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Reading: सकुच भरे अधखिले सुमनमें छिपकर रहता प्रेम पराग
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भजनविष्णु भजन

सकुच भरे अधखिले सुमनमें छिपकर रहता प्रेम पराग

Sanatani
Last updated: जनवरी 23, 2026 8:00 अपराह्न
Sanatani
Published: जनवरी 23, 2026
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सकुच भरे अधखिले सुमनमें छिपकर रहता प्रेम पराग

सकुच भरे अधखिले सुमनमें छिपकर रहता प्रेम-पराग ।

नव-दर्शनमें मुग्ध प्राणका होता मूक मधुर अनुराग ॥

भय-लजा, संकोच-सहम, सहसा वाणीका निपट निरोध ।

वाचा-रहित, नेत्र-मुख अवनत, हास्यहीन, बालकवत् क्रोध ॥ १ ॥

जो उसने था किया, इसी स्वाभाविक रसका ही ब्यवहार ।

तो देना था तुम्हें चाहिये उसे हर्षसे अपना प्यार ||

हृदयंगम करना आवश्यक था वह सरल प्रणयका भाव ।

नहीं तिरस्कृत करना था नव- प्रेमिकका वह गूँगा चाव ॥ २ ॥

प्रथम मिलनमें ही क्या समुचित है समस्त संकोच-विनाश ।

क्या उससे वस्तुतः नहीं होता नबीन मधु-रसका नाश ।॥

नव कलिकाके लिये चाहना असमयमें ही पूर्ण विकास ।

क्या है र्नाहं अप्राकृत और असंगत उससे ऐसी आस  ॥ ३ ॥

क्या नववधू कभी मुखरा बन कर सकती प्रियसे परिहास ।

क्या वह मूर्खा या संदिग्धा बन सह सकती मिथ्या त्रास  ।।

क्या वह प्रौढ़ा सदृश खोल अवगुंठन कर सकती रस-भंग।

क्या बहने देती, मर्यादा तजकर, सहसा हास्य-तरंग  || ४ ॥

क्या ‘मूक।स्वादनवत्’ होता नहीं प्रेमका असली रूप।

क्या उसमें है नहीं छलकता प्रेम-पयोधि गंभीर अनूप  ॥

क्या है नहीं प्रसन्न इष्टको मानस-पूजा ही करती ।

क्या वह नहीं बाह्य पूजासे बढ़कर इष्ट-हृदय हरती ॥ ५ ॥

यदि नव प्रेमिकने तुमको पूजा केवल मनसे ही नाथ।

स्तंभित, कंपित, मुग्ध हर्षसे कह-सुन कुछ भी सका न साथ ।।

क्या इससे हे प्रेमिकवर ! प्रभु ! हुआ तुम्हारा कुछ अपमान ।

क्या इसमें अपराध मानते सरल भक्तका ? हे भगवान  ॥ ६ ॥

यदि ऐसा है नहीं देव ! तो क्यों फिर होते अंतर्द्धान ।

क्यों दर्शनसे वंचित करते, क्यों दिखलाते इतना मान  ॥

क्यों आँखोंसे ओझल होते, पता नहीं क्यों बतलाते ।

क्यों भक्तोंको सुख पहुँचाने नहीं शीघ्र सम्मुख आते  ॥ ७ ॥

कर प्रणाम तेरे चरणोंमें लगता हूँ अब जगके काज
सनातन सत चित आनंदा रूप
अरे द्वारपालों कन्हैया से कह दो भजन लिरिक्स
सर्व शिरोमणि विश्व सभा के आत्मोपम विश्वंभर के
ऐसो को उदार जगमाहीं
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