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शतकम्

वेमन शतकम् ( వేమన శతకం )

Sanatani
Last updated: जनवरी 24, 2026 5:02 अपराह्न
Sanatani
Published: जनवरी 24, 2026
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वेमन शतकम् ( వేమన శతకం )

वेमना शतकम्(Vemana Satakam), जिसे तेलुगु साहित्य का एक महत्वपूर्ण भाग माना जाता है, वेमना की कविताओं का संग्रह है। वेमना, जिनका पूरा नाम गोना वेमा बुद्धा रेड्डी था, दक्षिण भारत के आंध्र क्षेत्र के एक प्रमुख तेलुगु कवि थे। उनका जन्म 1652 ईस्वीं में हुआ और उनका निधन 1730 ईस्वीं में हुआ। वेमना को योगी वेमना के नाम से भी जाना जाता है और उन्हें वेदों और योग के ज्ञानोपदेश के लिए प्रचारित किया गया है

Contents
  • वेमन शतकम् ( వేమన శతకం )
  • वेमन शतकम्
  • వేమన శతకం
  • FAQs for Vemana Satakam
    • वेमना सतकम क्या है?
    • वेमना कौन थे?
    • वेमना सतकम में कितनी कविताएँ हैं?
    • वेमना सतकम का मुख्य उद्देश्य क्या है?
    • वेमना सतकम की भाषा कैसी है?
    • क्या वेमना सतकम का हिंदी में अनुवाद उपलब्ध है?
    • वेमना सतकम में कौन से मुख्य विषय शामिल हैं?
    • वेमना सतकम का साहित्यिक महत्व क्या है?

वेमना की कविताएँ सरल भाषा में गहरी गूढ़ता और ज्ञान प्रदान करती हैं। उनकी रचनाएँ प्रायः सामाजिक विषयों, नैतिकता, प्रेम, भक्ति, और दर्शन पर आधारित होती हैं। वेमना को उनके संवेदनशील और विचारशील दृष्टिकोण के लिए जाना जाता है, जो उनके काव्य में स्पष्ट रूप से दिखता है। उनके शतक जीवन के विभिन्न पहलुओं को दर्शाते हैं और उनमें गहरे दार्शनिक विचार होते हैं

वेमना की कविताएँ ‘वेमना शतकालु’ के नाम से प्रसिद्ध हैं। ये रचनाएँ न केवल उनके समय के सामाजिक जीवन का चित्रण करती हैं, बल्कि वर्तमान संदर्भ में भी उनका महत्व है। उनके शब्दों में एक अनोखी अर्थ गहराई होती है, जो पाठकों को आत्मिक और बौद्धिक रूप से समृद्ध करती है सी.पी. ब्राउन ने 19वीं शताब्दी में वेमना की कविताओं को संग्रहित और प्रकाशित किया, जिससे उनकी काव्य धारा को संरक्षित किया गया। वेमना की रचनाएँ आज भी पाठकों के बीच बहुत लोकप्रिय हैं और उनका अध्ययन विभिन्न साहित्यिक संस्थानों में किया जाता है

वेमन शतकम्

तलपुलोन गलुगु दा दैवमे प्रॊद्दु
तलचि चूडनतकु तत्वमगुनु
वूऱकुण्ड नेर्वुनुत्तम योगिरा
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ १ ॥

तन विरक्ति यनॆडि दासि चेतनु जिक्कि
मिगिलि वॆडलवेक मिणुकुचुन्न
नरुडि केडमुक्ति वरलॆडि चॆप्पडी
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ २ ॥

तनदु मनसुचेत दर्किञ्चि ज्योतिष
मॆन्त चेसे ननुचु नॆञ्चि चूचु,
तन यदृष्टमन्त दैव मॆऱुङ्गडा?
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ ३ ॥

टीक व्रासिनट्लेनेकुलु पॆद्दलु
लोकमन्दु जॆप्पि मञ्चु
काकुलट्टि जनुल कानरी मर्ममु
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ ४ ॥

ज्ञानमॆन्न गुरुवु ज्ञानहैन्यमु बुद्धि
रॆण्टिनन्दु रिम्मरेचुनपुडु
रिम्म तॆलिपॆनेनि रॆण्डॊक रूपुरा
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ ५ ॥

जाणलमनि यन्द्रु चपलात्मुलगुवारु
तॆलिविलेक तम्मुतॆलियलेरु
कष्टमैन यडवि गासीलुचुन्नारु
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ ६ ॥

जनन मरणमुलन स्वप्न सुषुप्तुलु
जगमुलन्दु नॆण्ड जगमुलुण्डु
नरुडु जगमुनण्ट नडुबाटु कादॊको
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ ७ ॥

छायननॊसगुचॆट्लु साधुवु बोधट्टु
लडगि दरिनिजेरि पडयवच्चु
नट्टुनिट्टु दाटनदि पोवुनिदि राम
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ ८ ॥

नरुडॆयैन लेक नारायणुण्डैन
तत्त्वबद्धुडैन दरणि नरय
मरणमुन्नदनुचु मदिनि नम्मगवलॆ
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ ९ ॥

द्वारम्बन्धमुनकु दलुपुलु गडियलु
वलॆनॆ नोटिकॊप्पुगल नियतुलु
धर्ममॆरिगि पलुक धन्युण्डौ भुविलोन
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ १0 ॥

ब्रह्मघटमु मेनु प्राणम्बु तगगालि
मित्रचन्द्र शिखुलु नेत्रचयमु
मऱियु ब्रह्ममनग महिमीद लेदया
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ ११ ॥

योगिननुचु गॊन्त योगमुगूर्चक
जगमुनॆल्लबट्ट चम्पि तिनुचु
धनमु कॊऱकु वाडु तगवाडुचुण्डिन
योगिकाडु वाडॆ योगु वेम! ॥ १२ ॥

अर्ध यङ्कणमुन काधारमैनट्टि
यॊण्टिमेड गुञ्जु नॊनरनिल्पॆ
निण्टिकॊक मगण्डॆ यिल्लाण्ड्रुनेद्गुरु
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ १३ ॥

अन्नदानमुनकु नधिक सम्पदगल्गि
यमरलोक पूज्युडगुनु मीऱु
अन्नमगुनु ब्रह्ममदि कनलेरया
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ १४ ॥

बॊन्दि यॆवरि सॊम्मु पोषिम्पबलुमारु
प्राण मॆवरि सॊम्मु भक्तिसेय,
धनमदॆवरिसॊम्मु धर्ममॆ तन सॊम्मु
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ १५ ॥

पण्डुवलन बुट्टॆ बरग प्रपञ्चमु
पण्डुवलन बुट्टॆ परमु निहमु
पण्डु मेलॆऱिङ्गॆ ब्रह्लादुडिललोन
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ १६ ॥

तपमुवेल? यरय धात्रिजनुलकॆल्ल
नॊनर शिवुनि जूड नुपम गलदु
मनसु चदरनीक महिलोन जूडरा
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ १७ ॥

तनगुणमु तनकु नुण्डग
नॆनयङ्गा नोरुनि गुणमु नॆञ्चुनु मदिलो
दन गुणमु तॆलिय कन्युनि
बनिगॊनि दूषिञ्चुवाडु व्यर्थुडु वेम! ॥ १८ ॥

जालिनॊन्दरादु जवदाटि कनरादु
अदि मूलमैन आत्ममऱुगु
पोरिचेरि पॊन्दि पूर्णमु नन्दुरा
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ १९ ॥

जाति, मतमु विडिचि चनि योगिकामेलु
जातितो नॆयुन्न नीतिवलदॆ
मतमुबट्टि जाति मानकुण्ट कॊऱन्त
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ २0 ॥

नीवनिननु नेननिननु
भावम्मुन नॆऱुकयॊक्क पद्धतियगुना
भावम्बु दॆलिसि मदिनि
र्भावमुगा निन्नु गनुट परमगु वेम! ॥ २१ ॥

नील्ल मुनुगुनेल? निधुल मॆट्टगनेल
मॊनसि वेल्पुलकुनु म्रॊक्कनेल
कपट कल्मषमुलु कडुपुलो नुण्डगा
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ २२ ॥

पञ्च मुखमुलन्दु बञ्चाक्षरि जनिञ्चॆ
पञ्च वर्णमुलनु प्रबलॆ जगमु
पञ्चमुखुनि मीरु प्रस्तुति चेयुण्डी
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ २३ ॥

नेयि वॆन्न काचि नीडने युञ्चिन
बेरि गट्टिपडुनु पॆरुगुरीति
पोरिपोरि मदिनि पोनीक पट्टुमु
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ २४ ॥

मण्टिकुण्डवण्टि माय शरीरम्बु
चच्चुनॆन्नडैन, चावदात्म
घटमुलॆन्नियैन गगनमॊक्कटेगदा,
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ २५ ॥

