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उपनिषदधार्मिक पुस्तकेमांडूक्योपनिषद

मुण्डकोपनिषद

Sanatani
Last updated: फ़रवरी 14, 2026 5:31 अपराह्न
Sanatani
Published: फ़रवरी 14, 2026
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मुण्डकोपनिषद : एक गहन अध्ययन ( Mundaka Upanishad )

मुण्डकोपनिषद हिन्दू धर्म के उपनिषदों में से एक है, जो अति प्राचीन और पवित्र ग्रंथों में शामिल है। यह उपनिषद अथर्ववेद का हिस्सा है और इसमें ज्ञान, ब्रह्मा और आत्मा के गहन रहस्यों का विवरण मिलता है। इस लेख में हम मुण्डकोपनिषद का विस्तार से अध्ययन करेंगे, उसके विभिन्न श्लोकों का विश्लेषण करेंगे और समझेंगे कि इसका आध्यात्मिक महत्व क्या है।

Contents
  • मुण्डकोपनिषद : एक गहन अध्ययन ( Mundaka Upanishad )
  • मुण्डकोपनिषद का परिचय और इतिहास
  • मुण्डकोपनिषद की संरचना
  • मुण्डकोपनिषद का प्रथम मुण्डक
  • मुण्डकोपनिषद का द्वितीय मुण्डक
  • मुण्डकोपनिषद का तृतीय मुण्डक
  • मुण्डकोपनिषद का आध्यात्मिक महत्व
  • मुण्डकोपनिषद में वर्णित प्रमुख श्लोक
    • प्रथम मुण्डक, प्रथम खंड
    • द्वितीय मुण्डक द्वितीय खंड:
    • तृतीय मुण्डक, द्वितीय खंड
  • मुण्डकोपनिषद का आधुनिक संदर्भ में महत्व
  • मुण्डकोपनिषद की पुस्तक को यह पर पढ़ सकते है
  • मुण्डकोपनिषद के बारे में सामान्य प्रश्न
    • 1. मुण्डकोपनिषद का मुख्य संदेश क्या है?
    • 2. मुण्डकोपनिषद का अध्ययन क्यों महत्वपूर्ण है?
    • 3. मुण्डकोपनिषद कितने भागों में विभाजित है?

मुण्डकोपनिषद का परिचय और इतिहास

मुण्डकोपनिषद का अर्थ है ‘शिक्षा देने वाला उपनिषद‘। यह तीन मुण्डकों (अध्यायों) में विभाजित है, और प्रत्येक मुण्डक दो खंडों में विभाजित है। इस उपनिषद का मुख्य उद्देश्य व्यक्ति को आत्मज्ञान की ओर प्रेरित करना और ब्रह्मा की सही समझ प्रदान करना है। ग्रन्थके आरम्भमें अन्धोक्त विद्याकी आचार्य परंपरा दी गयी है। वहाँ बतलाया है कि यह विद्या ब्रह्माजीसे अथर्वा ऋषि को प्राप्त हुई और अथर्वा ऋषि से क्रमशः अङ्गी ऋषि और भारद्वाज ऋषि के द्वारा अङ्गिरा ऋषिको प्राप्त हुई। उन अङ्गिरा मुनिके पास से महागृहस्थ शौनकने विधिवत् आकर पूछा कि ‘भगवन् ! ऐसी कौन-सी बस्तु है जिस एकके जान लेनेपर सत्र कुछ जान लिया जाता है?’ महर्षि शीनकका यह प्रश्न प्राणिमात्रके लिये बड़ा कुतूहलजनक है, क्योंकि सभी जीव अधिक-से-अधिक बरतुओंका ज्ञान प्राप्त करना चाहते हैं।

इसके उत्तर में महर्षि अङ्गिराने परा और अपरा नामक दो विद्याओं का निरूपण किया है। जिसके द्वारा ऐहिक और आमुष्मिक अनात्म पदार्थोंका ज्ञान होता है उसे अपरा विद्या कहा है, तथा जिससे अखण्ड, अविनाशी एवं निष्प्रपञ्च परमार्थतत्त्वत्का बोध होता है उसे परा विद्या कहा गया है। सारा संसार अपरा विद्याका विषय है तथा संसारी पुरुषोंकी प्रवृत्ति भी उसीकी ओर है। उसीके द्वारा ऐसे किसी एक ही अखण्ड तत्त्वका ज्ञान नहीं हो सकता जो सम्पूर्ण ज्ञानोंका अभिष्टान हो, क्योंकि उसके विषयभूत जितने पदार्थ हैं वे सब के सब परिच्छिन्न ही हैं। अपरा विद्या वस्तुतः अविद्या ही है; व्यवहारमें उपयोगी होनेके कारण ही उसे विद्या कहा जाता है। अखण्ड और अव्यय तत्त्वके जिज्ञासुके लिये वह त्याज्य ही है। इसीलिये आचार्य अङ्गिराने यहाँ उसका उल्लेख किया है।

