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SanatanWeb.com > Blog > गीतकाव्य > कवचम् > सूर्य कवच
कवचम्नवग्रह स्तोत्रस्तोत्र

सूर्य कवच

Sanatani
Last updated: जनवरी 22, 2026 6:26 अपराह्न
Sanatani
Published: जनवरी 22, 2026
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सूर्य कवच

सूर्य कवचम्(surya kavach) एक शक्तिशाली वैदिक स्तोत्र है, जो भगवान सूर्य की कृपा प्राप्त करने और उनकी ऊर्जा से आत्मबल बढ़ाने के लिए पाठ किया जाता है। यह स्तोत्र ऋग्वेद, यजुर्वेद और पुराणों में वर्णित सूर्य उपासना के महत्व को दर्शाता है। सूर्य कवचम् का पाठ करने से व्यक्ति के जीवन में स्वास्थ्य, आत्मविश्वास, सकारात्मक ऊर्जा और सफलता आती है। सूर्य कवचम् का उल्लेख मुख्य रूप से ब्रह्माण्ड पुराण और मार्कण्डेय पुराण में मिलता है। यह स्तोत्र ऋषि-वशिष्ठ, अगस्त्य मुनि और महर्षि कश्यप द्वारा उच्चारित किया गया था।

Contents
  • सूर्य कवच
  • सूर्य कवचम् का महत्त्व
  • सूर्य कवचम् का पाठ करने की विधि
  • || Surya Kavacham ||

सूर्य कवचम् का महत्त्व

भगवान सूर्य को प्रत्यक्ष देवता माना जाता है, क्योंकि वे दृश्य रूप में सभी जीवों को प्रकाश, ऊर्जा और जीवन प्रदान करते हैं। वेदों में सूर्य को परमात्मा का स्वरूप बताया गया है, जो जीवन के हर क्षेत्र में प्रभाव डालते हैं। सूर्य कवचम् का पाठ करने से –

  • आत्मबल एवं मानसिक शांति प्राप्त होती है।
  • शारीरिक दुर्बलता दूर होती है और अच्छे स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है।
  • करियर और व्यवसाय में सफलता मिलती है।
  • सरकारी कार्यों में सफलता और उच्च पद प्राप्ति की संभावनाएँ बढ़ती हैं।
  • कुंडली में सूर्य से संबंधित दोष दूर होते हैं।

सूर्य कवचम् का पाठ करने की विधि

  1. समय – ब्रह्ममुहूर्त (सुबह 4 से 6 बजे) में स्नान करके सूर्योदय से पहले पाठ करना श्रेष्ठ माना जाता है।
  2. आसन – लाल या पीले रंग के आसन पर बैठकर पूर्व दिशा की ओर मुख करके पाठ करें।
  3. दीपक – तांबे के दीपक में घी या तिल के तेल का दीपक जलाएँ।
  4. सूर्य को अर्घ्य – जल में लाल फूल, अक्षत (चावल), गुड़ मिलाकर सूर्य को अर्घ्य दें।
  5. संकल्प – पाठ से पहले अपने उद्देश्य का संकल्प लें और तत्पश्चात पूरे भाव से सूर्य कवचम् का पाठ करें।

|| Surya Kavacham ||

श्रीभैरव उवाच

यो देवदेवो भगवान् भास्करो महसां निधिः ।
गयत्रीनायको भास्वान् सवितेति प्रगीयते ॥ 1 ॥

तस्याहं कवचं दिव्यं वज्रपंजरकाभिधम् ।
सर्वमंत्रमयं गुह्यं मूलविद्यारहस्यकम् ॥ 2 ॥

सर्वपापापहं देवि दुःखदारिद्र्यनाशनम् ।
महाकुष्ठहरं पुण्यं सर्वरोगनिवर्हणम् ॥ 3 ॥

सर्वशत्रुसमूहघ्नं सम्ग्रामे विजयप्रदम् ।
सर्वतेजोमयं सर्वदेवदानवपूजितम् ॥ 4 ॥

रणे राजभये घोरे सर्वोपद्रवनाशनम् ।
मातृकावेष्टितं वर्म भैरवानननिर्गतम् ॥ 5 ॥

ग्रहपीडाहरं देवि सर्वसंकटनाशनम् ।
धारणादस्य देवेशि ब्रह्मा लोकपितामहः ॥ 6 ॥

विष्णुर्नारायणो देवि रणे दैत्यांजिष्यति ।
शंकरः सर्वलोकेशो वासवोऽपि दिवस्पतिः ॥ 7 ॥

ओषधीशः शशी देवि शिवोऽहं भैरवेश्वरः ।
मंत्रात्मकं परं वर्म सवितुः सारमुत्तमम् ॥ 8 ॥

