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नवग्रह स्तोत्रस्तोत्र

सप्त सप्ति सप्तक स्तोत्र

Sanatani
Last updated: जनवरी 26, 2026 7:27 अपराह्न
Sanatani
Published: जनवरी 26, 2026
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सप्त सप्ति सप्तक स्तोत्र

सप्त सप्ति सप्तक स्तोत्र(Sapta Sapti Saptaka Stotram) हिंदू धर्म के पवित्र स्तोत्रों में से एक है, जिसका उल्लेख मुख्यतः वेदों और पुराणों में मिलता है। यह स्तोत्र प्राचीन धार्मिक ग्रंथों में भगवान शिव की स्तुति के लिए रचा गया है। जैसा कि इसके नाम से ही स्पष्ट होता है, यह स्तोत्र ‘सप्त’ अर्थात सात के महत्वपूर्ण संयोगों पर आधारित है। ‘सप्त सप्ति’ का अर्थ है सात गुण, सात शक्तियाँ, और ‘सप्तक’ का अर्थ है सातों का समूह।

Contents
  • सप्त सप्ति सप्तक स्तोत्र
    • सप्त तत्व:
  • सप्त सप्ति सप्तक स्तोत्र का महत्त्व
  • सप्त सप्ति सप्तक स्तोत्र के लाभ
    • स्तोत्र का पाठ कैसे करें:
  • सप्त सप्ति सप्तक स्तोत्र
  • सप्त सप्ति सप्तक स्तोत्र पर पूछे जाने वाले प्रश्न
    • 1.u003cstrongu003eसप्त सप्ति सप्तक स्तोत्र क्या है?u003c/strongu003e
    • 2.सप्त सप्ति सप्तक स्तोत्र का पाठ कब और कैसे किया जाता है?
    • 3. u003cstrongu003eसप्त सप्ति सप्तक स्तोत्र का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्त्व क्या है?u003c/strongu003e
    • 4. सप्त सप्ति सप्तक स्तोत्र से कौन-कौन से लाभ होते हैं?
    • 5. u003cstrongu003eसप्त सप्ति सप्तक स्तोत्र का अभ्यास कौन कर सकता है?u003c/strongu003e

इस स्तोत्र का मुख्य उद्देश्य व्यक्ति को शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक शक्ति प्रदान करना है। इसमें सात महत्वपूर्ण तत्वों का वर्णन होता है, जो जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में संतुलन और समृद्धि लाने का कार्य करते हैं। यह स्तोत्र व्यक्ति के मन, शरीर और आत्मा को शुद्ध करता है और उसे भगवान शिव की कृपा का पात्र बनाता है।

सप्त तत्व:

  1. सप्त ऋषि – जो ब्रह्मांड के सृजन में सहायक माने जाते हैं।
  2. सप्त लोक – जो पृथ्वी और उसके विभिन्न आयामों को दर्शाते हैं।
  3. सप्त रंग – इंद्रधनुष के सात रंग जो जीवन में विविधता लाते हैं।
  4. सप्त स्वर – संगीत के सात सुर जो जीवन की ध्वनि और लय का प्रतीक हैं।
  5. सप्त नदियाँ – गंगा, यमुना, सरस्वती जैसी पवित्र नदियाँ, जो जीवनदायिनी मानी जाती हैं।
  6. सप्त अग्नि – अग्नि के सात रूप, जो शुद्धिकरण और सृजन के प्रतीक हैं।
  7. सप्त ग्रह – जो जीवन के विभिन्न पहलुओं को नियंत्रित करते हैं।

सप्त सप्ति सप्तक स्तोत्र का महत्त्व

यह स्तोत्र न केवल व्यक्ति के जीवन में संतुलन लाने में सहायक है, बल्कि यह साधना के माध्यम से व्यक्ति को आध्यात्मिक शांति और मोक्ष प्राप्ति की ओर भी अग्रसर करता है। ऐसा माना जाता है कि नियमित रूप से इस स्तोत्र का जाप करने से जीवन की सभी समस्याओं का समाधान होता है, और व्यक्ति के चारों ओर एक दिव्य ऊर्जा का निर्माण होता है।

सप्त सप्ति सप्तक स्तोत्र के लाभ

  1. मानसिक शांति – यह स्तोत्र मानसिक संतुलन प्रदान करता है और तनाव से मुक्ति दिलाता है।
  2. आध्यात्मिक उन्नति – स्तोत्र का नियमित जाप व्यक्ति को आत्मज्ञान की ओर ले जाता है।
  3. स्वास्थ्य में सुधार – इसके जाप से शारीरिक रोगों का निवारण होता है।
  4. सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह – व्यक्ति के चारों ओर सकारात्मक ऊर्जा का निर्माण होता है, जिससे जीवन में सुख, शांति और समृद्धि आती है।

स्तोत्र का पाठ कैसे करें:

इस स्तोत्र का पाठ करते समय शुद्धता का विशेष ध्यान रखना आवश्यक है। प्रातःकाल में स्नान कर साफ कपड़े पहनकर भगवान शिव के समक्ष दीप जलाकर स्तोत्र का पाठ करना उत्तम माना जाता है। इसे शांत मन से, ध्यानमग्न होकर पढ़ना चाहिए।