मण्ट लोहमन्दु म्राकुल शिललन्दु
पटमुलन्दु गोडप्रतिमलन्दु
तन्नुदॆलियु कॊऱकुदगुलदा परमात्म
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ २६ ॥

निमिषमैननु मदि निल्चि निर्मलमुग
लिङ्ग जीवावेशुलनु गाञ्चि भङ्गपडक
पूज मदियन्दु जेरुट पूर्णपदवि
परमु गोरिन निदिचेय बागु वेम! ॥ २७ ॥

धूमादुल नावृतमै
व्योमम्बुनकॆगनि कलियु नुपमुलु तनलो
श्रीमिञ्चु शिवुनि जेरुनु
गामादुल गलियडतडु घनमुग वेम! ॥ २८ ॥

पगलुडुग नासलुडुगुनु
वगपुडुगं गोर्कॆलुडुगु वडि जन्मम्बुल्
तगुलुडुगु भोगमुडिगिन
त्रिगुणम्बुनु नडुग मुक्ति तॆरुवगु वेम! ॥ २९ ॥

पाल नीटि कलत परमहंस मॆऱुगुनु
नीरु पालु नॆट्लु नेर्चुनॆमलि
लज्ञुडैन हीनुडल शिवु नॆऱुगुना?
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ ३0 ॥

पुट्टु पुट्टलेदे पुडमिनि जनुलॆल्ल
पुट्टि गिट्टलेदॆ पूर्वुलॆवरु
पुट्टि गिट्टुटॆल्ल वट्टि भ्रान्तुलु सुमी,
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ ३१ ॥

परुल वित्तमन्दु भ्रान्ति वासिनयट्टि
पुरुषुडवनिलोन पुण्यमूर्ति
परुल वित्तमरय पापसञ्चितमगु
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ ३२ ॥

परधनम्बुलकुनु प्राणमुलिच्चुनु
सत्यमन्तलेक जारडगुनु
द्विजुलमञ्चु निन्त्रुतेजमिञ्चुकलेदु
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ ३३ ॥

नोरु पलकवच्चु नुडि व्रायगरादु
व्रातकन्न साक्षि वलवदन्न
परगलेनि व्रात भङ्ग पाटुन्दॆच्चु
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ ३४ ॥

निजमाकल्ल रॆण्डु नीलकण्ठुडॆऱुङ्गु
निजमुलाडकुन्न नीतिदप्पु
निजमुलाडुनपुडु नी रूपमनवच्चु
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ ३५ ॥

दशगलारिनॆल्ल दम बन्धुवु लटण्ड्रु
दशयलेमि नॆन्त्रु तक्कुवगनु
दशयन गम धन दशमॊक्कटे दश
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ ३६ ॥

तामसिञ्चि चेयदग दॆट्टि कार्यम्बु
वेगिरिम्प नदियु विषमगुनु
पच्चिकायदॆच्चि पडवेय फलमौने
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ ३७ ॥

तल्लिबिड्डलकुनु तगवु पुट्टिञ्चॆडि
धनमु सुखमु गूर्चुननि गडिन्त्रु
कानि यॆल्लयॆडल घन दुःखन्​दमदि
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ ३८ ॥

तल्लिदण्ड्रुलॆन्नदगु तॊलि गुरुवुलु
पार्वतीभवु लिलबरमगुरुलु
कूलिवाण्ड्र जगति गुरुलन द्रोहमु
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ ३९ ॥

तामसिञ्चि चेयदग दॆट्टि कार्यम्बु
वेगिरिम्प नदियु विषमगुनु
पच्चिकायदॆच्चि पडवेय फलमौने
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ ४0 ॥

पुट्टु पुट्टलेदे पुडमिनि जनुलॆल्ल
पुट्टि गिट्टलेदॆ पूर्वुलॆवरु
पुट्टि गिट्टुटॆल्ल वट्टि भ्रान्तुलु सुमी,
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ ४१ ॥

पॆट्टिपोयलेनि वट्टि देबॆलु भूमि
बुट्टिरेमि वारु गिट्टरेमि
पुट्टलोनि चॆदलु पुट्टदा गिट्टदा!
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ ४२ ॥

लोकमन्दुबुट्टि लोकमन्दॆ पॆरिगि
लोक विभवमोर्वलेक जनुडु
लोकमन्दु जनिकि लोबडि चॆडिपोवुनु
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ ४३ ॥

मदि गलिगिन पूज मदनारि मॆच्चुनु
मनसु निल्सिनन्त महितुडगुनु
मनसुलेनि पूज मट्टि समानमु
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ ४४ ॥

तामुनु जनुलेमनु कॊन
बूनुदुरो दानि सरसि पॊन्दिन जडनी,
रानि पधम्बुन नडिचिन
दाननॆ धर्मात्मुडण्ड्रु तन्निट वेम! ॥ ४५ ॥

मदमु वलन गलुगु माटलु मऱिपल्कि
म्रुच्चु सद्दुलनॊगि मोसपुच्चि
कासुराबॆनगॆडु कष्ठुण्डु गुरुडौने?
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ ४६ ॥

मनसे माया मृगमौ
मननेमिटि पैकिगानी मणिपोनीका
मनसुन मनसुनु जम्पिन
मनन्दे मुक्तिगलदु महिलो वेम! ॥ ४७ ॥

मन्त्रमॊकटि चॆप्पि मऱि देवतार्चन
चेसि तमकुगरुणचॆन्दिनदनि
वेदपठन चेसि वॆर्रुलै पोदुरु,
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ ४८ ॥

मठमुलोनियोगि मायलन्नियुगोसि
घटमुलोन नुन्न घनुनिदॆलिसि
माट माटकुगुरु मरुवक तॆलुपुरा,
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ ४९ ॥

तिरिगि वच्चुवेल मरलिपोयॆडि वेल
वॆण्ट देरु धनमु वण्टबोरु
तॊनॆटकु जनुनॊ धनमॆन्दु बोवुनो
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ ५0 ॥

आशयनॆडु दानि गोसिवेयगालेक
मॊहबुद्दि वलन मुनुगुवारु
काशिवासुलैन गनबोरु मोक्षमु
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ ५१ ॥

चित्तमनेडि वेरे शिथिलमैनप्पुडे
प्रकृति यनॆडि चॆट्टु पडुनु पिदप
गोर्कुलनॆडि पॆद्दकॊम्मलॆण्डुनु गदा
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ ५२ ॥

भोगम्बुल काशिम्पक
रागद्वेषम्बु रङ्गुडदमलो
वेगमॆ मोक्ष पदम्बुनु
रागनु नातण्डु योगिरायुडु वेम! ॥ ५३ ॥

चनुवारॆल्लनु जनुलं
जनिपोयिन वारि पुण्य सत्कथलॆल्लन्
विनवलॆ गनवलॆ मनवलॆ
ननि मषुलकु दॆलुसगूड दन्त्यमु वेम! ॥ ५४ ॥

आशयनॆडि त्राल्ल नखिल जनम्बुलु
कट्टुपडुचु मुक्तिगानरैरि
ज्ञानखड्गमुननु खण्डिम्प रादॊको
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ ५५ ॥

अतिथि राक चूचि यदलिञ्चि पडवैचि
कठिन चितुलगुचु गानलेरु
कर्ममुनकु मुन्दु धर्ममु गानरो
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ ५६ ॥

तनु वलचिन दावलचुनु तनु
वलवक युन्ननॆनडु तावलव डिलन्
तनदु पटाटोपम्बुलु तन
मायलु पनिकिरावु धरलोन वेम! ॥ ५७ ॥

माटलाड वच्चु मनसु निल्वगलेदु
तॆलुपवच्चु दन्नु तॆलियलेदु
सुरियबट्टवच्चु शूरुडु कालेडु
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ ५८ ॥

तनकेनाडु सुभिक्षमु
तनकेनाडुनु भगम्बु तनरवयुनं
चुनु तन दशकै यॆल्लॆड
मनसन्दुन जिवुकुचुण्डु महिलो वेम! ॥ ५९ ॥

ऎण्डिन मा नॊकटडविनि
मण्डिन नन्दग्नि पुट्टि यूड्चुनु चॆट्लन्
दण्डिगल वंशमॆल्लनु
चण्डालुण्डॊकडु पुट्टि चदुपुनु वेम! ॥ ६0 ॥

निजमु तॆलिसियुन्न सुजिनुडानिजमुनॆ
पलुकवलयुगानि परुलकॊरकु
चावकूड दिङ्क नोपदव्यं पल्क
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ ६१ ॥

तामुनु जनुलेमनु कॊन
बूनुदुरो दानि सरसि पॊन्दिन जडनी,
रानि पधम्बुन नडिचिन
दाननॆ धर्मात्मुडण्ड्रु तन्निट वेम! ॥ ६२ ॥

