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Reading: श्री कृष्ण कवचं (त्रैलोक्य मंगल कवचम्)
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कवचम्कृष्ण स्तोत्रस्तोत्र

श्री कृष्ण कवचं (त्रैलोक्य मंगल कवचम्)

Sanatani
Last updated: जनवरी 22, 2026 6:30 अपराह्न
Sanatani
Published: जनवरी 22, 2026
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श्री कृष्ण कवचं

श्री कृष्ण कवचं(Krishna Kavacham) को त्रैलोक्य मंगल कवचम् भी कहा जाता है। यह कवच भगवान श्रीकृष्ण का दिव्य स्तोत्र है, जिसका पाठ करने से भक्त को श्रीकृष्ण की कृपा प्राप्त होती है और सभी प्रकार की बाधाओं से रक्षा होती है। इस कवच का उल्लेख विभिन्न पुराणों में मिलता है, और इसे अत्यंत प्रभावशाली माना जाता है।

Contents
  • श्री कृष्ण कवचं
  • श्री कृष्ण कवच के लाभ
  • श्री कृष्ण कवच का पाठ विधि
  • Krishna Kavacham

यह कवच तीनों लोकों (भूलोक, स्वर्गलोक और पाताललोक) के लिए मंगलकारी माना जाता है। इसे श्रद्धा और विश्वास के साथ पढ़ने से व्यक्ति के जीवन में सुख, समृद्धि और शांति आती है। यह कवच साधकों के लिए अत्यंत उपयोगी है, विशेष रूप से जो भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति करते हैं। यह न केवल आध्यात्मिक उन्नति प्रदान करता है, बल्कि भौतिक जीवन की समस्याओं से भी सुरक्षा देता है।

श्री कृष्ण कवच के लाभ

  1. सभी प्रकार की बाधाओं से रक्षा – यह कवच व्यक्ति को मानसिक, शारीरिक और आध्यात्मिक संकटों से बचाता है।
  2. नकारात्मक शक्तियों का नाश – यह नकारात्मक ऊर्जा, शत्रु बाधा, तंत्र-मंत्र दोष आदि से रक्षा करता है।
  3. श्रीकृष्ण की कृपा प्राप्त होती है – यह कवच भगवान की विशेष कृपा और संरक्षण प्रदान करता है।
  4. धन, ऐश्वर्य और सुख-शांति – इसे पढ़ने से घर-परिवार में सुख-शांति बनी रहती है और आर्थिक उन्नति होती है।
  5. आध्यात्मिक उन्नति – साधक को ध्यान, भक्ति और आत्मिक शक्ति प्राप्त होती है।

श्री कृष्ण कवच का पाठ विधि

  • इस कवच का पाठ प्रातः स्नान के बाद पवित्र मन से करना चाहिए।
  • श्रीकृष्ण के किसी स्वरूप के समक्ष दीप जलाकर, उन्हें तुलसी दल अर्पित करें।
  • तत्पश्चात पूर्ण श्रद्धा और विश्वास के साथ इस कवच का पाठ करें।
  • पाठ के बाद भगवान श्रीकृष्ण की आरती करें और प्रसाद का वितरण करें।

Krishna Kavacham

श्री नारद उवाच –
भगवन्सर्वधर्मज्ञ कवचं यत्प्रकाशितम् ।
त्रैलोक्यमंगलं नाम कृपया कथय प्रभो ॥ १ ॥

सनत्कुमार उवाच –
शृणु वक्ष्यामि विप्रेंद्र कवचं परमाद्भुतम् ।
नारायणेन कथितं कृपया ब्रह्मणे पुरा ॥ २ ॥

ब्रह्मणा कथितं मह्यं परं स्नेहाद्वदामि ते ।
अति गुह्यतरं तत्त्वं ब्रह्ममंत्रौघविग्रहम् ॥ 3 ॥

यद्धृत्वा पठनाद्ब्रह्मा सृष्टिं वितनुते ध्रुवम् ।
यद्धृत्वा पठनात्पाति महालक्ष्मीर्जगत्त्रयम् ॥ 4 ॥

पठनाद्धारणाच्छंभुः संहर्ता सर्वमंत्रवित् ।
त्रैलोक्यजननी दुर्गा महिषादिमहासुरान् ॥ 5 ॥

