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वाजश्रवस ऋषि

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वाजश्रवस ऋषि
वाजश्रवस ऋषि 2

कठोपनिषद के प्रथम अध्याय के प्रथम श्लोक मे ऋषि वाजश्रवस का वर्णन मिलता है जो इस प्रकार है

“ॐ उशन्ह वै वाजश्रवसः सर्ववेदसं ददौ । तस्य ह नचिकेता नाम पुत्र आस ॥ १ ॥”

वाज‘ अन्नको कहते हैं। उसके दानादिके कारण जिसका श्रव यानी यश हो उसे वाजश्रवा कहते हैं; अथवा रूढिसे भी यह उसका नाम हो सकता है। उस वाजश्रवाके पुत्र वाजश्रवसने विश्वजित् नामक यज्ञ का आयोजन किया जिस यज्ञमे सर्वस्व समर्पण किया जाता है उस विश्वजित् यज्ञद्वारा वाजश्रवस ऋषि ने दान कर रहे थे।

वाजश्रवस(उद्दालक) उपनिषद् युग के श्रेष्ठ तत्ववेत्ताओं में मूर्धन्य चिंतक थे। ये गौतम गोत्रीय अरुणि ऋषि के पुत्र थे और इसीलिए ‘उद्दालक आरुणि’ के नाम से विशेष प्रख्यात हैं। वाजश्रवस महाभारत में धौम्य ऋषि के शिष्य तथा अपनी एकनिष्ठ गुरुसेवा के आदर्श शिष्य बतलाए गए हैं। इतिहास में आरुणि का पद याज्ञवल्क्य के ही समकक्ष माना जाता है . उन वाजश्रवस अर्थात उद्दालक ऋषि का नचिकेता नाम का एक तेजस्वी ऋषि बालक थे। इनकी कथा तैतरीय ब्राह्मण, कठोपनिषद् तथा महाभारत में उपलब्ध होती है। जिस समय यज्ञ के संपन्न होने पर उनके पिता(वाजश्रवस) गायो आदि का दान कर रहे थे। तो नचिकेता बड़ी श्रद्धा के साथ वहां आया। सभी यज्ञ में पधारे हुए ऋषि दक्षिणायें गायो सहित स्वीकार करके जा रहे थे। जब वे देखते हैं कि पिताजी जीर्ण-शीर्ण गौएँ तो ब्राह्मणोंको दान कर रहे हैं और दूध देनेवाली पुष्ट गायें मेरे लिये रख छोड़ी हैं तो बाल्यावस्था होनेपर भी उनकी पितृभक्ति उन्हें चुप नहीं रहने देती और वे बालसुलभ चापल्य प्रदर्शित करते हुए वाजश्रवासे पूछ बैठते हैं-

‘तत कस्मै मां दास्यसि’ अर्थात पिताजी, आप मुझे किसको देंगे ?

उनका यह प्रश्न ठीक ही था, क्योंकि विश्वजित् यागमें सर्वस्वदान किया जाता है, और ऐसे सत्पुत्रको दान किये बिना वह पूर्ण नहीं हो सकता था । वस्तुतः सर्वस्वदान तो तभी हो सकता है जब कोई वस्तु ‘अपनी’ न रहे और यहाँ अपने पुत्रके मोहसे ही ब्राह्मणोंको निकम्मी और निरर्थक गौएँ दी जा रही थीं; अतः इस मोहसे पिताका उद्धार करना उनके लिये उचित ही था । इसी तरह कई बार पूछनेपर जब वाजश्रवाने खीझकर कहा कि मैं तुझे मृत्युको दान कर दूँगा, तो उन्होंने यह जानकर भी कि पिताजी क्रोधवश ऐसा कह गये हैं, उनके कथनकी उपेक्षा नहीं की। और उनका यमलोक-गमन उन्हींके लिये नहीं उनके पिताके लिये और सारे संसारके लिये भी कल्याणकारी ही हुआ ।