विनियु विनकयुण्डु कनियु गनक युण्डु
तलचि तलपकुण्डु तानु योगि
मनुजवरुलचेत मणिपूज गॊनुचुण्डु
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ ६३ ॥

वॆन्न चेतबट्टि विवरम्बु तॆलियक
घृतमु कोरुनट्टि यतनि भण्डि
तानु दैवमय्यु दैवम्बु दलचुनु
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ ६४ ॥

रूपुवङ्क पेरु रूढिगा निलुचुनु
पेरुवङ्क क्रियलु पॆनगुचुण्डु
नाशमौनु तुदकु नामरूप क्रियल्
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ ६५ ॥

लोभमोहमुलनु प्राभवमुलु तप्पु
तलचिन पनुलॆल्ल तप्पि चनुनु
तानॊकटि दलचिन दैवमॊण्डगुचुण्डु
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ ६६ ॥

शान्तमे जनुलनु जयमुनॊन्दिञ्चुनु
शान्तमुननॆ गुरुवु जाड तॆलियु
शान्त भाव महिम जर्चिम्पलेमया
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ ६७ ॥

वेषधारिनॆपुडु विश्वसिम्पगरादु
वेषदोषमुलॊक विधयॆ यगुनु
रट्टुकादॆ मुनुपु रावणु वेषम्बु
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ ६८ ॥

इङ्गलम्बु तोड निल सल्पुतोडनु
परुनि यालितोड पतितुतोड
सरसमाडुटॆल्ल चावुकु मूलमु
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ ६९ ॥

ऐकमत्यमॊक्क टावश्यकं बॆप्डु
दानि बलिमि नॆन्तयैन गूडु
गड्डि वॆण्ट बॆट्टि कट्टरा येनुङ्गु
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ ७0 ॥

तामसिञ्चि चेयदगदॆट्टि कार्यम्बु
वेगिरिम्प नदियु विषमगुनु
पच्चिकायदॆच्चि पडवेय फलमौना?
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ ७१ ॥

तल्ली बिड्डलकु तगवु पुट्टिञ्चॆडि
धनमु सुखमु गूर्चुननि गडिन्त्रु
कानीयॆल्ल यॆडल घन दुःखकरमदि
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ ७२ ॥

दॊङ्गमाटलाड दॊरुकुनॆ मोक्षमु
चेतगानि पलुकु चेटुदॆच्चु
गुरुवुपद्दु कादु गुनहैन्य मदियगु
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ ७३ ॥

नलुगुरु कल चोटनु दा
दल चूपुचु मॆलगुचुण्डि धन्यात गनगा
दलचॆडि यातडु निच्चलु
गल माटले पलुकुचुण्डगा दगु वेम! ॥ ७४ ॥

नडुचुनिच्चु नतनि बत्तॆमिच्चिन वानि
कडुपु चल्लजेसि घनत विडुचु
नडुप नेर नेर नतडु नालि मुच्चेगदा
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ ७५ ॥

पदुगुराडुमाट पाडियै धरजॆल्लु
नॊक्कडाडुमाट यॆक्कदॆन्दु
वूरकुण्डु वानि कूरॆल्ल नोपदु
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ ७६ ॥

पतक मन्दु नॊप्पु पलु रत्नमुल पॆम्पु
बङ्गरन्दु कूर्प बरुवु गनुनु
गानि यितर लोहमैन हीनमु गादॆ
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ ७७ ॥

जन्नमुलनु मरियु जन्नियल ननेक
मुल नॊनर्चियुन्न फलमुकान
राक युण्डु नीति लेकुन्न मात्रान
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ ७८ ॥

तप्पु पलुकु पलिकि तातोट चेसिन
कूडियुन लक्ष्मी क्रुङ्गिपोवु
नोटिकुण्ड नील्लु नॊनरगा निलुचुना
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ ७९ ॥

भूमि नादि यनिन भूमि फक्कुन नव्वु
दान हीनुँ जूचि धनमु नव्वु
कदन भीतुँ जूचि कालुँडु नव्वुनु
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ ८0 ॥

नीति ज्योतिलेक निर्मलम्बगु नेदि
ऎट्लु कलगुबर मदॆन्तयैन
धनमु गलिगियुन्न दैवम्बु गलुगदु
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ ८१ ॥

पगयुडगु गोपमुडिगिन
पगयुडुगन्​ कोर्कॆलुडुगु बरजन्मम्पुं
दगुलुडुगु भेदमुडिगिन
त्रिगुणमु लुडुगङ्ग मुक्ति स्थिरमगु वेम! ॥ ८२ ॥

पप्पुलेनि कूडु परुलकोसह्यमे
युप्पुलेनि वाडॆ यधिक बलुडु
मुप्पुलेनि वाडु मॊदटि सुज्जानिरा
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ ८३ ॥

निक्कमैन मञ्चि नीलमॊक्कटि चालु
तलुकु बॆलुकु रालु तट्टॆडेल
चदुव पद्यमरय जालदा यॊक्कटि
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ ८४ ॥

परुल दत्तमॊप्पि पालनचेसिन
निल स्वदत्तमुनकु विनु मडियगु
नवनि परुल दत्त महपरिम्पग रादु
विश्वधाबिराम विनुर वेम! ॥ ८५ ॥

निजमुलाडु वानि निन्दिञ्चु जगमॆल्ल
निजमु बल्करादु नीचुलकड
निज महात्मुगूड निजमाडवलयुरा
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ ८६ ॥

पदुगुराडुमाट पाडियै धरजॆल्लु
नॊक्कडाडुमाट यॆक्कदॆन्दु
वूरकुण्डु वानि कूरॆल्ल नोपदु
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ ८७ ॥

परुल मेलु चूचि पलुगाकि वलॆ नॆप्पु
वट्टि माटलाडु वाडधमुडु
अट्टि वानि ब्रतुकु टदियेल मण्टिका
विश्वधाबिराम विनुर वेम! ॥ ८८ ॥

भयमन्तयु देहमुनकॆ
भय मुडिगिन निश्चयम्बु परमात्मुनके
लयमन्तयु जीवुनके
जयमात्मकु ननुचु जगतिँ जाटुर वेम! ॥ ८९ ॥

भूमि नादि यनिन भूमि फक्कुन नव्वु
दान हीनुँ जूचि धनमु नव्वु
कदन भीतुँ जूचि कालुँडु नव्वुनु
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ ९0 ॥

माटजॆप्प विननि मनुजुडु मूर्खुडु
माट विन्न नरुडु मानुडगुनु
माट विनग जॆप्प मानुट कूडदु
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ ९१ ॥

मनसु तॆलिसि यॊकनि माटकु ब्रतिचॆप्प
सन्तसिञ्चु नतडु चालमॆच्चु
मनसु दॆलियकुन्नडनियुचु ननुनेदो
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ ९२ ॥

आलिमाटलु विनि अन्नदम्मुल रोसि
वेरेपोवुवाडु वॆर्रिवाडु
कुक्कतोक पट्टि गोदारीदिना?
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ ९३ ॥

ज्ञानियैनवानि मानक पूजिञ्चु
मनुजुडॆप्पुडु परमुननु मुदम्बु
सुखमुनन्दुचुण्डुसूरुलु मॆच्चग
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ ९४ ॥

हानि कलुगबोदु हरिमदि नॆञ्चॆडु
वानि कब्दु परमु वसुधयन्दु
पूनि निष्ठमीरि पॊदलक युण्डुमु
विश्वराभिराम विनुर वेम! ॥ ९५ ॥

अल्पुडॆप्पुडु पलुकु नाडम्बरमुगानु
सज्जनुण्डु पलुकु चल्लगानु
कञ्चु मोगिनट्लु कनकम्बु मोगुना
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ ९६ ॥

न्यायशास्त्र मरय नन्यायमुन दिञ्चु
धर्मशास्त्र मॊसगु रुग्मतम्बु
ज्योतिषमु जनमुल नीतुल दप्पिञ्चु
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ ९७ ॥

देवुडनग वेरे देशमुन्दुन्नाडॆ
देहितोड नॆपुडु देहमन्दॆ
वाहनमुलनॆक्कि पडिदोलुचुन्नाडु
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ ९८ ॥

भूमिलोन बुट्टु भूसारमॆल्लनु
तनुवुलोन बुट्टु तत्त्वमॆल्ल
श्रमलोन बुट्टु सर्वम्बु तानौनु
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ ९९ ॥

व्रातकण्टॆ हॆच्चु परमीदु दैवम्बु
चेतकण्टॆ हॆच्चु व्रात लेदु
व्रात कजुडु कर्त चेतकु दाकर्त
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ १00 ॥

