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Reading: श्री दुर्गा अथर्वशीर्षम्
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SanatanWeb.com > Blog > गीतकाव्य > सूक्तम् > श्री दुर्गा अथर्वशीर्षम्
सूक्तम्

श्री दुर्गा अथर्वशीर्षम्

Sanatani
Last updated: जनवरी 24, 2026 7:12 अपराह्न
Sanatani
Published: जनवरी 24, 2026
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श्री दुर्गा अथर्वशीर्षम्

श्री दुर्गा अथर्वशीर्षम् (Sri Durga Atharvasheersham) एक प्राचीन हिन्दू धर्मग्रंथ है जो देवी दुर्गा की महिमा और उनकी शक्ति का वर्णन करता है। यह ग्रंथ अथर्ववेद से जुड़ा हुआ है और इसमें दुर्गा देवी की स्तुति, उनके विभिन्न रूपों, और उनकी शक्तियों का विस्तार से वर्णन किया गया है। यह ग्रंथ देवी भक्तों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है और इसे पढ़ने या सुनने से भक्तों को दुर्गा देवी की कृपा प्राप्त होती है।

Contents
  • श्री दुर्गा अथर्वशीर्षम्
  • श्री दुर्गा अथर्वशीर्षम् Sri Durga Atharvasheersham
  • श्री दुर्गा अथर्वशीर्षम् का महत्व
  • श्री दुर्गा अथर्वशीर्षम् का पाठ करने के लाभ

श्री दुर्गा अथर्वशीर्षम् Sri Durga Atharvasheersham

ॐ सर्वे वै देवा देवीमुपतस्थुः कासि त्व-म्महादेवीति ॥ १ ॥

सा-ऽब्रवीदह-म्ब्रह्मस्वरूपिणी ।
मत्तः प्रकृतिपुरुषात्मक-ञ्जगत् ।
शून्य-ञ्चाशून्य-ञ्च ॥ २ ॥

अहमानन्दानानन्दौ ।
अहं-विँज्ञानाविज्ञाने ।
अह-म्ब्रह्माब्रह्मणि वेदितव्ये ।
अह-म्पञ्चभूतान्यपञ्चभूतानि ।
अहमखिल-ञ्जगत् ॥ ३ ॥

वेदो-ऽहमवेदो-ऽहम् ।
विद्या-ऽहमविद्या-ऽहम् ।
अजा-ऽहमनजा-ऽहम् ।
अधश्चोर्ध्व-ञ्च तिर्यक्चाहम् ॥ ४ ॥

अहं रुद्रेभिर्वसुभिश्चरामि ।
अहमादित्यैरुत विश्वदेवैः ।
अह-म्मित्रावरुणावुभौ बिभर्मि ।
अहमिन्द्राग्नी अहमश्विनावुभौ ॥ ५ ॥

अहं सोम-न्त्वष्टार-म्पूषण-म्भग-न्दधामि ।
अहं-विँष्णुमुरुक्रम-म्ब्रह्माणमुत प्रजापति-न्दधामि ॥ ६ ॥

अ॒ह-न्द॑धामि॒ द्रवि॑णं ह॒विष्म॑ते सुप्रा॒व्ये॒३ यज॑मानाय सुन्व॒ते ।
अ॒हं राष्ट्री॑ स॒ङ्गम॑नी॒ वसू॑ना-ञ्चिकि॒तुषी॑ प्रथ॒मा य॒ज्ञिया॑नाम् ।
अ॒हं सु॑वे पि॒तर॑मस्य मू॒र्धन्मम॒ योनि॑र॒प्स्वन्त-स्स॑मु॒द्रे ।
य एवं-वेँद । स देवीं सम्पदमाप्नोति ॥ ७ ॥

ते देवा अब्रुवन् –
नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सतत-न्नमः ।
नमः प्रकृत्यै भद्रायै नियताः प्रणता-स्स्म ताम् ॥ ८ ॥

ताम॒ग्निव॑र्णा॒-न्तप॑सा ज्वल॒न्तीं-वैँ॑रोच॒नी-ङ्क॑र्मफ॒लेषु॒ जुष्टा᳚म् ।
दु॒र्गा-न्दे॒वीं शर॑ण-म्प्रप॑द्यामहे-ऽसुरान्नाशयित्र्यै ते नमः ॥ ९ ॥

(ऋ.वे.८.१००.११)
दे॒वीं-वाँच॑मजनयन्त दे॒वास्तां-विँ॒श्वरू॑पाः प॒शवो॑ वदन्ति ।
सा नो॑ म॒न्द्रेष॒मूर्ज॒-न्दुहा॑ना धे॒नुर्वाग॒स्मानुप॒ सुष्टु॒तैतु॑ ॥ १० ॥

