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बुधवार, जनवरी 21, 2026

तोटकाष्टकम्

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तोटकाष्टकम् | Totakashtakam

तोटकाष्टकं(Totakashtakam)आदि शंकराचार्य के चार प्रमुख शिष्यों में से एक, तोटकाचार्य द्वारा रचित एक प्रसिद्ध स्तोत्र है। यह स्तोत्र आदि शंकराचार्य की स्तुति में लिखा गया है। तोटकाचार्य का मूल नाम ज्ञानघन था। वह अपने गुरु आदि शंकराचार्य के प्रति अत्यंत समर्पित और विनम्र थे।

तोटकाष्टकं का महत्व

तोटकाष्टकं(Totakashtakam) में गुरु की महिमा का वर्णन किया गया है। इसमें ज्ञान, भक्ति और विवेक के महत्व को दर्शाया गया है। इस स्तोत्र के माध्यम से शिष्य अपने गुरु को नमन करते हुए उनकी कृपा का आह्वान करता है। यह संस्कृत के सरल और लयबद्ध छंदों में लिखा गया है, जिसे गाना भी सरल है।

तोटकाष्टकं की रचना का एक प्रसिद्ध प्रसंग है। कहा जाता है कि तोटकाचार्य अपने गुरु की सेवा में इतने मग्न रहते थे कि उन्हें शास्त्रों और वेदों का अध्ययन करने का समय नहीं मिलता था। अन्य शिष्य इस बात को लेकर उनका उपहास करते थे। लेकिन गुरु कृपा के फलस्वरूप, तोटकाचार्य ने तत्काल विद्या प्राप्त कर ली और उसी समय उन्होंने तोटकाष्टकं की रचना की।

तोटकाष्टकं

विदिताखिल शास्त्र सुधा जलधे
महितोपनिषत्-कथितार्थ निधे ।
हृदये कलये विमलं चरणं
भव शङ्कर देशिक मे शरणम् ॥ १ ॥

करुणा वरुणालय पालय मां
भवसागर दुःख विदून हृदम् ।
रचयाखिल दर्शन तत्त्वविदं
भव शङ्कर देशिक मे शरणम् ॥ २ ॥

भवता जनता सुहिता भविता
निजबोध विचारण चारुमते ।
कलयेश्वर जीव विवेक विदं
भव शङ्कर देशिक मे शरणम् ॥ ३ ॥

भव ऎव भवानिति मॆ नितरां
समजायत चेतसि कौतुकिता ।
मम वारय मोह महाजलधिं
भव शङ्कर देशिक मे शरणम् ॥ ४ ॥

सुकृतेऽधिकृते बहुधा भवतो
भविता समदर्शन लालसता ।
अति दीनमिमं परिपालय मां
भव शङ्कर देशिक मे शरणम् ॥ ५ ॥

जगतीमवितुं कलिताकृतयो
विचरन्ति महामाह सच्छलतः ।
अहिमांशुरिवात्र विभासि गुरो
भव शङ्कर देशिक मे शरणम् ॥ ६ ॥

गुरुपुङ्गव पुङ्गवकेतन ते
समतामयतां न हि कोऽपि सुधीः ।
शरणागत वत्सल तत्त्वनिधे
भव शङ्कर देशिक मे शरणम् ॥ ७ ॥

विदिता न मया विशदैक कला
न च किञ्चन काञ्चनमस्ति गुरो ।
दृतमेव विधेहि कृपां सहजां
भव शङ्कर देशिक मे शरणम् ॥ ८ ॥

तोटकाष्टकं भारतीय वैदिक परंपरा में गुरु-शिष्य संबंधों का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत करता है। यह न केवल गुरु के प्रति भक्ति को प्रकट करता है, बल्कि आत्मज्ञान और आध्यात्मिकता की ओर प्रेरित भी करता है। तोटकाष्टकं का नियमित पाठ करने से शिष्य को आध्यात्मिक मार्ग में प्रगति मिलती है।

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