इस प्रकार विद्याके दो भेद कर फिर सम्पूर्ण ग्रन्थमें उन्होंका सविस्तर वर्णन किया गया है। यह उपनिषद अथर्ववेद का हिस्सा है और इसका मुख्य उद्देश्य वेदांत दर्शन का प्रचार करना है।

मुण्डकोपनिषद की संरचना

मुण्डकोपनिषद तीन मुण्डकों में विभाजित है, प्रत्येक मुण्डक दो खंडों में बंटा हुआ है।

  • प्रथम मुण्डक: इसमें ब्रह्मा और आत्मा के बारे में चर्चा होती है।
  • द्वितीय मुण्डक: इसमें आत्मा की पहचान और उसकी प्रकृति का विश्लेषण किया जाता है।
  • तृतीय मुण्डक: इसमें ज्ञान प्राप्ति के मार्ग और मुक्ति की चर्चा होती है।

मुण्डकोपनिषद का प्रथम मुण्डक

प्रथम मुण्डक के प्रथम खंड में ब्रह्मा की उत्पत्ति और उसके विस्तार का वर्णन है। इसमें बताया गया है कि ब्रह्मा ही सृष्टि के रचयिता हैं और वही समस्त जीवों के भीतर विद्यमान हैं।

प्रथम मुण्डक के द्वितीय खंड में आत्मा की वास्तविकता और उसकी अमरता की बात की गई है। यहां यह स्पष्ट किया गया है कि आत्मा न तो जन्म लेती है और न ही मरती है, वह सदा अमर रहती है।

मुण्डकोपनिषद का द्वितीय मुण्डक

द्वितीय मुण्डक के प्रथम खंड में ज्ञान की महत्ता और उसकी प्राप्ति के मार्ग का विवरण है। यहां यह कहा गया है कि सही ज्ञान ही व्यक्ति को मुक्ति दिला सकता है।

द्वितीय मुण्डक के द्वितीय खंड में आत्मा की पहचान और उसकी विशिष्टताओं का वर्णन है। इसमें बताया गया है कि आत्मा अनंत है और उसे किसी भी भौतिक वस्तु से बांधा नहीं जा सकता।

मुण्डकोपनिषद का तृतीय मुण्डक

तृतीय मुण्डक के प्रथम खंड में मुक्ति के मार्ग और उसके लिए आवश्यक साधनों का विवरण है। यहां यह कहा गया है कि साधना और तपस्या के द्वारा ही व्यक्ति मुक्ति प्राप्त कर सकता है।

तृतीय मुण्डक के द्वितीय खंड में ज्ञान प्राप्ति के बाद की अवस्था का वर्णन है। इसमें बताया गया है कि ज्ञान प्राप्ति के बाद व्यक्ति का अहंकार नष्ट हो जाता है और वह ब्रह्मा में विलीन हो जाता है।

मुण्डकोपनिषद का आध्यात्मिक महत्व

मुण्डकोपनिषद का आध्यात्मिक महत्व अत्यंत गहरा है। यह उपनिषद व्यक्ति को आत्मज्ञान की दिशा में प्रेरित करता है और उसे ब्रह्मा की वास्तविकता से अवगत कराता है। इसमें वर्णित शिक्षाएं व्यक्ति को जीवन के सत्य को समझने और आत्मा की अमरता का अनुभव करने में मदद करती हैं।

मुण्डकोपनिषद में वर्णित प्रमुख श्लोक

मुण्डकोपनिषद में कई प्रमुख श्लोक हैं जो इसके ज्ञान को संक्षेप में प्रस्तुत करते हैं। कुछ प्रमुख श्लोकों का विवरण निम्नलिखित है:

प्रथम मुण्डक, प्रथम खंड

ॐ ब्रह्मा देवानां प्रथमः सम्बभूव विश्वस्य कर्ता भुवनस्य गोप्ता । स ब्रह्मविद्यां सर्वविद्याप्रतिष्ठा- मथर्वाय ज्येष्ठपुत्राय प्राह ॥ १ ॥

सम्पूर्ण देवताओंमें पहले ब्रह्मा उत्पन्न हुआ। यह विश्वका रचयिता और त्रिभुवनका रक्षक था। उसने अपने ज्येष्ठ पुत्र अथर्वाको समस्त विद्याओंकी आश्रयभूत ब्रह्मविद्याका उपदेश दिया ॥ १ ॥

द्वितीय मुण्डक द्वितीय खंड:

अहम् ब्रह्मास्मि

यह श्लोक आत्मा और ब्रह्मा की एकता को प्रकट करता है।

तृतीय मुण्डक, द्वितीय खंड

सर्वं खल्विदं ब्रह्म

यह श्लोक ब्रह्मा की सर्वव्यापकता को दर्शाता है।

मुण्डकोपनिषद का आधुनिक संदर्भ में महत्व

उपनिषदोंका जो प्रचलित क्रम है उसके अनुसार इसका अध्ययन प्रश्नोपनिप‌के पश्चात् किया जाता है। परन्तु प्रस्तुत पुस्तकके पृष्ट ९४ पर भगवान् शङ्कराचार्य लिखते हैं-

वक्ष्यति च ‘न येषु जिह्ममनृतं न माया च’ इति

अर्थात् ‘जैसा कि आगे (प्रश्नोपनिपद्में) ‘जिन पुरुषोंमें अकुटिलता, अनृत और माया नहीं है’ इत्यादि वाक्यद्वारा कहेंगे भी ।’

इस प्रकार प्रश्नोपनिषद्‌के प्रथम प्रश्नके अन्तिम मन्त्रका भविष्यकालिक उल्लेख करके आचार्य सूचित करते हैं कि पहले मुण्डक का अध्ययन करना चाहिये और उसके पश्चात् प्रश्नका । प्रश्नोपनिषद्‌का भाष्य आरम्भ करते हुए तो उन्होंने इसका स्पष्टतया उल्लेख किया है। अतः शाङ्करसम्प्रदायके वेदान्तविद्यार्थियोंको उपनिषद्भाष्यका इसी क्रमसे अध्ययन करना चाहिये । अस्तु, भगवान्से प्रार्थना है कि इस ग्रन्थके अनुशीलनद्वारा हमें ऐसी योग्यता प्रदान करें जिससे हम उनके सर्वा- विष्टानभूत परात्पर स्वरूपका रहस्य हृदयङ्गम कर सकें । आज के समय में भी मुण्डकोपनिषद की शिक्षाएं अत्यंत प्रासंगिक हैं। इसमें वर्णित ज्ञान और दर्शन व्यक्ति को आंतरिक शांति और संतोष प्रदान कर सकते हैं। आधुनिक जीवन की जटिलताओं से मुक्त होने और आत्मा की शांति प्राप्त करने के लिए मुण्डकोपनिषद की शिक्षाओं का अनुसरण किया जा सकता है।

मुण्डकोपनिषद की पुस्तक को यह पर पढ़ सकते है

Mundaka Upanishad

मुण्डकोपनिषद के बारे में सामान्य प्रश्न

1. मुण्डकोपनिषद का मुख्य संदेश क्या है?

मुण्डकोपनिषद का मुख्य संदेश आत्मज्ञान और ब्रह्मा की वास्तविकता की ओर प्रेरित करना है।

2. मुण्डकोपनिषद का अध्ययन क्यों महत्वपूर्ण है?

मुण्डकोपनिषद का अध्ययन व्यक्ति को जीवन के सत्य को समझने और आत्मा की अमरता का अनुभव करने में मदद करता है।

3. मुण्डकोपनिषद कितने भागों में विभाजित है?

मुण्डकोपनिषद तीन मुण्डकों में विभाजित है, और प्रत्येक मुण्डक दो खंडों में बंटा हुआ है।

मत्स्य पुराण
तैत्तिरीय उपनिषद
ईशावास्योपनिषद
ऐतरेयोपनिषद ( Aitareya Upanishad )
निर्वाण उपनिषद
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