Bhaj Govindam in Hindi
भज गोविन्दम्(Bhaj Govindam) भारतीय दर्शन और भक्ति आंदोलन का एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है। इसे आदिगुरु शंकराचार्य द्वारा रचित माना जाता है। यह ग्रंथ भक्तिपूर्ण गीतों और उपदेशों का संग्रह है, जिसमें आत्मज्ञान, भक्ति, और मोक्ष प्राप्ति के मार्ग को सरल शब्दों में प्रस्तुत किया गया है। भज गोविन्दम् को मोहमुद्गर के नाम से भी जाना जाता है, जिसका अर्थ है “मोह को तोड़ने वाला हथियार”।
प्रेरणा और रचना का उद्देश्य
शंकराचार्य ने इस ग्रंथ की रचना तब की थी जब उन्होंने एक वृद्ध व्यक्ति को संस्कृत व्याकरण का अध्ययन करते हुए देखा। शंकराचार्य ने महसूस किया कि वृद्धावस्था में इस प्रकार के अध्ययन का कोई व्यावहारिक महत्व नहीं है, और उन्होंने यह गीत रचा ताकि लोगों को सांसारिक मोह से मुक्त होकर भगवान की भक्ति में लगने की प्रेरणा मिले। भज गोविन्दम् का मुख्य संदेश यह है कि मानव जीवन अस्थायी है और इसे ईश्वर की भक्ति और आत्मज्ञान के लिए समर्पित करना चाहिए। इसमें सांसारिक मोह, धन, ऐश्वर्य, और भौतिक सुखों की नश्वरता को उजागर किया गया है। ग्रंथ के अनुसार, सच्चा सुख और शांति केवल भगवान की भक्ति और आत्मज्ञान से ही संभव है।
इसमें कुल 31 श्लोक हैं। पहले श्लोक से ही यह स्पष्ट हो जाता है कि सांसारिक जीवन में व्यर्थ की चीजों पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय भगवान गोविन्द (कृष्ण) का स्मरण करना चाहिए।
भज गोविन्दम् की विशेषताएँ
- सरल भाषा: इसमें संस्कृत का प्रयोग है, लेकिन भाषा सरल और समझने में आसान है।
- भक्ति और ज्ञान का समन्वय: यह ग्रंथ भक्ति और ज्ञान दोनों का अद्भुत संगम है।
- प्रेरणादायक उपदेश: यह ग्रंथ हर उम्र के व्यक्ति के लिए प्रासंगिक है और जीवन में सही दिशा की प्रेरणा देता है।
भज गोविन्दम् प्रसंग और व्याख्या
भज गोविन्दम् का हर श्लोक मानव जीवन के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डालता है। उदाहरण के लिए, यह बताता है कि वृद्धावस्था में पछताने से अच्छा है कि हम बचपन और युवावस्था में ही भगवान का ध्यान करें।
- सांसारिक सुखों की नश्वरता
- जीवन का अस्थायित्व
- आत्मा का महत्व
- भगवान की भक्ति में लगना

॥ भज गोविन्दम् ॥ – Bhaj Govindam
भज गोविन्दं भज गोविन्दं भज गोविन्दं गोविन्दं भज मूढमते ।
सम्प्राप्ते सन्निहिते काले नहि नहि रक्षति डुकृङ्करणे ॥१॥
ईदवर-भक्ति के बिना पठन-पाठन या कोई भी विद्या व्यर्थ
है । मनुष्य जिन अनेक प्रकार के अभिमानों में फंसा रहता है
उनमें पांडित्य-गर्व भी एक है। यह तो सभी जानते हैं कि कामिनी-
कांचन के लोभ में पड़कर लोग दुःखी होते हैं। श्री शंकराचार्य
का कथन है कि विद्या-लोभ भी उसी श्रेणी में आता हे । सारी
आयु विद्या सीखने में बिता देना किन्तु भक्ति के लिए बिलकुल
समय न बचाना– यह केसी विडम्वना है !