यमराज से नचिकेता की भेट

यमलोकमें पहुँचनेपर भी जबतक यमराजसे उनकी भेंट नहीं हुई तबतक उन्होंने अन्न-जल कुछ भी ग्रहण नहीं किया। इससे भी उनकी प्रौढ सत्यनिष्ठाका पता लगता है। उनका शरीर यमराजको दान किया जा चुका था, अतः अब उसपर यमराजका ही पूर्ण अधिकार था; उनका तो सबसे पहला कर्तव्य यही था कि वे उसे धर्मराजको सौंप दें। इसीसे वे भोजनाच्छादनादिको चिन्ता छोड़कर यमराजके द्वारपर ही पड़े रहे। तीन दिन पश्चात् जब यमराज आये तो उन्होंने उन्हें एक-एक दिनके उपवासके लिये एक-एक वर दिया।

ऐसा ही नचिकेताके साथ भी हुआ । उनका यमलोक-गमन उन्हींके लिये नहीं उनके पिताके लिये और सारे संसारके लिये भी कल्याणकर ही हुआ ।

यमलोकमें पहुँचनेपर भी जबतक यमराजसे उनकी भेंट नहीं हुई तबतक उन्होंने अन्न-जल कुछ भी ग्रहण नहीं किया। इससे भी उनकी प्रौढ सत्यनिष्ठाका पता लगता है। उनका शरीर यमराजको दान किया जा चुका था, अतः अब उसपर यमराजका ही पूर्ण अधिकार था; उनका तो सबसे पहला कर्तव्य यही था कि वे उसे धर्मराजको सौंप दें। इसीसे वे भोजनाच्छादनादिको चिन्ता छोड़कर यमराजके द्वारपर ही पड़े रहे। तीन दिन पश्चात् जब यमराज आये तो उन्होंने उन्हें एक-एक दिनके उपवासके लिये एक-एक वर दिया। इसपर नचिकेताने यमराजसे जो तीन वर माँगे हैं उनके क्रममें भी एक अद्भुत रहस्य है।

नचिकेता का प्रथम वरदान (पितृपरितोष)

शान्तसंकल्पः सुमना यथा स्या-द्वीतमन्युगौतमो माभि मृत्यो ।
त्वत्प्रसृष्टं माभिवदेत्प्रतीत एतत्त्रयाणां प्रथमं वरं वृणे ॥ १०॥

हे मृत्यो ! जिससे मेरे पिता वाजश्रवस मेरे प्रति शान्तसङ्कल्प, प्रसन्नचित्त और क्रोधरहित हो जायँ तथा आपके भेजनेपर मुझे पहचानकर बातचीत करें- यह मैं आपके दिये हुए तीन वरोंमेंसे पहला वर माँगता हूँ ।॥ १० ॥

जिस प्रकार मेरे पिता मेरे प्रति शान्तसङ्कल्प-जिनका ऐसा सङ्कल्प शान्त हो गया है कि ‘न जाने मेरा पुत्र यमराजके पास जाकर क्या करेगा,’ सुमनाः– प्रसन्नचित्त और बीतमन्यु क्रोध- रहित हो जायँ और हे मृत्यो ! आपके सेजे हुए घरकी ओर जानेके लिये छोड़े हुए मुझसे विश्वस्त-लब्धस्मृति होकर अर्थात्
ऐसा स्मरण करके कि यह मेरा बही पुत्र मेरे पास लौट आया है, सम्भाषण करें । यह अपने पिताकी प्रसन्नतारूप प्रयोजन हो मैं अपने तीन वरोंमेंसे पहला वर माँगता हूँ 

उनका पहला वर था पितृपरितोष । वे पिताके सत्यकी रक्षाके लिये उनकी इच्छाके विरुद्ध यमलोकको चले आये थे। इससे उनके पिता खभावतः बहुत खिन्न थे। इसलिये उन्हें सबसे पहले यही आवश्यक जान पड़ा कि उन्हें शान्ति मिलनी चाहिये। यह नियम है कि यदि हमारे कारण किसी व्यक्तिको खेद हो तो, जबतक हम उसका खेद निवृत्त न कर देंगे, हमें भी शान्ति नहीं मिल सकती। यह नियम मनुष्यमात्रके लिये समान है; और यहाँ तो स्वयं उनके पूज्य पिताको ही खेद थाः इसलिये सबसे पहले उनकी शान्ति अभीष्ट होनी ही चाहिये थी। यह पितृपरितोष उनकी दृष्ट शान्तिका कारण था, इसलिये सबसे पहले उन्होंने यही वर माँगा । लौकिक-शान्तिके पश्चात् मनुष्यको स्वभावसे ही पारलौकिक सुखकी इच्छा होती है। यहाँतक कि जब वह अधिक प्रबल हो जाती है तो वह ऐहिक सुखकी कुछ भी परवा नहीं करता ।