कालरात्री-म्ब्रह्मस्तुतां-वैँष्णवीं स्कन्दमातरम् ।
सरस्वतीमदिति-न्दक्षदुहितर-न्नमामः पावनां शिवाम् ॥ ११ ॥

महालक्ष्म्यै च विद्महे सर्वशक्त्यै च धीमहि ।
तन्नो देवी प्रचोदयात् ॥ १२ ॥

अदितिर्​ह्यजनिष्ट दक्ष या दुहिता तव ।
ता-न्देवा अन्वजायन्त भद्रा अमृतबन्धवः ॥ १३ ॥

कामो योनिः कमला वज्रपाणि-
र्गुहा हसा मातरिश्वाभ्रमिन्द्रः ।
पुनर्गुहा सकला मायया च
पुरूच्यैषा विश्वमातादिविद्योम् ॥ १४ ॥

एषा-ऽऽत्मशक्तिः ।
एषा विश्वमोहिनी ।
पाशाङ्कुशधनुर्बाणधरा ।
एषा श्रीमहाविद्या ।
य एवं-वेँद स शोक-न्तरति ॥ १५ ॥

नमस्ते अस्तु भगवति मातरस्मान्पाहि सर्वतः ॥ १६ ॥

सैषाष्टौ वसवः ।
सैषैकादश रुद्राः ।
सैषा द्वादशादित्याः ।
सैषा विश्वेदेवा-स्सोमपा असोमपाश्च ।
सैषा यातुधाना असुरा रक्षांसि पिशाचा यक्षा सिद्धाः ।
सैषा सत्त्वरजस्तमांसि ।
सैषा ब्रह्मविष्णुरुद्ररूपिणी ।
सैषा प्रजापतीन्द्रमनवः ।
सैषा ग्रहनक्षत्रज्योतींषि । कलाकाष्ठादिकालरूपिणी ।
तामह-म्प्रणौमि नित्यम् ।
पापापहारिणी-न्देवी-म्भुक्तिमुक्तिप्रदायिनीम् ।
अनन्तां-विँजयां शुद्धां शरण्यां शिवदां शिवाम् ॥ १७ ॥

वियदीकारसं​युँक्तं-वीँतिहोत्रसमन्वितम् ।
अर्धेन्दुलसित-न्देव्या बीजं सर्वार्थसाधकम् ॥ १८ ॥

एवमेकाक्षर-म्ब्रह्म यतय-श्शुद्धचेतसः ।
ध्यायन्ति परमानन्दमया ज्ञानाम्बुराशयः ॥ १९ ॥

वाङ्माया ब्रह्मसूस्तस्मा-थ्षष्ठं-वँक्त्रसमन्वितम् ।
सूर्यो-ऽवामश्रोत्रबिन्दुसं​युँक्तष्टात्तृतीयकः ।
नारायणेन सम्मिश्रो वायुश्चाधरयुक्ततः ।
विच्चे नवार्णको-ऽर्ण-स्स्यान्महदानन्ददायकः ॥ २० ॥

हृत्पुण्डरीकमध्यस्था-म्प्रातस्सूर्यसमप्रभाम् ।
पाशाङ्कुशधरां सौम्यां-वँरदाभयहस्तकाम् ।
त्रिनेत्रां रक्तवसना-म्भक्तकामदुघा-म्भजे ॥ २१ ॥

नमामि त्वा-म्महादेवी-म्महाभयविनाशिनीम् ।
महादुर्गप्रशमनी-म्महाकारुण्यरूपिणीम् ॥ २२ ॥

यस्या-स्स्वरूप-म्ब्रह्मादयो न जानन्ति तस्मादुच्यते अज्ञेया ।
यस्या अन्तो न लभ्यते तस्मादुच्यते अनन्ता ।
यस्या लक्ष्य-न्नोपलक्ष्यते तस्मादुच्यते अलक्ष्या ।
यस्या जनन-न्नोपलभ्यते तस्मादुच्यते अजा ।
एकैव सर्वत्र वर्तते तस्मादुच्यते एका ।
एकैव विश्वरूपिणी तस्मादुच्यते नैका ।
अत एवोच्यते अज्ञेयानन्तालक्ष्याजैका नैकेति ॥ २३ ॥