वरतृप्तान् जघानैव पठनाद्धारणाद्यतः ।
एवमिंद्रादयः सर्वे सर्वैश्वर्यमवाप्नुयुः ॥ 6 ॥

इदं कवचमत्यंतगुप्तं कुत्रापि नो वदेत् ।
शिष्याय भक्तियुक्ताय साधकाय प्रकाशयेत् ॥ 7 ॥

शठाय परशिष्याय दत्वा मृत्युमवाप्नुयात् ।
त्रैलोक्यमंगलस्याऽस्य कवचस्य प्रजापतिः ॥ 8 ॥

ऋषिश्छंदश्च गायत्री देवो नारायणस्स्वयम् ।
धर्मार्थकाममोक्षेषु विनियोगः प्रकीर्तितः ॥ 9 ॥

प्रणवो मे शिरः पातु नमो नारायणाय च ।
फालं मे नेत्रयुगलमष्टार्णो भुक्तिमुक्तिदः ॥ 10 ॥

क्लीं पायाच्छ्रोत्रयुग्मं चैकाक्षरः सर्वमोहनः ।
क्लीं कृष्णाय सदा घ्राणं गोविंदायेति जिह्विकाम् ॥ 11 ॥

गोपीजनपदवल्लभाय स्वाहाऽननं मम ।
अष्टादशाक्षरो मंत्रः कंठं पातु दशाक्षरः ॥ 12 ॥

गोपीजनपदवल्लभाय स्वाहा भुजद्वयम् ।
क्लीं ग्लौं क्लीं श्यामलांगाय नमः स्कंधौ रक्षाक्षरः ॥ 13 ॥

क्लीं कृष्णः क्लीं करौ पायात् क्लीं कृष्णायां गतोऽवतु ।
हृदयं भुवनेशानः क्लीं कृष्णः क्लीं स्तनौ मम ॥ 14 ॥

गोपालायाग्निजायातं कुक्षियुग्मं सदाऽवतु ।
क्लीं कृष्णाय सदा पातु पार्श्वयुग्ममनुत्तमः ॥ 15 ॥

कृष्ण गोविंदकौ पातु स्मराद्यौजेयुतौ मनुः ।
अष्टाक्षरः पातु नाभिं कृष्णेति द्व्यक्षरोऽवतु ॥ 16 ॥

पृष्ठं क्लीं कृष्णकं गल्ल क्लीं कृष्णाय द्विरांतकः ।
सक्थिनी सततं पातु श्रीं ह्रीं क्लीं कृष्णठद्वयम् ॥ 17 ॥

ऊरू सप्ताक्षरं पायात् त्रयोदशाक्षरोऽवतु ।
श्रीं ह्रीं क्लीं पदतो गोपीजनवल्लभपदं ततः ॥ 18 ॥

श्रिया स्वाहेति पायू वै क्लीं ह्रीं श्रीं सदशार्णकः ।
जानुनी च सदा पातु क्लीं ह्रीं श्रीं च दशाक्षरः ॥ 19 ॥

त्रयोदशाक्षरः पातु जंघे चक्राद्युदायुधः ।
अष्टादशाक्षरो ह्रीं श्रीं पूर्वको विंशदर्णकः ॥ 20 ॥

सर्वांगं मे सदा पातु द्वारकानायको बली ।
नमो भगवते पश्चाद्वासुदेवाय तत्परम् ॥ 21 ॥

ताराद्यो द्वादशार्णोऽयं प्राच्यां मां सर्वदाऽवतु ।
श्रीं ह्रीं क्लीं च दशार्णस्तु क्लीं ह्रीं श्रीं षोडशार्णकः ॥ 22 ॥

गदाद्युदायुधो विष्णुर्मामग्नेर्दिशि रक्षतु ।
ह्रीं श्रीं दशाक्षरो मंत्रो दक्षिणे मां सदाऽवतु ॥ 23 ॥

तारो नमो भगवते रुक्मिणीवल्लभाय च ।
स्वाहेति षोडशार्णोऽयं नैरृत्यां दिशि रक्षतु ॥ 24 ॥

क्लीं हृषीकेश वंशाय नमो मां वारुणोऽवतु ।
अष्टादशार्णः कामांतो वायव्ये मां सदाऽवतु ॥ 25 ॥