मूढ जहीहि धनागमतृष्णां कुरु सद्बुद्धिं मनसि वितृष्णाम् ।
यल्लभसे निजकर्मोपात्तं वित्तं तेन विनोदय चित्तम् ॥२॥
पद्यानुवाद
राग न रख धन के संचय सें,हो वितृष्ण धर सुमति हृदय से,
अजित हो जो धन स्वकर्म से,रह उससे आनन्द अभय में |
भज गोविन्द भज गोविन्द,गोविन्दं भज मूढ़मते |
नारीस्तनभरनाभीदेशं दृष्ट्वा मा गा मोहावेशम् ।
एतन्मांसवसादिविकारं मनसि विचिन्तय वारं वारम् ॥३॥
पद्यानुवाद
नारी-अंग निहार चपल चित, मत हो मायाविष्ट विमोहित, मांसवसादिक के विकार ये, कर तू बारंवार विवेचित ।
भज गोविन्दं भज गोविन्दं,गोविन्दं भज मूढ़मते ।
नलिनीदलगतजलमतितरलं तद्वज्जीवितमतिशयचपलम् ।
विद्धि व्याध्यभिमानग्रस्तं लोकं शोकहतं च समस्तम् ॥४॥
पद्यानुवाद
जीवन यह अत्यन्त चपल है, नलिनी-दल-जल-तुल्य तरल है, दुःख-व्याधि-अभिमान – संकुलित, शोक-निहत यह लोक सकल है।
भज गोविन्दं भज गोविन्दं, गोविन्दं भज मूढ़मते ।
यावद्वित्तोपार्जनसक्त-स्तावन्निजपरिवारो रक्तः ।
पश्चाज्जीवति जर्जरदेहे वार्तां कोऽपि न पृच्छति गेहे ॥५॥
पद्यानुवाद
जब लोँ शक्ति धनोपार्जन की, पूछताछ तब लौं इस तन की।
जर्जरभूत हुई जब काया, सुधि लेते हैं नहीं स्वजन भो ।
भज गोविन्दं भज गोविन्दं, गोविन्दं भज मूढ़मते ।
यावत्पवनो निवसति देहे तावत्पृच्छति कुशलं गेहे ।
गतवति वायौ देहापाये भार्या बिभ्यति तस्मिन्काये ॥६॥
पद्यानुवाद
जब तक श्वास शेष है तन में, पूछो जाती कुशल भवन में, यह शरीर निष्प्राण निरखकर, भय खाती है भार्या मन में ।
भज गोविन्दं भज गोविन्दं, गोविन्द भज मूढ़मते
बालस्तावत्क्रीडासक्तः तरुणस्तावत्तरुणीसक्तः ।
वृद्धस्तावच्चिन्तासक्तः परमे ब्रह्मणि कोऽपि न सक्तः ॥७॥
पद्यानुवाद
खेल-कूद में बीता बचपन, रमणी – राग – रंग – रत यौवन
शेष समय चिन्ता में डूबा, किससे हो कब ब्रह्मारावन |
भज गोविन्द भज गोविन्द,गोविन्द भज मूढ़मते
का ते कान्ता कस्ते पुत्रः संसारोऽयमतीव विचित्रः ।
कस्य त्वं कः कुत आयात-स्तत्त्वं चिन्तय तदिह भ्रातः ॥८॥
पद्यानुवाद
कान्ता तेरी कौन, कौन सुत । यह अपार संसार महाद्भुत, किसका, कौन, कहां से आया।
चिन्तन कर तू बन्धु, ध्यानयुत । भज गोविन्द भज गोविन्द, गोविन्द भज मूढ़मते ।
सत्सङ्गत्वे निस्सङ्गत्वं निस्सङ्गत्वे निर्मोहत्वम् ।
निर्मोहत्वे निश्चलतत्त्वं निश्चलतत्त्वे जीवन्मुक्तिः ॥९॥
पद्यानुवाद
सत्संगति में है संग- क्षय, संग-क्षय से सर्व-मोह-लय,
मोह-विलय में अचलचित्तता, अचल चित्त तब मुक्ति अमृतमय ।
भज गोविन्द भज गोविन्द, गोविन्द भज मूढ़मते
वयसि गते कः कामविकारः शुष्के नीरे कः कासारः ।
क्षीणे वित्ते कः परिवारः ज्ञाते तत्त्वे कः संसारः ॥१०॥
पद्यानुवाद