चिप्पलोनबड्ड चिनुकु मुत्यम्बय्यॆ
नीट बड्ड चिनुकु नीट गलिसॆ
ब्राप्ति गलुगु चोट फलमेल तप्पुरा
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ १0१ ॥

इण्टि इण्टिलोननीश्वरुडुण्डग
नण्टि चूडलेक यडवुलन्दु
नुण्ट मेटञ्चुनुन्दुरा जोगुलै
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ १0२ ॥

चित्तशुद्धि कलिगिचेसिन पुण्यम्बु
कॊञ्चॆमैन नदियु कॊदवगादु
वित्तनम्बु मर्रि वृक्षम्बुनकु नॆन्तो
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ १0३ ॥

अग्निबाना मेसि यम्बुधि निङ्किञ्चु
रामुडवलि केग राक, निलिचि
चॆट्लु गिरुलु तॆच्चि सेतुवु गट्टडा
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ १0४ ॥

ऐदु वेल्लु बलिमि हस्तम्बु पनिचेयु
नं दॊकण्डु विड्ड पॊन्दु चॆडुनु
स्वीयुडॊकडु विडिन जॆडुकदा पनिबल्मि
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ १0५ ॥

आत्मबुद्धि वलन नखिलम्ब तानय्यॆ
जीवबुद्धि वलन जीवुडय्यॆ
मोहबुद्धिलयमु मुन्दर गनुगॊनु
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ १0६ ॥

गुणमुलोगलवानि कुलमॆञ्चगानेल
गुणमु कलिगॆनेनि कोटिसेयु
गणमुलेक युन्न गुड्डिगव्वयुलेदु
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ १0७ ॥

तल्लितण्ड्रुलन्दु दयलेनि पुत्रुण्डु
पुट्टनेमि? वाडु गिट्टनेमि?
पुट्टलोनि चॆदलु पुट्टदा गिट्टदा
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ १0८ ॥

कोपमुन घनत कॊञ्चॆमैपोवुनु
कोपमुननु गुणमु कॊरतपडुनु
कोपमणचनेनि कोरिकलीडेरु
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ १0९ ॥

ऎलुगु तोलु तॆच्चि एडादि युतिकिना
नलुपु नलुपेकानि तॆलुपुकादु
कॊय्यबॊम्म तॆच्चि कॊट्टिते गुणियोनॆ
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ ११0 ॥

अल्पबुद्धिवानिकधिकारमिच्चिन
दॊड्डवारिनॆल्ल तॊलगगॊट्टु
चॆप्पुदिनॆडु कुक्क चॆरकु तीपॆरुगुना
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ १११ ॥

पट्टुपट्टरादु पट्टिविडुवरादु
पट्टॆनेनि बिगिय पट्टवलयु
पट्टुविडुटकन्ना पडिचच्चुटेमेलु
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ ११२ ॥

तुम्मचॆट्टु मुण्ड्ल तोडनेपुट्टुनु
वित्तुलॊननुण्डु वॆडलुनट्लु
मूर्खुनकुनु बुद्धि मुन्दुगा बुट्टनु
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ ११३ ॥

कपटि वेषमूनि कडगण्ड्लु पडनेल
विपिन भूमि तिरिगि विसुगनेल
युपमुतोने मुक्ति उन्नदि चूडरा
विश्वदाभि राम विनुर वेम ॥ ११४ ॥

अनुवुगानि चोट अधिकुलमनरादु
कॊञ्चॆमुन्दुटॆल्ल कॊदुवकादु
कॊण्ड यद्दमन्दु कॊञ्चमै उण्डदा
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ ११५ ॥

मनसुलोनुन्न मर्ममन्त ऎरिगि
स्थिरमु चेसि आत्म तेटपरिचि
घटमु निल्पवलयु, घनतलिङ्केटिकि
विश्वदाभि रामविनुर वेम! ॥ ११६ ॥

कदलनीयकुण्ड गट्टिगा लिङ्गम्बु
कट्टिवेयनेमि घनत कलुगु
भावमन्दु शिवुनि भाविञ्चि कानरा
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ ११७ ॥

मेक जङ्कबॆट्टिमॆलगुचु मन्दलो
ब्रमनि तिरुगु गॊल्ल पगिदिगानु
देवुनॆरुगक परदवेतल दलचु
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ ११८ ॥

तन कुल गोत्रमु लाकृति
तन सम्पद कलिमि बलिमि तनकेलनया?
तन वॆण्टरावु निजमिदि
तन सत्यमे तोडुवच्चु तनतो
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ ११९ ॥

कलिमिगल्गनेमि करुण लेकुण्डिन
कलिमि तगुनॆ दुष्टकर्मुलकुनु
तेनॆगूर्पनीग तॆरुवुन बोवदा
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ १२0 ॥

ऎण्डिन मानॊकटडविनि
मण्डिन नन्दग्नि पुट्टि यूड्चुनु चॆट्लन्
दण्डिगल वंशमॆल्लनु
चण्डालुण्डॊकडु पुट्टि चदुवुनु वेम! ॥ १२१ ॥

कनुलु पोवुवाडु काल्लु पोयिनवाडु
उभयुलरयुगूडि युण्डिनट्लु
पेद पेद गूडि पॆनगॊनि युण्डुनु
विश्वदाभिरामा विनुर वेम! ॥ १२२ ॥

माटलाडु गल्गु मर्ममुलॆरिगिन
पिन्नपॆद्दतनमु लॆन्नवलदु
पिन्नचेति दिव्वॆ पॆद्दगा वॆलगदा?
विश्वधाभिराम विनुर वेम! ॥ १२३ ॥

कॊण्डमुच्चु पॆण्ड्लिकि कोति पेरण्टालु
मॊण्डि वानि हितुडु बण्डवाडु
दुण्डगीडुनकुनु कॊण्डॆडु दलवायि
विश्वदाभिरामा विनुर वेम! ॥ १२४ ॥

झुषमु नीरु वॆडल जच्चुटे सिद्धमु
नीटनुण्डनेनि निक्किपडुनु
अण्डतॊलुगु नॆडल नन्दर पनि अट्ले
विश्वदाभि राम विनुर वेम! ॥ १२५ ॥

तल्लियेड्व विनक तनयालु वगचिन
जालिपडॆडु वाडु जडुडु सुम्मि
तारतम्य मॆरुगनेरनि पशुवदि
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ १२६ ॥

परुलमेलु चूसि पलुकाकि वलॆ
वट्टिमाटलाडु वाडु अधमुडु
अट्टिवानि बतुकुटदि एल मण्टिका?
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ १२७ ॥

गङ्गि गोवुपालु गरिटडैननु चालु
कडवॆडैननु नेमि खरमुपालु
भक्तिकल्गुकूडु पट्टॆडैननु चालु
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ १२८ ॥

चिक्कियुन्नवेल सिंहम्बुनैननु
बक्क कुक्कयैना बाधसेयु
बलिमिलेनि वेल पन्तमुलु चॆल्लवु
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ १२९ ॥

पनसतॊनलकन्न पञ्चदारलकन्न
जुण्टितेनॆकन्न जुन्नुकन्न
चॆऱुकु रसमुकन्न चॆलुल माटलॆ तीपि
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ १३0 ॥

निण्डुनदुलु पारु निलचि गम्भीरमै
वॆऱ्रिवागु पाऱु वेगबॊर्लि
अल्पुडाडुरीति नधिकुण्डु नाडुना
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ १३१ ॥

उप्पुलेनिकूर यॊप्पदु रुचुलकु
पप्पुलेनि तिण्डि फलमुलेदु
अप्पुलेनिवाडॆ यधिक सम्पन्नुडु
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ १३२ ॥

पसुल वन्नॆ वेरु पालॆल्ल ऒक्कटि
पुष्पजाति वेरु पूज ऒकटि
दर्शनम्बुलारु दैवम्बु ऒक्कटि
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ १३३ ॥

चम्पदगिन शतृवु तनचेत
चिक्कॆनेनि कीडु चेयरादु
पॊसग मेलु चेसि पॊम्मनुटे मेलु
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ १३४ ॥

आपदगल वेल अरसि बन्धुवु जूडु
भयमु वेल जूडु बण्टुतनमु
पेदवेल जूडु पॆण्ड्लामु गुणमु
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ १३५ ॥

उप्पु कप्पुरम्बु ऒक्क पोलिकनुण्डु
चूड चूड रुचुल जाड वेरु
पुरुषुलन्दु पुण्य पुरुषुलु वेरय
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ १३६ ॥

आत्म शुद्दि लेनि याचारमदियेल
भाण्डशुद्दि लेनि पाक मेल
चित्तशुद्दिलेनि शिवपूजलेलरा
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ १३७ ॥

यिनुमु विरगनेनि यिनुमूरु मुम्मारु
काचियॆतकवच्चु ग्रममु गानु
मनसु विरिगॆनेनि मरि चेर्चरादया
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ १३८ ॥

