री: गणेश जी की मूर्ति या चित्र के सामने दीप जलाएँ, धूप करें और मोदक या लड्डू का भोग लगाएँ।
  • संख्या: 11, 21 या 40 बार पाठ करने की परंपरा है, खासकर किसी विशेष मनोकामना के लिए।

लोकप्रियता और प्रसार

श्री गणेश चालीसा की लोकप्रियता केवल भारत तक सीमित नहीं है। यह विदेशों में बसे हिंदू समुदायों में भी प्रचलित है। इसे विभिन्न संगीतकारों और गायकों ने अपनी आवाज दी है, जैसे कि अनुराधा पौडवाल और हरिओम शरण। आजकल यूट्यूब, स्पॉटिफाई जैसे प्लेटफॉर्म्स पर इसके कई संस्करण उपलब्ध हैं, जो इसे नई पीढ़ी तक पहुँचा रहे हैं। गणेश चतुर्थी जैसे त्योहारों पर इसका पाठ विशेष रूप से किया जाता है।

गणेश चालीसा के लाभ

भक्तों का मानना है कि श्री गणेश चालीसा के नियमित पाठ से कई लाभ मिलते हैं:

  • मानसिक शांति और एकाग्रता में वृद्धि।
  • कार्यों में सफलता और बाधाओं से मुक्ति।
  • परिवार में सुख-समृद्धि और शांति का वास।
  • आत्मविश्वास और सकारात्मक ऊर्जा का संचार।
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