काम कहां जब ढले गले वय, जल सूखे तब कहां जलाशय ।
कहां कुटुम्ब वित्त जब छोजे, भव कैसा जब हो बोधोदय ॥
भज गोविन्द भज गोविन्द, गोविन्द भज मूढ़मते
मा कुरु धनजनयौवनगर्वं हरति निमेषात्कालः सर्वम् ।
मायामयमिदमखिलं हित्वा ब्रह्मपदं त्वं प्रविश विदित्वा ॥११॥
पद्यानुवाद
इठला मत धन-जन-यौवन में, काल इन्हें हरता है क्षण में,
मातामय यह जगत त्याग कर, लग तू ब्रह्म-लाभ-चिन्तन में ।
भज गोविन्द भज गोविन्द, गोविन्द भज मूढ़मते ।
दिनयामिन्यौ सायं प्रातः शिशिरवसन्तौ पुनरायातः ।
कालः क्रीडति गच्छत्यायु-स्तदपि न मुञ्चत्याशावायुः ॥१२॥
पद्यानुवाद
सायं-प्रात रात-दिन फिर-फिर, शिशिर-वसंत नहीं कोई थिर,
काल चल रहा आयु ढल रही, तो भी आशा-पाश अटल चिर ।
भज गोविन्द भज गोविन्द, गोविन्द भज मूढ़मते ।
का ते कान्ता धनगतचिन्ता वातुल किं तव नास्ति नियन्ता ।
त्रिजगति सज्जनसङ्गतिरेका भवति भवार्णवतरणे नौका ॥१३॥
पद्यानुवाद
चिन्ता किसकी तुझे भ्रान्त नर, क्या तेरा कोई न सूत्रधर ।
क्षण भर की सत्संगति तेरी, पार करा देगी भवसागर ।
भज गोविन्द भज गोविन्द गोविन्द भज मूढ़मते ।
जटिलो मुण्डी लुञ्छितकेशः काषायाम्बरबहुकृतवेषः ।
पश्यन्नपि च न पश्यति मूढो ह्युदरनिमित्तं बहुकृतवेषः ॥१४॥
पद्यानुवाद
लुंचित मुंडित जटा-विभूषित, बसन रंगे हैं बहुविधि-रूपित । अज्ञ रामझकर भी न समभते, उदरनिमित्त यत्न ये अगणित ॥ भज गोविन्दं भज गोविन्द, गोविन्द भज मूढ़सते ।
अङ्गं गलितं पलितं मुण्डं दशनविहीनं जातं तुण्डम् ।
वृद्धो याति गृहीत्वा दण्डं तदपि न मुञ्चत्याशापिण्डम् ॥१५॥
पद्यानुवाद
पके केश सब अंग जर्जरित मुख के सारे दशन तिरोहित ।
लकड़ी का ही रहा आसरा, तदपि बृद्ध की आस अपरिमित ।।
भज गोविन्द भज गोविन्द, गोविन्द भज मूढ़मते ।
अग्रे वह्निः पृष्ठे भानुः रात्रौ चुबुकसमर्पितजानुः ।
करतलभिक्षस्तरुतलवास- स्तदपि न मुञ्चत्याशापाशः ॥१६॥
पद्यानुवाद
दिवस कटा रवि वह्नि ताप पर, निशि सी-सीकर सिमिट-सिकुड़कर ।
कर-तल भिक्षा वास तरु-तले, तब भी आशा नित्य निरंतर ।
भज गोविन्द भज गोविन्द, गोविन्द भज मूढ़मते ।
कुरुते गङ्गासागरगमनं व्रतपरिपालनमथवा दानम् ।
ज्ञानविहीनः सर्वमतेन मुक्तिं न भजति जन्मशतेन ॥१७॥
पद्यानुवाद
गंगासागर तीर्थ-दान-व्रत, करे भले ही कोई शत-शत ।
किन्तु ज्ञान के बिना मुक्ति वह, दूर जहां की तहां पूर्ववत ।।
भज गोविन्द भज गोविन्द, गोविन्द भज मूढ़मते ।
सुरमंदिरतरुमूलनिवासः शय्या भूतलमजिनं वासः ।
सर्वपरिग्रहभोगत्यागः कस्य सुखं न करोति विरागः ॥१८॥
पद्यानुवाद
सुर – मन्दिर – तरु – मूल – समाश्रय, भूमि-शयन परिधान अजिनमय,
सर्व – परिग्रह – भोग – त्यागयुत, सुख विराग में किसे न अक्षय ?