कुण्ड कुम्भमन्न कॊण्ड पर्वतमन्न
नुप्पु लवणमन्न नॊकटि कादॆ
भाष लिट्टॆ वेरु परतत्वमॊकटॆ
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ १३९ ॥

अनग ननग राग मतिश यिल्लुचुनुण्डु
दिनग दिनग वेमु तिय्यनुण्डु
साधनमुन पनुलु समकूरु धरलोन
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ १४0 ॥

चॆप्पुलोनि रायि चॆविलोनि जोरीग
कण्टिलोनि नलुसु कालि मुल्लु
इण्टिलोनि पोरु निन्तिन्त गादया
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ १४१ ॥

तप्पु लॆन्नुवारु तण्डोप तण्डम्बु
लुर्वि जनुलकॆल्ल नुण्डु तप्पु
तप्पु लॆन्नुवारु तम तप्पुलॆरुगरु
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ १४२ ॥

मिरप गिञ्ज चूड मीद नल्लगनुण्डु
कॊरिकि जूडलोन जुरुकुमनुनु
सज्जनु लगु वारि सार मिट्लुण्डु
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ १४३ ॥

मेडिपण्डु चूड मेलिमै युण्डुनु
पॊट्टविच्चि चूड पुरुगुलुण्डु
पिरिकिवानि मदिनि बिङ्कमीलागुरा
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ १४४ ॥

वेरु पुरुगु चेरि वृक्षम्बु जॆरुचुनु
चीडपुरुगु चेरि चॆट्टु जॆरचु
कुत्सितुण्डु चेरि गुणवन्तु जॆरचुरा
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ १४५ ॥

वेषभाष लॆरिगि काषयवस्त्रमुल्
गट्टगानॆ मुक्ति गलुगबोदु
तललु बोडुलृन तलपुलू बोडूला
विश्वदाभिराम विनुर वेम! ॥ १४६ ॥

వేమన శతకం

తలపులోన గలుగు దా దైవమే ప్రొద్దు
తలచి చూడనతకు తత్వమగును
వూఱకుండ నేర్వునుత్తమ యోగిరా
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 1 ॥

తన విరక్తి యనెడి దాసి చేతను జిక్కి
మిగిలి వెడలవేక మిణుకుచున్న
నరుడి కేడముక్తి వరలెడి చెప్పడీ
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 2 ॥

తనదు మనసుచేత దర్కించి జ్యోతిష
మెంత చేసే ననుచు నెంచి చూచు,
తన యదృష్టమంత దైవ మెఱుంగడా?
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 3 ॥

టీక వ్రాసినట్లేనేకులు పెద్దలు
లోకమందు జెప్పి మంచు
కాకులట్టి జనుల కానరీ మర్మము
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 4 ॥

జ్ఞానమెన్న గురువు జ్ఞానహైన్యము బుద్ధి
రెంటినందు రిమ్మరేచునపుడు
రిమ్మ తెలిపెనేని రెండొక రూపురా
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 5 ॥

జాణలమని యంద్రు చపలాత్ములగువారు
తెలివిలేక తమ్ముతెలియలేరు
కష్టమైన యడవి గాసీలుచున్నారు
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 6 ॥

జనన మరణములన స్వప్న సుషుప్తులు
జగములందు నెండ జగములుండు
నరుడు జగమునంట నడుబాటు కాదొకో
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 7 ॥

ఛాయననొసగుచెట్లు సాధువు బోధట్టు
లడగి దరినిజేరి పడయవచ్చు
నట్టునిట్టు దాటనది పోవునిది రామ
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 8 ॥

నరుడెయైన లేక నారాయణుండైన
తత్త్వబద్ధుడైన దరణి నరయ
మరణమున్నదనుచు మదిని నమ్మగవలె
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 9 ॥

ద్వారంబంధమునకు దలుపులు గడియలు
వలెనె నోటికొప్పుగల నియతులు
ధర్మమెరిగి పలుక ధన్యుండౌ భువిలోన
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 10 ॥

బ్రహ్మఘటము మేను ప్రాణంబు తగగాలి
మిత్రచంద్ర శిఖులు నేత్రచయము
మఱియు బ్రహ్మమనగ మహిమీద లేదయా
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 11 ॥

యోగిననుచు గొంత యోగముగూర్చక
జగమునెల్లబట్ట చంపి తినుచు
ధనము కొఱకు వాడు తగవాడుచుండిన
యోగికాడు వాడె యోగు వేమ! ॥ 12 ॥

అర్ధ యంకణమున కాధారమైనట్టి
యొంటిమేడ గుంజు నొనరనిల్పె
నింటికొక మగండె యిల్లాండ్రునేద్గురు
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 13 ॥

అన్నదానమునకు నధిక సంపదగల్గి
యమరలోక పూజ్యుడగును మీఱు
అన్నమగును బ్రహ్మమది కనలేరయా
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 14 ॥

బొంది యెవరి సొమ్ము పోషింపబలుమారు
ప్రాణ మెవరి సొమ్ము భక్తిసేయ,
ధనమదెవరిసొమ్ము ధర్మమె తన సొమ్ము
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 15 ॥

పండువలన బుట్టె బరగ ప్రపంచము
పండువలన బుట్టె పరము నిహము
పండు మేలెఱింగె బ్రహ్లాదుడిలలోన
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 16 ॥

తపమువేల? యరయ ధాత్రిజనులకెల్ల
నొనర శివుని జూడ నుపమ గలదు
మనసు చదరనీక మహిలోన జూడరా
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 17 ॥

తనగుణము తనకు నుండగ
నెనయంగా నోరుని గుణము నెంచును మదిలో
దన గుణము తెలియ కన్యుని
బనిగొని దూషించువాడు వ్యర్థుడు వేమ! ॥ 18 ॥

జాలినొందరాదు జవదాటి కనరాదు
అది మూలమైన ఆత్మమఱుగు
పోరిచేరి పొంది పూర్ణము నందురా
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 19 ॥

జాతి, మతము విడిచి చని యోగికామేలు
జాతితో నెయున్న నీతివలదె
మతముబట్టి జాతి మానకుంట కొఱంత
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 20 ॥

నీవనినను నేననినను
భావమ్మున నెఱుకయొక్క పద్ధతియగునా
భావంబు దెలిసి మదిని
ర్భావముగా నిన్ను గనుట పరమగు వేమ! ॥ 21 ॥

నీళ్ల మునుగునేల? నిధుల మెట్టగనేల
మొనసి వేల్పులకును మ్రొక్కనేల
కపట కల్మషములు కడుపులో నుండగా
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 22 ॥

పంచ ముఖములందు బంచాక్షరి జనించె
పంచ వర్ణములను ప్రబలె జగము
పంచముఖుని మీరు ప్రస్తుతి చేయుండీ
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 23 ॥

నేయి వెన్న కాచి నీడనే యుంచిన
బేరి గట్టిపడును పెరుగురీతి
పోరిపోరి మదిని పోనీక పట్టుము
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 24 ॥

మంటికుండవంటి మాయ శరీరంబు
చచ్చునెన్నడైన, చావదాత్మ
ఘటములెన్నియైన గగనమొక్కటేగదా,
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 25 ॥

మంట లోహమందు మ్రాకుల శిలలందు
పటములందు గోడప్రతిమలందు
తన్నుదెలియు కొఱకుదగులదా పరమాత్మ
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 26 ॥

నిమిషమైనను మది నిల్చి నిర్మలముగ
లింగ జీవావేశులను గాంచి భంగపడక
పూజ మదియందు జేరుట పూర్ణపదవి
పరము గోరిన నిదిచేయ బాగు వేమ! ॥ 27 ॥

ధూమాదుల నావృతమై
వ్యోమంబునకెగని కలియు నుపములు తనలో
శ్రీమించు శివుని జేరును
గామాదుల గలియడతడు ఘనముగ వేమ! ॥ 28 ॥

పగలుడుగ నాసలుడుగును
వగపుడుగం గోర్కెలుడుగు వడి జన్మంబుల్
తగులుడుగు భోగముడిగిన
త్రిగుణంబును నడుగ ముక్తి తెరువగు వేమ! ॥ 29 ॥

పాల నీటి కలత పరమహంస మెఱుగును
నీరు పాలు నెట్లు నేర్చునెమలి
లజ్ఞుడైన హీనుడల శివు నెఱుగునా?
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 30 ॥

పుట్టు పుట్టలేదే పుడమిని జనులెల్ల
పుట్టి గిట్టలేదె పూర్వులెవరు
పుట్టి గిట్టుటెల్ల వట్టి భ్రాంతులు సుమీ,
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 31 ॥

పరుల విత్తమందు భ్రాంతి వాసినయట్టి
పురుషుడవనిలోన పుణ్యమూర్తి
పరుల విత్తమరయ పాపసంచితమగు
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 32 ॥