मन्त्राणा-म्मातृका देवी शब्दाना-ञ्ज्ञानरूपिणी ।
ज्ञानाना-ञ्चिन्मयातीता शून्यानां शून्यसाक्षिणी ।
यस्याः परतर-न्नास्ति सैषा दुर्गा प्रकीर्तिता ॥ २४ ॥

ता-न्दुर्गा-न्दुर्गमा-न्देवी-न्दुराचारविघातिनीम् ।
नमामि भवभीतो-ऽहं संसारार्णवतारिणीम् ॥ २५ ॥

इदमथर्वशीर्​षं-योँ-ऽधीते स पञ्चाथर्वशीर्​षजपफलमाप्नोति ।
इदमथर्वशीर्​षमज्ञात्वा यो-ऽर्चां स्थापयति ।
शतलक्ष-म्प्रजप्त्वा-ऽपि सो-ऽर्चासिद्धि-न्न विन्दति ।
शतमष्टोत्तर-ञ्चास्य पुरश्चर्याविधि-स्स्मृतः ।
दशवार-म्पठेद्यस्तु सद्यः पापैः प्रमुच्यते ।
महादुर्गाणि तरति महादेव्याः प्रसादतः । २६ ॥

सायमधीयानो दिवसकृत-म्पाप-न्नाशयति ।
प्रातरधीयानो रात्रिकृत-म्पाप-न्नाशयति ।
साय-म्प्रातः प्रयुञ्जानो अपापो भवति ।
निशीथे तुरीयसन्ध्याया-ञ्जप्त्वा वाक्सिद्धिर्भवति ।
नूतनाया-म्प्रतिमाया-ञ्जप्त्वा देवतासान्निध्य-म्भवति ।
प्राणप्रतिष्ठाया-ञ्जप्त्वा प्राणाना-म्प्रतिष्ठा भवति ।
भौमाश्विन्या-म्महादेवीसन्निधौ जप्त्वा महामृत्यु-न्तरति ।
स महामृत्यु-न्तरति ।
य एवं-वेँद ।
इत्युपनिषत् ॥ २७ ॥

इति देव्यथर्वशीर्​षम् ।

श्री दुर्गा अथर्वशीर्षम् का महत्व

  1. देवी दुर्गा की महिमा: इस ग्रंथ में देवी दुर्गा को सृष्टि की संरक्षक और संहारक शक्ति के रूप में वर्णित किया गया है। वे ब्रह्मा, विष्णु और महेश की शक्ति का प्रतीक हैं।
  2. मंत्रों का संग्रह: इसमें देवी दुर्गा को प्रसन्न करने वाले मंत्रों का संग्रह है, जो भक्तों को आध्यात्मिक शक्ति और सुरक्षा प्रदान करते हैं।
  3. विभिन्न रूपों का वर्णन: दुर्गा देवी के विभिन्न रूपों जैसे काली, पार्वती, अम्बिका, भवानी आदि का वर्णन इस ग्रंथ में किया गया है।
  4. आध्यात्मिक लाभ: इस ग्रंथ का पाठ करने से भक्तों को मानसिक शांति, सुरक्षा और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है।

श्री दुर्गा अथर्वशीर्षम् का पाठ करने के लाभ

  1. संकटों से मुक्ति: इस ग्रंथ का पाठ करने से भक्तों को जीवन के विभिन्न संकटों से मुक्ति मिलती है।
  2. आत्मविश्वास में वृद्धि: देवी दुर्गा की कृपा से भक्तों का आत्मविश्वास बढ़ता है और वे जीवन की चुनौतियों का सामना करने में सक्षम होते हैं।
  3. मानसिक शांति: इस ग्रंथ का पाठ करने से मन को शांति मिलती है और तनाव दूर होता है।
  4. आध्यात्मिक उन्नति: देवी दुर्गा की कृपा से भक्तों की आध्यात्मिक उन्नति होती है और वे मोक्ष की ओर अग्रसर होते हैं।

श्री दुर्गा अथर्वशीर्षम् देवी दुर्गा की महिमा और उनकी शक्ति का वर्णन करने वाला एक महत्वपूर्ण सूक्त है। इसका पाठ करने से भक्तों को दैवीय कृपा, सुरक्षा और आध्यात्मिक लाभ प्राप्त होता है। यह ग्रंथ हिन्दू धर्म में देवी उपासना का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है और इसे विशेष रूप से नवरात्रि के समय पढ़ा जाता है।

श्री गणेश सूक्तम् (ऋग्वेद)
ऐकमत्य सूक्तम् (ऋग्वेद)
अग्नि सूक्तम् (ऋग्वेद)
नीला सूक्तम्
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