भज गोविन्दं भज गोविन्दं, गोबिन्दं भज मूढ़मते ।
योगरतो वा भोगरतो वा सङ्गरतो वा सङ्गविहीनः ।
यस्य ब्रह्मणि रमते चित्तं नन्दति नन्दति नन्दत्येव ॥१९॥
पद्यानुवाद
योगी हो अथवा भोगी नित, संग-सहित वा संग-निवारित, सुख है, सुख है, सुख है उसको, रमा ब्रह्म में हो जिसका चित ! भज गोविन्दं भज गोविन्दं, गोविन्दं भज मूढ़मते ।
भगवद्गीता किञ्चिदधीता गङ्गाजललवकणिका पीता ।
सकृदपि येन मुरारिसमर्चा क्रियते तस्य यमेन न चर्चा ॥२०॥
पद्यानुवाद
गीता नाम सहस्र गेय है, श्रीपतिरूप अजस्र ध्येय है, चित्त नेय है सत्संगति में, वित्त दोन जन हेतु देय है।
भज गोविन्दं भज गोविन्दं,गोविन्दं भज मूढ़मते ।
पुनरपि जननं पुनरपि मरणं पुनरपि जननीजठरे शयनम् ।
इह संसारे बहुदुस्तारे कृपयाऽपारे पाहि मुरारे ॥२१॥
पद्यानुवाद
गीता का अत्यल्प अध्ययन, करे पान जो गंगा-जलकण, एक बार हरि ध्यान घरे जो, उसे कहां यमपाश-निबन्धन।
भज गोविन्दं गोविन्दं भज भज गोविन्दं, मूढ़मते ।
रथ्याचर्पटविरचितकन्थः पुण्यापुण्यविवर्जितपन्थः ।
योगी योगनियोजितचित्तो रमते बालोन्मत्तवदेव ॥२२॥
पद्यानुवाद
अविरत कितना जनन-मरण यह, फिर-फिर जननी-जठर-शयन यह, हरे मुरारे, पार उतारो, इस दुस्तर भव से सानुग्रह ।
भज गोविन्दं भज गोविन्नं, गोविन्दं भज मूढ़मते ।
कस्त्वं कोऽहं कुत आयातः का मे जननी को मे तातः ।
इति परिभावय सर्वमसारम् विश्वं त्यक्त्वा स्वप्नविचारम् ॥२३॥
पद्यानुवाद
फिके-पड़े चिथड़ों की कन्था, पुण्यापुण्य – रहित है पन्था,
चित्त योग की ओर लगा है, तब किस हेतु शोक-भय-चिन्ता ?
भज गोविन्दं भज गोविन्दं, गोविन्दं भज मूढ़मते
त्वयि मयि चान्यत्रैको विष्णु-र्व्यर्थं कुप्यसि मय्यसहिष्णुः ।
भव समचित्तः सर्वत्र त्वं वाञ्छस्यचिराद्यदि विष्णुत्वम् ॥२४॥
पद्यानुवाद
मैं तू कौन कहां से आया, कौन पिता जननी सुत जाया ?