పరధనంబులకును ప్రాణములిచ్చును
సత్యమంతలేక జారడగును
ద్విజులమంచు నింత్రుతేజమించుకలేదు
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 33 ॥

నోరు పలకవచ్చు నుడి వ్రాయగరాదు
వ్రాతకన్న సాక్షి వలవదన్న
పరగలేని వ్రాత భంగ పాటుందెచ్చు
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 34 ॥

నిజమాకల్ల రెండు నీలకంఠుడెఱుంగు
నిజములాడకున్న నీతిదప్పు
నిజములాడునపుడు నీ రూపమనవచ్చు
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 35 ॥

దశగలారినెల్ల దమ బంధువు లటండ్రు
దశయలేమి నెంత్రు తక్కువగను
దశయన గమ ధన దశమొక్కటే దశ
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 36 ॥

తామసించి చేయదగ దెట్టి కార్యంబు
వేగిరింప నదియు విషమగును
పచ్చికాయదెచ్చి పడవేయ ఫలమౌనే
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 37 ॥

తల్లిబిడ్డలకును తగవు పుట్టించెడి
ధనము సుఖము గూర్చునని గడింత్రు
కాని యెల్లయెడల ఘన దుఃఖన్​దమది
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 38 ॥

తల్లిదండ్రులెన్నదగు తొలి గురువులు
పార్వతీభవు లిలబరమగురులు
కూలివాండ్ర జగతి గురులన ద్రోహము
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 39 ॥

తామసించి చేయదగ దెట్టి కార్యంబు
వేగిరింప నదియు విషమగును
పచ్చికాయదెచ్చి పడవేయ ఫలమౌనే
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 40 ॥

పుట్టు పుట్టలేదే పుడమిని జనులెల్ల
పుట్టి గిట్టలేదె పూర్వులెవరు
పుట్టి గిట్టుటెల్ల వట్టి భ్రాంతులు సుమీ,
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 41 ॥

పెట్టిపోయలేని వట్టి దేబెలు భూమి
బుట్టిరేమి వారు గిట్టరేమి
పుట్టలోని చెదలు పుట్టదా గిట్టదా!
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 42 ॥

లోకమందుబుట్టి లోకమందె పెరిగి
లోక విభవమోర్వలేక జనుడు
లోకమందు జనికి లోబడి చెడిపోవును
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 43 ॥

మది గలిగిన పూజ మదనారి మెచ్చును
మనసు నిల్సినంత మహితుడగును
మనసులేని పూజ మట్టి సమానము
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 44 ॥

తామును జనులేమను కొన
బూనుదురో దాని సరసి పొందిన జడనీ,
రాని పధంబున నడిచిన
దాననె ధర్మాత్ముడండ్రు తన్నిట వేమ! ॥ 45 ॥

మదము వలన గలుగు మాటలు మఱిపల్కి
మ్రుచ్చు సద్దులనొగి మోసపుచ్చి
కాసురాబెనగెడు కష్ఠుండు గురుడౌనే?
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 46 ॥

మనసే మాయా మృగమౌ
మననేమిటి పైకిగానీ మణిపోనీకా
మనసున మనసును జంపిన
మనందే ముక్తిగలదు మహిలో వేమ! ॥ 47 ॥

మంత్రమొకటి చెప్పి మఱి దేవతార్చన
చేసి తమకుగరుణచెందినదని
వేదపఠన చేసి వెర్రులై పోదురు,
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 48 ॥

మఠములోనియోగి మాయలన్నియుగోసి
ఘటములోన నున్న ఘనునిదెలిసి
మాట మాటకుగురు మరువక తెలుపురా,
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 49 ॥

తిరిగి వచ్చువేళ మరలిపోయెడి వేళ
వెంట దేరు ధనము వంటబోరు
తొనెటకు జనునొ ధనమెందు బోవునో
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 50 ॥

ఆశయనెడు దాని గోసివేయగాలేక
మొహబుద్ది వలన మునుగువారు
కాశివాసులైన గనబోరు మోక్షము
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 51 ॥

చిత్తమనేడి వేరే శిథిలమైనప్పుడే
ప్రకృతి యనెడి చెట్టు పడును పిదప
గోర్కులనెడి పెద్దకొమ్మలెండును గదా
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 52 ॥

భోగంబుల కాశింపక
రాగద్వేషంబు రంగుడదమలో
వేగమె మోక్ష పదంబును
రాగను నాతండు యోగిరాయుడు వేమ! ॥ 53 ॥

చనువారెల్లను జనులం
జనిపోయిన వారి పుణ్య సత్కథలెల్లన్
వినవలె గనవలె మనవలె
నని మషులకు దెలుసగూడ దంత్యము వేమ! ॥ 54 ॥

ఆశయనెడి త్రాళ్ళ నఖిల జనంబులు
కట్టుపడుచు ముక్తిగానరైరి
జ్ఞానఖడ్గమునను ఖండింప రాదొకో
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 55 ॥

అతిథి రాక చూచి యదలించి పడవైచి
కఠిన చితులగుచు గానలేరు
కర్మమునకు ముందు ధర్మము గానరో
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 56 ॥

తను వలచిన దావలచును తను
వలవక యున్ననెనడు తావలవ డిలన్
తనదు పటాటోపంబులు తన
మాయలు పనికిరావు ధరలోన వేమ! ॥ 57 ॥

మాటలాడ వచ్చు మనసు నిల్వగలేదు
తెలుపవచ్చు దన్ను తెలియలేదు
సురియబట్టవచ్చు శూరుడు కాలేడు
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 58 ॥

తనకేనాడు సుభిక్షము
తనకేనాడును భగంబు తనరవయునం
చును తన దశకై యెల్లెడ
మనసందున జివుకుచుండు మహిలో వేమ! ॥ 59 ॥

ఎండిన మా నొకటడవిని
మండిన నందగ్ని పుట్టి యూడ్చును చెట్లన్
దండిగల వంశమెల్లను
చండాలుండొకడు పుట్టి చదుపును వేమ! ॥ 60 ॥

నిజము తెలిసియున్న సుజినుడానిజమునె
పలుకవలయుగాని పరులకొరకు
చావకూడ దింక నోపదవ్యం పల్క
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 61 ॥

తామును జనులేమను కొన
బూనుదురో దాని సరసి పొందిన జడనీ,
రాని పధంబున నడిచిన
దాననె ధర్మాత్ముడండ్రు తన్నిట వేమ! ॥ 62 ॥

వినియు వినకయుండు కనియు గనక యుండు
తలచి తలపకుండు తాను యోగి
మనుజవరులచేత మణిపూజ గొనుచుండు
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 63 ॥

వెన్న చేతబట్టి వివరంబు తెలియక
ఘృతము కోరునట్టి యతని భండి
తాను దైవమయ్యు దైవంబు దలచును
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 64 ॥

రూపువంక పేరు రూఢిగా నిలుచును
పేరువంక క్రియలు పెనగుచుండు
నాశమౌను తుదకు నామరూప క్రియల్
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 65 ॥

లోభమోహములను ప్రాభవములు తప్పు
తలచిన పనులెల్ల తప్పి చనును
తానొకటి దలచిన దైవమొండగుచుండు
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 66 ॥

శాంతమే జనులను జయమునొందించును
శాంతముననె గురువు జాడ తెలియు
శాంత భావ మహిమ జర్చింపలేమయా
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 67 ॥

వేషధారినెపుడు విశ్వసింపగరాదు
వేషదోషములొక విధయె యగును
రట్టుకాదె మునుపు రావణు వేషంబు
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 68 ॥

ఇంగలంబు తోడ నిల సల్పుతోడను
పరుని యాలితోడ పతితుతోడ
సరసమాడుటెల్ల చావుకు మూలము
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 69 ॥

ఐకమత్యమొక్క టావశ్యకం బెప్డు
దాని బలిమి నెంతయైన గూడు
గడ్డి వెంట బెట్టి కట్టరా యేనుంగు
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 70 ॥

తామసించి చేయదగదెట్టి కార్యంబు
వేగిరింప నదియు విషమగును
పచ్చికాయదెచ్చి పడవేయ ఫలమౌనా?
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 71 ॥

తల్లీ బిడ్డలకు తగవు పుట్టించెడి
ధనము సుఖము గూర్చునని గడింత్రు
కానీయెల్ల యెడల ఘన దుఃఖకరమది
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 72 ॥

దొంగమాటలాడ దొరుకునె మోక్షము
చేతగాని పలుకు చేటుదెచ్చు
గురువుపద్దు కాదు గునహైన్య మదియగు
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 73 ॥

నలుగురు కల చోటను దా
దల చూపుచు మెలగుచుండి ధన్యాత గనగా
దలచెడి యాతడు నిచ్చలు
గల మాటలే పలుకుచుండగా దగు వేమ! ॥ 74 ॥