यो धारयेद् भुजे मूर्ध्नि रविवारे महेश्वरि ।
स राजवल्लभो लोके तेजस्वी वैरिमर्दनः ॥ 9 ॥

बहुनोक्तेन किं देवि कवचस्यास्य धारणात् ।
इह लक्ष्मीधनारोग्य-वृद्धिर्भवति नान्यथा ॥ 10 ॥

परत्र परमा मुक्तिर्देवानामपि दुर्लभा ।
कवचस्यास्य देवेशि मूलविद्यामयस्य च ॥ 11 ॥

वज्रपंजरकाख्यस्य मुनिर्ब्रह्मा समीरितः ।
गायत्र्यं छंद इत्युक्तं देवता सविता स्मृतः ॥ 12 ॥

माया बीजं शरत् शक्तिर्नमः कीलकमीश्वरि ।
सर्वार्थसाधने देवि विनियोगः प्रकीर्तितः ॥ 13 ॥

अथ सूर्य कवचं

ॐ अं आं इं ईं शिरः पातु ॐ सूर्यो मंत्रविग्रहः ।
उं ऊं ऋं ॠं ललाटं मे ह्रां रविः पातु चिन्मयः ॥ 14 ॥

~लुं ~लूं एं ऐं पातु नेत्रे ह्रीं ममारुणसारथिः ।
ॐ औं अं अः श्रुती पातु सः सर्वजगदीश्वरः ॥ 15 ॥

कं खं गं घं पातु गंडौ सूं सूरः सुरपूजितः ।
चं छं जं झं च नासां मे पातु यारं अर्यमा प्रभुः ॥ 16 ॥

टं ठं डं ढं मुखं पायाद् यं योगीश्वरपूजितः ।
तं थं दं धं गलं पातु नं नारायणवल्लभः ॥ 17 ॥

पं फं बं भं मम स्कंधौ पातु मं महसां निधिः ।
यं रं लं वं भुजौ पातु मूलं सकनायकः ॥ 18 ॥

शं षं सं हं पातु वक्षो मूलमंत्रमयो ध्रुवः ।
लं क्षः कुक्ष्सिं सदा पातु ग्रहाथो दिनेश्वरः ॥ 19 ॥

ङं ञं णं नं मं मे पातु पृष्ठं दिवसनायकः ।
अं आं इं ईं उं ऊं ऋं ॠं नाभिं पातु तमोपहः ॥ 20 ॥

~लुं ~लूं एं ऐं ॐ औं अं अः लिंगं मेऽव्याद् ग्रहेश्वरः ।
कं खं गं घं चं छं जं झं कटिं भानुर्ममावतु ॥ 21 ॥

टं ठं डं ढं तं थं दं धं जानू भास्वान् ममावतु ।
पं फं बं भं यं रं लं वं जंघे मेऽव्याद् विभाकरः ॥ 22 ॥

शं षं सं हं लं क्षः पातु मूलं पादौ त्रयितनुः ।
ङं ञं णं नं मं मे पातु सविता सकलं वपुः ॥ 23 ॥

सोमः पूर्वे च मां पातु भौमोऽग्नौ मां सदावतु ।
बुधो मां दक्षिणे पातु नैऋत्या गुररेव माम् ॥ 24 ॥

पश्चिमे मां सितः पातु वायव्यां मां शनैश्चरः ।
उत्तरे मां तमः पायादैशान्यां मां शिखी तथा ॥ 25 ॥

ऊर्ध्वं मां पातु मिहिरो मामधस्तांजगत्पतिः ।
प्रभाते भास्करः पातु मध्याह्ने मां दिनेश्वरः ॥ 26 ॥

सायं वेदप्रियः पातु निशीथे विस्फुरापतिः ।
सर्वत्र सर्वदा सूर्यः पातु मां चक्रनायकः ॥ 27 ॥

रणे राजकुले द्यूते विदादे शत्रुसंकटे ।
संगामे च ज्वरे रोगे पातु मां सविता प्रभुः ॥ 28 ॥

ॐ ॐ ॐ उत ॐउऔं ह स म यः सूरोऽवतान्मां भयाद्
ह्रां ह्रीं ह्रुं हहहा हसौः हसहसौः हंसोऽवतात् सर्वतः ।
सः सः सः सससा नृपाद्वनचराच्चौराद्रणात् संकटात्
पायान्मां कुलनायकोऽपि सविता ॐ ह्रीं ह सौः सर्वदा ॥ 29 ॥