श्रीं मायाकामतृष्णाय गोविंदाय द्विको मनुः ।
द्वादशार्णात्मको विष्णुरुत्तरे मां सदाऽवतु ॥ 26 ॥

वाग्भवं कामकृष्णाय ह्रीं गोविंदाय तत्परम् ।
श्रीं गोपीजनवल्लभाय स्वाहा हस्तौ ततः परम् ॥ 27 ॥

द्वाविंशत्यक्षरो मंत्रो मामैशान्ये सदाऽवतु ।
कालीयस्य फणामध्ये दिव्यं नृत्यं करोति तम् ॥ 28 ॥

नमामि देवकीपुत्रं नृत्यराजानमच्युतम् ।
द्वात्रिंशदक्षरो मंत्रोऽप्यधो मां सर्वदाऽवतु ॥ 29 ॥

कामदेवाय विद्महे पुष्पबाणाय धीमहि ।
तन्नोऽनंगः प्रचोदयादेषा मां पातुचोर्ध्वतः ॥ 30 ॥

इति ते कथितं विप्र ब्रह्ममंत्रौघविग्रहम् ।
त्रैलोक्यमंगलं नाम कवचं ब्रह्मरूपकम् ॥ 31 ॥

ब्रह्मणा कथितं पूर्वं नारायणमुखाच्छ्रुतम् ।
तव स्नेहान्मयाऽख्यातं प्रवक्तव्यं न कस्यचित् ॥ 32 ॥

गुरुं प्रणम्य विधिवत्कवचं प्रपठेत्ततः ।
सकृद्द्विस्त्रिर्यथाज्ञानं स हि सर्वतपोमयः ॥ 33 ॥

मंत्रेषु सकलेष्वेव देशिको नात्र संशयः ।
शतमष्टोत्तरं चास्य पुरश्चर्या विधिस्स्मृतः ॥ 34 ॥

हवनादींदशांशेन कृत्वा तत्साधयेद्ध्रुवम् ।
यदि स्यात्सिद्धकवचो विष्णुरेव भवेत्स्वयम् ॥ 35 ॥

मंत्रसिद्धिर्भवेत्तस्य पुरश्चर्या विधानतः ।
स्पर्धामुद्धूय सततं लक्ष्मीर्वाणी वसेत्ततः ॥ 36 ॥

पुष्पांजल्यष्टकं दत्वा मूलेनैव पठेत्सकृत् ।
दशवर्षसहस्राणि पूजायाः फलमाप्नुयात् ॥ 37 ॥

भूर्जे विलिख्य गुलिकां स्वर्णस्थां धारयेद्यदि ।
कंठे वा दक्षिणे बाहौ सोऽपि विष्णुर्न संशयः ॥ 38 ॥

अश्वमेधसहस्राणि वाजपेयशतानि च ।
महादानानि यान्येव प्रादक्षिण्यं भुवस्तथा ॥ 39 ॥

कलां नार्हंति तान्येव सकृदुच्चारणात्ततः ।
कवचस्य प्रसादेन जीवन्मुक्तो भवेन्नरः ॥ 40 ॥

त्रैलोक्यं क्षोभयत्येव त्रैलोक्यविजयी स हि ।
इदं कवचमज्ञात्वा यजेद्यः पुरुषोत्तमम् ।
शतलक्षप्रजप्तोऽपि न मंत्रस्तस्य सिद्ध्यति ॥ 41 ॥

इति श्री नारदपांचरात्रे ज्ञानामृतसारे त्रैलोक्यमंगलकवचम् ।

श्री कृष्ण कवचम् (त्रैलोक्य मंगल कवचम्) एक शक्तिशाली स्तोत्र है, जो भगवान श्रीकृष्ण की कृपा प्राप्त करने और सभी संकटों से बचाव के लिए अत्यंत प्रभावी है। इसका नित्य पाठ करने से जीवन में सुख, शांति और समृद्धि बनी रहती है।

राधा वंदना स्तोत्रम्
श्री राम कवचम्
रुद्राभिषेक स्तोत्रम्
महासरस्वती स्तोत्रम्
श्री गणपति द्वादश नाम स्तोत्रम्
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