నడుచునిచ్చు నతని బత్తెమిచ్చిన వాని
కడుపు చల్లజేసి ఘనత విడుచు
నడుప నేర నేర నతడు నాలి ముచ్చేగదా
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 75 ॥

పదుగురాడుమాట పాడియై ధరజెల్లు
నొక్కడాడుమాట యెక్కదెందు
వూరకుండు వాని కూరెల్ల నోపదు
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 76 ॥

పతక మందు నొప్పు పలు రత్నముల పెంపు
బంగరందు కూర్ప బరువు గనును
గాని యితర లోహమైన హీనము గాదె
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 77 ॥

జన్నములను మరియు జన్నియల ననేక
ముల నొనర్చియున్న ఫలముకాన
రాక యుండు నీతి లేకున్న మాత్రాన
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 78 ॥

తప్పు పలుకు పలికి తాతోట చేసిన
కూడియున లక్ష్మీ క్రుంగిపోవు
నోటికుండ నీళ్ళు నొనరగా నిలుచునా
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 79 ॥

భూమి నాది యనిన భూమి ఫక్కున నవ్వు
దాన హీనుँ జూచి ధనము నవ్వు
కదన భీతుँ జూచి కాలుँడు నవ్వును
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 80 ॥

నీతి జ్యోతిలేక నిర్మలంబగు నేది
ఎట్లు కలగుబర మదెంతయైన
ధనము గలిగియున్న దైవంబు గలుగదు
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 81 ॥

పగయుడగు గోపముడిగిన
పగయుడుగన్​ కోర్కెలుడుగు బరజన్మంపుం
దగులుడుగు భేదముడిగిన
త్రిగుణము లుడుగంగ ముక్తి స్థిరమగు వేమ! ॥ 82 ॥

పప్పులేని కూడు పరులకోసహ్యమే
యుప్పులేని వాడె యధిక బలుడు
ముప్పులేని వాడు మొదటి సుజ్జానిరా
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 83 ॥

నిక్కమైన మంచి నీలమొక్కటి చాలు
తళుకు బెళుకు రాలు తట్టెడేల
చదువ పద్యమరయ జాలదా యొక్కటి
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 84 ॥

పరుల దత్తమొప్పి పాలనచేసిన
నిల స్వదత్తమునకు విను మడియగు
నవని పరుల దత్త మహపరింపగ రాదు
విశ్వధాబిరామ వినుర వేమ! ॥ 85 ॥

నిజములాడు వాని నిందించు జగమెల్ల
నిజము బల్కరాదు నీచులకడ
నిజ మహాత్ముగూడ నిజమాడవలయురా
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 86 ॥

పదుగురాడుమాట పాడియై ధరజెల్లు
నొక్కడాడుమాట యెక్కదెందు
వూరకుండు వాని కూరెల్ల నోపదు
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 87 ॥

పరుల మేలు చూచి పలుగాకి వలె నెప్పు
వట్టి మాటలాడు వాడధముడు
అట్టి వాని బ్రతుకు టదియేల మంటికా
విశ్వధాబిరామ వినుర వేమ! ॥ 88 ॥

భయమంతయు దేహమునకె
భయ ముడిగిన నిశ్చయంబు పరమాత్మునకే
లయమంతయు జీవునకే
జయమాత్మకు ననుచు జగతిँ జాటుర వేమ! ॥ 89 ॥

భూమి నాది యనిన భూమి ఫక్కున నవ్వు
దాన హీనుँ జూచి ధనము నవ్వు
కదన భీతుँ జూచి కాలుँడు నవ్వును
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 90 ॥

మాటజెప్ప వినని మనుజుడు మూర్ఖుడు
మాట విన్న నరుడు మానుడగును
మాట వినగ జెప్ప మానుట కూడదు
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 91 ॥

మనసు తెలిసి యొకని మాటకు బ్రతిచెప్ప
సంతసించు నతడు చాలమెచ్చు
మనసు దెలియకున్నడనియుచు ననునేదో
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 92 ॥

ఆలిమాటలు విని అన్నదమ్ముల రోసి
వేరేపోవువాడు వెర్రివాడు
కుక్కతోక పట్టి గోదారీదినా?
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 93 ॥

జ్ఞానియైనవాని మానక పూజించు
మనుజుడెప్పుడు పరమునను ముదంబు
సుఖమునందుచుండుసూరులు మెచ్చగ
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 94 ॥

హాని కలుగబోదు హరిమది నెంచెడు
వాని కబ్దు పరము వసుధయందు
పూని నిష్ఠమీరి పొదలక యుండుము
విశ్వరాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 95 ॥

అల్పుడెప్పుడు పలుకు నాడంబరముగాను
సజ్జనుండు పలుకు చల్లగాను
కంచు మోగినట్లు కనకంబు మోగునా
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 96 ॥

న్యాయశాస్త్ర మరయ నన్యాయమున దించు
ధర్మశాస్త్ర మొసగు రుగ్మతంబు
జ్యోతిషము జనముల నీతుల దప్పించు
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 97 ॥

దేవుడనగ వేరే దేశముందున్నాడె
దేహితోడ నెపుడు దేహమందె
వాహనములనెక్కి పడిదోలుచున్నాడు
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 98 ॥

భూమిలోన బుట్టు భూసారమెల్లను
తనువులోన బుట్టు తత్త్వమెల్ల
శ్రమలోన బుట్టు సర్వంబు తానౌను
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 99 ॥

వ్రాతకంటె హెచ్చు పరమీదు దైవంబు
చేతకంటె హెచ్చు వ్రాత లేదు
వ్రాత కజుడు కర్త చేతకు దాకర్త
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 100 ॥

చిప్పలోనబడ్డ చినుకు ముత్యంబయ్యె
నీట బడ్డ చినుకు నీట గలిసె
బ్రాప్తి గలుగు చోట ఫలమేల తప్పురా
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 101 ॥

ఇంటి ఇంటిలోననీశ్వరుడుండగ
నంటి చూడలేక యడవులందు
నుంట మేటంచునుందురా జోగులై
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 102 ॥

చిత్తశుద్ధి కలిగిచేసిన పుణ్యంబు
కొంచెమైన నదియు కొదవగాదు
విత్తనంబు మర్రి వృక్షంబునకు నెంతో
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 103 ॥

అగ్నిబానా మేసి యంబుధి నింకించు
రాముడవలి కేగ రాక, నిలిచి
చెట్లు గిరులు తెచ్చి సేతువు గట్టడా
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 104 ॥

ఐదు వేళ్లు బలిమి హస్తంబు పనిచేయు
నం దొకండు విడ్డ పొందు చెడును
స్వీయుడొకడు విడిన జెడుకదా పనిబల్మి
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 105 ॥

ఆత్మబుద్ధి వలన నఖిలంబ తానయ్యె
జీవబుద్ధి వలన జీవుడయ్యె
మోహబుద్ధిలయము ముందర గనుగొను
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 106 ॥

గుణములోగలవాని కులమెంచగానేల
గుణము కలిగెనేని కోటిసేయు
గణములేక యున్న గుడ్డిగవ్వయులేదు
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 107 ॥

తల్లితండ్రులందు దయలేని పుత్రుండు
పుట్టనేమి? వాడు గిట్టనేమి?
పుట్టలోని చెదలు పుట్టదా గిట్టదా
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 108 ॥

కోపమున ఘనత కొంచెమైపోవును
కోపమునను గుణము కొరతపడును
కోపమణచనేని కోరికలీడేరు
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 109 ॥

ఎలుగు తోలు తెచ్చి ఏడాది యుతికినా
నలుపు నలుపేకాని తెలుపుకాదు
కొయ్యబొమ్మ తెచ్చి కొట్టితే గుణియోనె
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 110 ॥

అల్పబుద్ధివానికధికారమిచ్చిన
దొడ్డవారినెల్ల తొలగగొట్టు
చెప్పుదినెడు కుక్క చెరకు తీపెరుగునా
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 111 ॥

పట్టుపట్టరాదు పట్టివిడువరాదు
పట్టెనేని బిగియ పట్టవలయు
పట్టువిడుటకన్నా పడిచచ్చుటేమేలు
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 112 ॥

తుమ్మచెట్టు ముండ్ల తోడనేపుట్టును
విత్తులొననుండు వెడలునట్లు
మూర్ఖునకును బుద్ధి ముందుగా బుట్టను
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 113 ॥

కపటి వేషమూని కడగండ్లు పడనేల
విపిన భూమి తిరిగి విసుగనేల
యుపముతోనే ముక్తి ఉన్నది చూడరా
విశ్వదాభి రామ వినుర వేమ ॥ 114 ॥