नचिकेता का दूसरा वरदान (स्वर्गसाधनभूत अग्निविद्या)

स्वर्ग लोके न भयं किंचनास्ति उभे न तत्र त्वं न जरया बिभेति ।
तीर्त्वाशनायापिपासे शोकातिगो मोदते खर्गलोके ॥ १२ ॥

हे मृत्युदेव ! स्वर्गलोकमें कुछ भी भय नहीं है। वहाँ आपका भी वश नहीं चलता। वहाँ कोई वृद्धावस्थासे भी नहीं डरता । स्वर्गलोकमें पुरुष भूख-प्यास-दोनोंको पार करके मानता है ॥ १२ ॥

स्वर्गलोकमै रोगादिके कारण होनेवाला भय तनिक भी नहीं है। हे मृत्यो ! वहाँ आपकी भी सहसा दाल नहीं गलती । अतः इस लोकके समान वहाँ वृद्धावस्थासे युक्त होकर कोई पुरुष आपसे कहीं नहीं डरता । बल्कि पुरुष भूख- प्यास दोनोंको पार करके, जो शोकको अतिक्रमण कर जाय ऐसा शोकातीत होकर मानसिक दुःखसे छुटकारा पाकर उस दिव्य स्वर्गलोकमें आनन्द मानता है।

स त्वमग्नि स्वर्ण्यमध्येषि मृत्यो प्रब्रूहि त्व श्रद्दधानाय मह्यम् ।
स्वर्गलोका अमृतत्वं भजन्त एत‌द्द्द्वितीयेन वृणे वरेण ॥ १३ ॥

हे मृत्यो ! आप स्वर्गके साधनभूत अग्निको जानते हैं, सो मुझ श्रद्धालुके प्रति उसका वर्णन कीजिये, [जिसके द्वारा ] स्वर्गको प्राप्त हुए पुरुष अमृतत्व प्राप्त करते हैं। दूसरे वरसे मैं यही माँगता हूँ।

उपयुक्त उद्धरणोंसे उनकी तीव्र जिज्ञासा और आत्मदर्शनकी अनवरत बिपासा स्पष्ट प्रतीत होती है। इसीसे प्रेरित होकर उन्होंने दितीय वर मांगा ।

नचिकेता का तीसरा वरदान (आत्मरहस्य)

येयं प्रेते विचिकित्सा मनुष्ये- ऽस्तीत्येके नायमस्तीति चैके ।
एतद्विद्यामनुशिष्टस्त्वयाहं वराणामेष वरस्तृतीयः ॥ २० ॥

मरे हुए मनुष्यके विषयमें जो इस प्रकारका सन्देह है कि कोई लोग तो ऐसा कहते हैं कि शरीर, इन्द्रिय, मन और बुद्धिसे अतिरिक्त देहान्तरसे सम्बन्ध रखनेवाला आत्मा रहता है और किन्हींका कथन है कि ऐसा कोई आत्मा नहीं रहता; अतः इसके विषयमें हमें प्रत्यक्ष अथवा अनुमानसे कोई निश्चित ज्ञान नहीं होता और परम पुरुषार्थ इस विज्ञानके ही अधीन है। इसलिये आपसे शिक्षित अर्थात् विज्ञापित होकर मैं इसे भली प्रकार जान सकूँ । यही मेरे बरोंमेंसे बचा | हुआ तीसरा वर है ॥

नचिकेता निःश्रेयसके साधन आत्मज्ञानके योग्य पूर्णतया परे है या नहीं इस बातकी परीक्षा करनेके लिये यमराजने कहा इस आत्मतत्त्वके विषयमें पहले–पूर्वकालमें देवताओंने भी जानने का प्रयास किया था । साधारण मनुष्योके लिये यह कथन सुने जानेपर भी सुज्ञेय अच्छी तरह जानने योग्य नहीं है, क्योंकि – यह ‘आत्मा’ नामवाला धर्म बड़ा ही अणु-सूक्ष्म(कठिन) है । अतः हे नचिकेता ! कोई दूसरा निश्चित फल देनेवाला वर माँग ले । जैसे धनी ऋणीको दबाता है उसी प्रकार तू मुझे न रोक । इस वरको तू मेरे लिये छोड़ दे ॥