द्रां द्रीं द्रूं दधनं तथा च तरणिर्भांभैर्भयाद् भास्करो
रां रीं रूं रुरुरूं रविर्ज्वरभयात् कुष्ठाच्च शूलामयात् ।
अं अं आं विविवीं महामयभयं मां पातु मार्तंडको
मूलव्याप्ततनुः सदावतु परं हंसः सहस्रांशुमान् ॥ 30॥

अथ फलशृतिः

इति श्रीकवचं दिव्यं वज्रपंजरकाभिधम् ।
सर्वदेवरहस्यं च मातृकामंत्रवेष्टितम् ॥ 31 ॥

महारोगभयघ्नं च पापघ्नं मन्मुखोदितम् ।
गुह्यं यशस्करं पुण्यं सर्वश्रेयस्करं शिवे ॥ 32 ॥

लिखित्वा रविवारे तु तिष्ये वा जन्मभे प्रिये ।
अष्टगंधेन दिव्येन सुधाक्षीरेण पार्वति ॥ 33 ॥

अर्कक्षीरेण पुण्येन भूर्जत्वचि महेश्वरि ।
कनकीकाष्ठलेखन्या कवचं भास्करोदये ॥ 34 ॥

श्वेतसूत्रेण रक्तेन श्यामेनावेष्टयेद् गुटीम् ।
सौवर्णेनाथ संवेष्ठ्य धारयेन्मूर्ध्नि वा भुजे ॥ 35 ॥

रणे रिपूंजयेद् देवि वादे सदसि जेष्यति ।
राजमान्यो भवेन्नित्यं सर्वतेजोमयो भवेत् ॥ 36 ॥

कंठस्था पुत्रदा देवि कुक्षिस्था रोगनाशिनी ।
शिरःस्था गुटिका दिव्या राकलोकवशंकरी ॥ 37 ॥

भुजस्था धनदा नित्यं तेजोबुद्धिविवर्धिनी ।
वंध्या वा काकवंध्या वा मृतवत्सा च यांगना ॥ 38 ॥

कंठे सा धारयेन्नित्यं बहुपुत्रा प्रजायये ।
यस्य देहे भवेन्नित्यं गुटिकैषा महेश्वरि ॥ 39 ॥

महास्त्राणींद्रमुक्तानि ब्रह्मास्त्रादीनि पार्वति ।
तद्देहं प्राप्य व्यर्थानि भविष्यंति न संशयः ॥ 40 ॥

त्रिकालं यः पठेन्नित्यं कवचं वज्रपंजरम् ।
तस्य सद्यो महादेवि सविता वरदो भवेत् ॥ 41 ॥

अज्ञात्वा कवचं देवि पूजयेद् यस्त्रयीतनुम् ।
तस्य पूजार्जितं पुण्यं जन्मकोटिषु निष्फलम् ॥ 42 ॥

शतावर्तं पठेद्वर्म सप्तम्यां रविवासरे ।
महाकुष्ठार्दितो देवि मुच्यते नात्र संशयः ॥ 43 ॥

निरोगो यः पठेद्वर्म दरिद्रो वज्रपंजरम् ।
लक्ष्मीवांजायते देवि सद्यः सूर्यप्रसादतः ॥ 44 ॥

भक्त्या यः प्रपठेद् देवि कवचं प्रत्यहं प्रिये ।
इह लोके श्रियं भुक्त्वा देहांते मुक्तिमाप्नुयात् ॥ 45 ॥

इति श्रीरुद्रयामले तंत्रे श्रीदेविरहस्ये
वज्रपंजराख्यसूर्यकवचनिरूपणं त्रयस्त्रिंशः पटलः ॥

सूर्य कवचम् न केवल एक धार्मिक स्तोत्र है बल्कि यह एक वैज्ञानिक रूप से सिद्ध ऊर्जा साधना भी है। इसका नियमित पाठ करने से जीवन में उत्साह, आत्मबल और सफलता प्राप्त होती है। विशेष रूप से जो लोग सरकारी नौकरी, प्रशासनिक पदों, राजनीति, चिकित्सा, शिक्षा, और नेतृत्व से जुड़े हैं, उन्हें इस कवच का पाठ अवश्य करना चाहिए।

“ऊँ घृणि सूर्याय नमः”

दुर्गा शरणागति स्तोत्रम्
कामाख्या कवच
दिवाकर पंचक स्तोत्रम्
रुद्राष्टकम्
राजराजेश्वरी स्तोत्रम्
TAGGED:Surya Kavach benefitsSurya Kavach for healthSurya Kavach lyricsSurya Kavach PDFSurya Kavach意义सूर्य कवचसूर्य कवच मंत्रसूर्य कवच शक्तिःसूर्य देव आराधनासूर्य देव कवच जाप
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