అనువుగాని చోట అధికులమనరాదు
కొంచెముందుటెల్ల కొదువకాదు
కొండ యద్దమందు కొంచమై ఉండదా
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 115 ॥

మనసులోనున్న మర్మమంత ఎరిగి
స్థిరము చేసి ఆత్మ తేటపరిచి
ఘటము నిల్పవలయు, ఘనతలింకేటికి
విశ్వదాభి రామవినుర వేమ! ॥ 116 ॥

కదలనీయకుండ గట్టిగా లింగంబు
కట్టివేయనేమి ఘనత కలుగు
భావమందు శివుని భావించి కానరా
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 117 ॥

మేక జంకబెట్టిమెలగుచు మందలో
బ్రమని తిరుగు గొల్ల పగిదిగాను
దేవునెరుగక పరదవేతల దలచు
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 118 ॥

తన కుల గోత్రము లాకృతి
తన సంపద కలిమి బలిమి తనకేలనయా?
తన వెంటరావు నిజమిది
తన సత్యమే తోడువచ్చు తనతో
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 119 ॥

కలిమిగల్గనేమి కరుణ లేకుండిన
కలిమి తగునె దుష్టకర్ములకును
తేనెగూర్పనీగ తెరువున బోవదా
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 120 ॥

ఎండిన మానొకటడవిని
మండిన నందగ్ని పుట్టి యూడ్చును చెట్లన్
దండిగల వంశమెల్లను
చండాలుండొకడు పుట్టి చదువును వేమ! ॥ 121 ॥

కనులు పోవువాడు కాళ్లు పోయినవాడు
ఉభయులరయుగూడి యుండినట్లు
పేద పేద గూడి పెనగొని యుండును
విశ్వదాభిరామా వినుర వేమ! ॥ 122 ॥

మాటలాడు గల్గు మర్మములెరిగిన
పిన్నపెద్దతనము లెన్నవలదు
పిన్నచేతి దివ్వె పెద్దగా వెలగదా?
విశ్వధాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 123 ॥

కొండముచ్చు పెండ్లికి కోతి పేరంటాలు
మొండి వాని హితుడు బండవాడు
దుండగీడునకును కొండెడు దళవాయి
విశ్వదాభిరామా వినుర వేమ! ॥ 124 ॥

ఝుషము నీరు వెడల జచ్చుటే సిద్ధము
నీటనుండనేని నిక్కిపడును
అండతొలుగు నెడల నందర పని అట్లే
విశ్వదాభి రామ వినుర వేమ! ॥ 125 ॥

తల్లియేడ్వ వినక తనయాలు వగచిన
జాలిపడెడు వాడు జడుడు సుమ్మి
తారతమ్య మెరుగనేరని పశువది
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 126 ॥

పరులమేలు చూసి పలుకాకి వలె
వట్టిమాటలాడు వాడు అధముడు
అట్టివాని బతుకుటది ఏల మంటికా?
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 127 ॥

గంగి గోవుపాలు గరిటడైనను చాలు
కడవెడైనను నేమి ఖరముపాలు
భక్తికల్గుకూడు పట్టెడైనను చాలు
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 128 ॥

చిక్కియున్నవేళ సింహంబునైనను
బక్క కుక్కయైనా బాధసేయు
బలిమిలేని వేళ పంతములు చెల్లవు
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 129 ॥

పనసతొనలకన్న పంచదారలకన్న
జుంటితేనెకన్న జున్నుకన్న
చెఱుకు రసముకన్న చెలుల మాటలె తీపి
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 130 ॥

నిండునదులు పారు నిలచి గంభీరమై
వెఱ్రివాగు పాఱు వేగబొర్లి
అల్పుడాడురీతి నధికుండు నాడునా
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 131 ॥

ఉప్పులేనికూర యొప్పదు రుచులకు
పప్పులేని తిండి ఫలములేదు
అప్పులేనివాడె యధిక సంపన్నుడు
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 132 ॥

పసుల వన్నె వేరు పాలెల్ల ఒక్కటి
పుష్పజాతి వేరు పూజ ఒకటి
దర్శనంబులారు దైవంబు ఒక్కటి
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 133 ॥

చంపదగిన శతృవు తనచేత
చిక్కెనేని కీడు చేయరాదు
పొసగ మేలు చేసి పొమ్మనుటే మేలు
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 134 ॥

ఆపదగల వేళ అరసి బంధువు జూడు
భయము వేళ జూడు బంటుతనము
పేదవేళ జూడు పెండ్లాము గుణము
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 135 ॥

ఉప్పు కప్పురంబు ఒక్క పోలికనుండు
చూడ చూడ రుచుల జాడ వేరు
పురుషులందు పుణ్య పురుషులు వేరయ
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 136 ॥

ఆత్మ శుద్ది లేని యాచారమదియేల
భాండశుద్ది లేని పాక మేల
చిత్తశుద్దిలేని శివపూజలేలరా
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 137 ॥

యినుము విరగనేని యినుమూరు ముమ్మారు
కాచియెతకవచ్చు గ్రమము గాను
మనసు విరిగెనేని మరి చేర్చరాదయా
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 138 ॥

కుండ కుంభమన్న కొండ పర్వతమన్న
నుప్పు లవణమన్న నొకటి కాదె
భాష లిట్టె వేరు పరతత్వమొకటె
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 139 ॥

అనగ ననగ రాగ మతిశ యిల్లుచునుండు
దినగ దినగ వేము తియ్యనుండు
సాధనమున పనులు సమకూరు ధరలోన
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 140 ॥

చెప్పులోని రాయి చెవిలోని జోరీగ
కంటిలోని నలుసు కాలి ముల్లు
ఇంటిలోని పోరు నింతింత గాదయా
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 141 ॥

తప్పు లెన్నువారు తండోప తండంబు
లుర్వి జనులకెల్ల నుండు తప్పు
తప్పు లెన్నువారు తమ తప్పులెరుగరు
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 142 ॥

మిరప గింజ చూడ మీద నల్లగనుండు
కొరికి జూడలోన జురుకుమనును
సజ్జను లగు వారి సార మిట్లుండు
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 143 ॥

మేడిపండు చూడ మేలిమై యుండును
పొట్టవిచ్చి చూడ పురుగులుండు
పిరికివాని మదిని బింకమీలాగురా
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 144 ॥

వేరు పురుగు చేరి వృక్షంబు జెరుచును
చీడపురుగు చేరి చెట్టు జెరచు
కుత్సితుండు చేరి గుణవంతు జెరచురా
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 145 ॥

వేషభాష లెరిగి కాషయవస్త్రముల్
గట్టగానె ముక్తి గలుగబోదు
తలలు బోడులృన తలపులూ బోడూలా
విశ్వదాభిరామ వినుర వేమ! ॥ 146 ॥

FAQs for Vemana Satakam

  1. वेमना सतकम क्या है?

    वेमना सतकम तेलुगु कवि वेमना द्वारा रचित सूक्तियों का एक संग्रह है, जिसमें नैतिकता, समाज और जीवन के गूढ़ विचार प्रस्तुत किए गए हैं।

  2. वेमना कौन थे?

    वेमना 17वीं शताब्दी के एक प्रसिद्ध तेलुगु कवि और दार्शनिक थे, जो अपनी सरल और प्रभावशाली कविताओं के लिए जाने जाते हैं।

  3. वेमना सतकम में कितनी कविताएँ हैं?

    वेमना सतकम में लगभग 700 से अधिक कविताएँ हैं, जो विविध विषयों को कवर करती हैं।

  4. वेमना सतकम का मुख्य उद्देश्य क्या है?

    इसका मुख्य उद्देश्य नैतिक शिक्षा देना, सामाजिक कुरीतियों पर प्रहार करना और आध्यात्मिक जागरूकता फैलाना है।

  5. वेमना सतकम की भाषा कैसी है?

    इसकी भाषा सरल, सहज और आम बोलचाल की तेलुगु में है, जो सभी वर्गों के लोगों को समझ में आती है।

  6. क्या वेमना सतकम का हिंदी में अनुवाद उपलब्ध है?

    हाँ, वेमना सतकम का हिंदी समेत कई भाषाओं में अनुवाद किया गया है।

  7. वेमना सतकम में कौन से मुख्य विषय शामिल हैं?

    इसमें धर्म, नैतिकता, प्रेम, ज्ञान, सामाजिक न्याय और मानव स्वभाव के विषय शामिल हैं।

  8. वेमना सतकम का साहित्यिक महत्व क्या है?

    यह तेलुगु साहित्य में एक मील का पत्थर है, जिसने लोक भाषा में गहन विचार प्रस्तुत करके साहित्य को समृद्ध किया है।

सुमती शतकम्
मन्त्र पुष्पम्
श्री काल हस्तीश्वर शतकम्(तॆलुगु)
नारायण सूक्तम्
नरसिंह शतकम्
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