जिनकी सौ वर्षकी आयु हो | ऐसे शतायु पुत्र और पौत्र माँग ले। तथा गौ आदि बहुत-से पशु, हाथी और सुवर्ण तथा घोड़े और पृथ्वी का महान् विस्तृत आयतन आश्रय-मण्डल अर्थात् राज्य माँग ले । परन्तु यदि स्वयं अल्पायु हो तो ये सब व्यर्थ ही हैं-इसलिये कहते हैं-तू स्वयं भी जितना जीना चाहे उतने वर्ष जीवित रह; अर्थात् शरीर यानी समग्र इन्द्रिय- कलापको धारण कर ॥ इस उपर्युक्त वरके समान यदि तू कोई और वर समझता हो तो नं उसे भी माँग ले। यही नहीं, धन अर्थात् प्रचुर सुवर्ण और रत्न आदि तथा उस धनके साथ चिरस्थायिनी । जीविका भी माँग ले। अधिक क्या, हे नचिकेतः ! इस विस्तृत भूमिमें तू राजा होकर वृद्धिको प्राप्त हो । और तो क्या, मैं तुझे दैवी और मानुषी सभी कामनाओंका कामभागी अर्थात् इच्छानुसार भोगनेवाला किये देता हूँ, क्योंकि मैं सत्य संकल्प देवता हूँ ॥ मनुष्यलोकमें जो-जो भोग दुर्लभ हैं उन सत्र भोगोंको तू खच्छन्दता- पूर्वक माँग ले । यहाँ रथ और बाजोंके सहित ये रमणियाँ हैं । ऐसी स्त्रियाँ मनुष्योंको प्राप्त होने योग्य नहीं होतीं । मेरे द्वारा दी हुई इन कामिनियोंसे तू. अपनी सेवा करा । परन्तु हे नचिकेतः ! तू मरणसम्बन्धीं प्रश्न मत पूछ ॥ इस प्रकार प्रलोभित किये जाने- पर भी नचिकेताने महान् सरोवरके समान अक्षुब्ध रहकर कहा –

हे यमराज ! ये भोग ‘कल रहेंगे या नहीं’ – इस प्रकारके हैं और सम्पूर्ण इन्द्रियोंके तेजको जीर्ण कर देते हैं। यह सारा जीवन भी बहुत थोड़ा ही है। आपके वाहन और नाच-गान की हमें आवश्यकता नहीं है ॥ मनुष्यको घनसे तृप्त नहीं किया जा सकता । अब यदि आपको देख लिया है तो धन तो हम पा ही लेंगे । जबतक आप शासन करेंगे हम जीवित रहेंगे। किन्तु हमारा प्रार्थनीय वर तो वही है अतः मुझे इन मिथ्या भोगोंसे प्रलोभित करना छोड़कर जिसके लिये मैंने प्रार्थना की है वही वर दीजिए ।

मृत्युकी कही हुई इस पूर्वोक्त ब्रह्मविद्या और कृत्स्त-सम्पूर्ण योग- विधिको, उसके साधन और फलके सहित, वरप्रदानके कारण मृत्युसे प्राप्त कर नचिकेता, ब्रह्मभावको प्राप्त अर्थात् मुक्त हो गया । केवल नचिकेता ही नहीं, बल्कि नचिकेताके समान जो दूसरा भी आत्मज्ञानी है अर्थात् जो अपने देहादिके अधिष्ठाता उपचारशून्य प्रत्यक्स्वरूपको समाज लेता है जो भिन्न प्रकारसे अपने उसी अध्यात्मरूपको जानता है  वह भी विरक्त होकर ब्रह्मप्राप्तिद्वारा मृत्यु हीन हो जाता है ॥

इस प्रकार वाजश्रवस और नचिकेता आज भी हमे प्रेरित करते हुए अमर ही ।

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