सप्त सप्ति सप्तक स्तोत्र

ध्वान्तदन्तिकेसरी हिरण्यकान्तिभासुरः
कोटिरश्मिभूषितस्तमोहरोऽमितद्युतिः।

वासरेश्वरो दिवाकरः प्रभाकरः खगो
भास्करः सदैव पातु मां विभावसू रविः।

यक्षसिद्धकिन्नरादिदेवयोनिसेवितं
तापसैर्मुनीश्वरैश्च नित्यमेव वन्दितम्।

तप्तकाञ्चनाभमर्कमादिदैवतं रविं
विश्वचक्षुषं नमामि सादरं महाद्युतिम्।

भानुना वसुन्धरा पुरैव निमिता तथा
भास्करेण तेजसा सदैव पालिता मही।

भूर्विलीनतां प्रयाति काश्यपेयवर्चसा
तं रवि भजाम्यहं सदैव भक्तिचेतसा।

अंशुमालिने तथा च सप्त-सप्तये नमो
बुद्धिदायकाय शक्तिदायकाय ते नमः।

अक्षराय दिव्यचक्षुषेऽमृताय ते नमः
शङ्खचक्रभूषणाय विष्णुरूपिणे नमः।

भानवीयभानुभिर्नभस्तलं प्रकाशते
भास्करस्य तेजसा निसर्ग एष वर्धते।

भास्करस्य भा सदैव मोदमातनोत्यसौ
भास्करस्य दिव्यदीप्तये सदा नमो नमः।

अन्धकार-नाशकोऽसि रोगनाशकस्तथा
भो ममापि नाशयाशु देहचित्तदोषताम्।

पापदुःखदैन्यहारिणं नमामि भास्करं
शक्तिधैर्यबुद्धिमोददायकाय ते नमः।

भास्करं दयार्णवं मरीचिमन्तमीश्वरं
लोकरक्षणाय नित्यमुद्यतं तमोहरम्।

चक्रवाकयुग्मयोगकारिणं जगत्पतिं
पद्मिनीमुखारविन्दकान्तिवर्धनं भजे।

सप्तसप्तिसप्तकं सदैव यः पठेन्नरो
भक्तियुक्तचेतसा हृदि स्मरन् दिवाकरम्।

अज्ञतातमो विनाश्य तस्य वासरेश्वरो
नीरुजं तथा च तं करोत्यसौ रविः सदा।

सप्त सप्ति सप्तक स्तोत्र पर पूछे जाने वाले प्रश्न

1.u003cstrongu003eसप्त सप्ति सप्तक स्तोत्र क्या है?u003c/strongu003e

सप्त सप्ति सप्तक स्तोत्र एक प्राचीन वैदिक स्तोत्र है जो सप्त सप्तियों के महत्त्व और शक्ति का वर्णन करता है। इसमें सप्तक (सात) स्तोत्रों के माध्यम से विभिन्न देवी-देवताओं की स्तुति की जाती है। यह स्तोत्र भक्तों के लिए आध्यात्मिक उन्नति और कल्याण की प्राप्ति के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण माना जाता है।

2.सप्त सप्ति सप्तक स्तोत्र का पाठ कब और कैसे किया जाता है?

सप्त सप्ति सप्तक स्तोत्र का पाठ शुभ अवसरों, विशेषत: सप्तमी के दिन, और भक्तों की विशेष कामनाओं की पूर्ति के लिए किया जाता है। इसका पाठ सुबह या शाम के समय, शुद्ध मन और शांत वातावरण में किया जाता है। पाठ करने से पहले स्नान कर लेना और साफ वस्त्र धारण करना उचित माना जाता है।

3. u003cstrongu003eसप्त सप्ति सप्तक स्तोत्र का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्त्व क्या है?u003c/strongu003e

सप्त सप्ति सप्तक स्तोत्र का धार्मिक महत्त्व अत्यधिक है क्योंकि यह स्तोत्र सप्त शक्तियों की आराधना का माध्यम है। इसे पढ़ने से व्यक्ति को आंतरिक शांति, सुख-समृद्धि, और आध्यात्मिक जागरूकता प्राप्त होती है। यह स्तोत्र संकटों को दूर करने और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा लाने का स्रोत माना जाता है।

4. सप्त सप्ति सप्तक स्तोत्र से कौन-कौन से लाभ होते हैं?

इस स्तोत्र के नियमित पाठ से मानसिक शांति, आध्यात्मिक विकास, और सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होती है। इसे पढ़ने से व्यक्ति की सभी इच्छाएं पूर्ण हो सकती हैं, और यह भौतिक तथा आध्यात्मिक दोनों स्तरों पर समृद्धि प्रदान करता है। इसके अलावा, यह स्तोत्र जीवन में आने वाले कष्टों और विघ्नों को दूर करने में सहायक होता है।

5. u003cstrongu003eसप्त सप्ति सप्तक स्तोत्र का अभ्यास कौन कर सकता है?u003c/strongu003e

सप्त सप्ति सप्तक स्तोत्र का अभ्यास कोई भी व्यक्ति कर सकता है, चाहे वह किसी भी धर्म या वर्ग से संबंधित हो। इसके लिए केवल श्रद्धा और भक्ति की आवश्यकता होती है। यह स्तोत्र उन सभी के लिए है जो आध्यात्मिक उन्नति, मन की शांति और जीवन में समृद्धि प्राप्त करना चाहते हैं।u003cbru003e

संगीता ज्ञानदा सरस्वती स्तोत्रम्
अनन्त कृष्ण अष्टकम्
सङ्कटनाश विष्णु स्तोत्रम्
कृष्ण स्तुति
कामाख्या कवच
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