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SanatanWeb.com > Blog > गीतकाव्य > भजन > विष्णु भजन > हरि अवतरे कारागार
भजनविष्णु भजन

हरि अवतरे कारागार

Sanatani
Last updated: जनवरी 24, 2026 4:30 अपराह्न
Sanatani
Published: जनवरी 24, 2026
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हरि अवतरे कारागार – Hari Avatare Karagar

हरि अवतरे कारागार ।

दिसि सकल भइँ परम निरमल अभ्र सुखमा-सार ।

लता-बिटप सुपल्लवित पुष्पित नमत फल-भार ।

सुस्वद मंद सुगंध सीतल बहत मलय-बयार ।

देवगन हरखत सुमन बरवत करत जयकार ।।

बिनय करत बिरंचि नारद सिद्ध बिबिध प्रकार ।

करत किंनर गान बहु गंधरव इरख अपार ।!

संख चक्र गदा नवांबुज लसत हैं भुज चार ।

भृगु-लता कौस्तुभ-सुसोभित, कांतिके आगार ।।

नौमि नीरद-नील नव तनु गले मुकता-हार ।

पीत पट राजत, अलक लखि अलिहु करत पुकार ।।

परम बिस्मित देखि दंपति छबिहिं अमित उदार ।

निरखि सुंदरता अपरिमित लजत कोटिन मार ॥

बन्दौं विष्णु विश्वाधार
जर्यात देव जयति देव जय दयालु देवा
होगा कब वह सुदिन समय शुभ मायावी मन बनकर दीन
ऊधो मधुपुर का बासी म्हारो बिछड़ यो स्याम मिलाय
नाथ अब लीजै मोहि उबार
TAGGED:श्री विष्णु चरण वन्दन ( Shree Vishnu Charan Vandan )श्री विष्णु भजन ( Shree Vishnu Bhajan )
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