तज तू सभी असार समझकर, यह संसार स्वप्न की माया ।
भज गोविन्दं गोविन्दं भज भज गोविन्दं, मूढ़मते ।
शत्रौ मित्रे पुत्रे बन्धौ मा कुरु यत्नं विग्रहसन्धौ ।
सर्वस्मिन्नपि पश्यात्मानं सर्वत्रोत्सृज भेदाज्ञानम् ॥२५॥
पद्यानुवाद
तुझमें मुझमें विष्णु जगन्मय, कोप न कर, कर सर्व-समन्वय, निरख सभीमें अपने को ही, भेदभाव तज तू निःसंशय ।
भज गोविन्दं भज गोविन्दं, गोविन्दं भज मूढ़मते ।
रहें स्वजन अरि-मित्र हिताहित, राग-द्वेष रख कहीं न किचितः रह समचित्त सब कहीं भव में, इष्ट विष्णुपद यदि अविलम्बित ।
कामं क्रोधं लोभं मोहं त्यक्त्वाऽऽत्मानं भावय कोऽहम् ।
आत्मज्ञानविहीना मूढा-स्ते पच्यन्ते नरकनिगूढाः ॥२६॥
पद्यानुवाद
काम – क्रोध – लोभादिक परिहर, मैं हूं कौन आत्म चिन्तन कर, गिरकर गूढ़ नरक में सड़ते आत्मज्ञान – विहीन मूढ़ नर ।
भज गोविन्दं भज गोविन्दं भज गोविन्दं, मूढ़मते ।
गेयं गीतानामसहस्रं ध्येयं श्रीपतिरूपमजस्रम् ।
नेयं सज्जनसङ्गे चित्तं देयं दीनजनाय च वित्तम् ॥२७॥
पद्यानुवाद
गीता नाम सहस्र गेय है, श्रीपति-रूप अजस्त्र ध्येय है, चित्त नेय है सत्संगति में, वित्त दीन जन हेतु देय है।
भज गोविन्दं भज गोविन्दं, गोविन्दं भज मूढ़मते ।
सुखतः क्रियते रामाभोगः पश्चाद्धन्त शरीरे रोगः ।
यद्यपि लोके मरणं शरणं तदपि न मुञ्चति पापाचरणम् ॥२८॥
पद्यानुवाद
सुख से काम-भोग नर करता, रोग हाय तब तनु आ धरता, मरण लोक में निश्चित तो भी तजता मनुज न पापाचरता ।
भज गोविन्दं भज गोविन्दं, गोविन्दं भज मूढ़मते ।
अर्थमनर्थं भावय नित्यं नास्तिततः सुखलेशः सत्यम् ।
पुत्रादपि धनभाजां भीतिः सर्वत्रैषा विहिता रीतिः ॥२९॥
पद्यानुवाद
समझ अर्थ को सदा अनर्थक, सुख इसमें है कहीं न रंचक, भीति सुतों से भी घनियों को, रीति यही है जग में व्यापक ।
भज गोविन्दं भज गोविन्द, गोविन्दं भज मूढ़मते ।
प्राणायामं प्रत्याहारं नित्यानित्य विवेकविचारम् ।
जाप्यसमेतसमाधिविधानं कुर्ववधानं महदवधानम् ॥३०॥
पद्यानुवाद
प्राणायाम, स्वनिग्रह, नियमन,नित्य – अनित्य – विवेक – विवेचन,
जाप्य – मंत्र – संयुत समाधि – विधि, सावधान कर इनका साधन ।
भज गोविन्दं भज भज गोविन्दं मूढ़मते ।
गुरुचरणाम्बुजनिर्भरभक्तः संसारादचिराद्भव मुक्तः ।
सेन्द्रियमानसनियमादेवं द्रक्ष्यसि निजहृदयस्थं देवम् ॥३१॥
पद्यानुवाद
गुरु – पद – पंकज – भक्ति करेगा, तब तू यह भव-सिन्धु तरेगा, करके
इन्द्रिय – मानस – संयम, हृदय स्थिर हरि को निरखेगा ।
भज गोविन्दं भज गोविन्दं, गोविन्दं भज मूढ़मते ।