चण्डिकाष्टकम्
चण्डिकाष्टकम्(Chandika Ashtaka Stotram) एक प्रसिद्ध स्तोत्र है, जो देवी दुर्गा को समर्पित है। इसे संस्कृत भाषा में रचा गया है और इसमें माता चण्डिका, जो देवी दुर्गा का एक शक्तिशाली रूप हैं, की महिमा का वर्णन किया गया है। चण्डिकाष्टकम् के माध्यम से भक्त देवी से अपने जीवन में आने वाली कठिनाइयों को दूर करने और विजय, साहस, तथा शांति की प्राप्ति के लिए प्रार्थना करते हैं।
चण्डिकाष्टकम् का अर्थ और महत्व
चण्डिका, देवी दुर्गा का एक उग्र और शक्तिशाली रूप है। यह रूप राक्षसों और अधर्म के विनाश के लिए विख्यात है। चण्डिकाष्टकम् में माता की विभिन्न शक्तियों, रूपों और उनकी कृपा का गुणगान किया गया है। यह स्तोत्र भक्तों के जीवन में सकारात्मक ऊर्जा, साहस, और भय को समाप्त करने में सहायक माना जाता है।
“अष्टक” का अर्थ आठ श्लोकों का संग्रह होता है। चण्डिकाष्टकम् में कुल आठ मुख्य श्लोक हैं, जिनमें देवी चण्डिका की शक्ति, गुण, और उनके द्वारा किए गए राक्षसों के वध का वर्णन किया गया है।
ऐसा माना जाता है कि चण्डिकाष्टकम् की रचना अद्वैत वेदांत के प्रसिद्ध संत आदि शंकराचार्य द्वारा की गई थी। उन्होंने इसे रचते समय देवी चण्डिका की अलौकिक शक्ति और भक्ति का वर्णन किया है। यह स्तोत्र “दुर्गा सप्तशती” के साथ जोड़ा जाता है, जो देवी महात्म्य का एक प्रसिद्ध ग्रंथ है।
चण्डिकाष्टकम् ( Chandika Ashtaka Stotram )
सहस्रचन्द्रनित्दकातिकान्तचन्द्रिकाचयै-
दिशोऽभिपूरयद् विदूरयद् दुराग्रहं कलेः।
कृतामलाऽवलाकलेवरं वरं भजामहे
महेशमानसाश्रयन्वहो महो महोदयम्।
विशालशैलकन्दरान्तरालवासशालिनीं
त्रिलोकपालिनीं कपालिनी मनोरमामिमाम्।
उमामुपासितां सुरैरूपास्महे महेश्वरीं
परां गणेश्वरप्रसू नगेश्वरस्य नन्दिनीम्।
अये महेशि ते महेन्द्रमुख्यनिर्जराः समे
समानयन्ति मूर्द्धरागत परागमङ्घ्रिजम्।
महाविरागिशङ्कराऽनुरागिणीं नुरागिणी
स्मरामि चेतसाऽतसीमुमामवाससं नुताम्।
भजेऽमराङ्गनाकरोच्छलत्सुचामरोच्चलन्
निचोललोलकुन्तलां स्वलोकशोकनाशिनीम्।
अदभ्रसम्भृतातिसम्भ्रमप्रभूतविभ्रम-
प्रवृत्तताण्डवप्रकाण्डपण्डितीकृतेश्वराम्।
अपीह पामरं विधाय चामरं तथाऽमरं
नु पामरं परेशिदृग्विभावितावितत्रिके।
प्रवर्तते प्रतोषरोषखेलन तव स्वदोष-
मोषहेतवे समृद्धिमेलनं पदन्नुमः।
भभूव्भभव्भभव्भभाभितोविभासि भास्वर-
प्रभाभरप्रभासितागगह्वराधिभासिनीम्।
मिलत्तरज्वलत्तरोद्वलत्तरक्षपाकर
प्रमूतभाभरप्रभासिभालपट्टिकां भजे।
कपोतकम्बुकाम्यकण्ठकण्ठयकङ्कणाङ्गदा-
दिकान्तकाश्चिकाश्चितां कपालिकामिनीमहम्।
वराङ्घ्रिनूपुरध्वनिप्रवृत्तिसम्भवद् विशेष-
काव्यकल्पकौशलां कपालकुण्डलां भजे।
भवाभयप्रभावितद्भवोत्तरप्रभाविभव्य-
भूमिभूतिभावन प्रभूतिभावुकं भवे।
भवानि नेति ते भवानि पादपङ्कजं भजे
भवन्ति तत्र शत्रुवो न यत्र तद्विभावनम्।
दुर्गाग्रतोऽतिगरिमप्रभवां भवान्या
भव्यामिमां स्तुतिमुमापतिना प्रणीताम्।
यः श्रावयेत् सपुरूहूतपुराधिपत्य
भाग्यं लभेत रिपवश्च तृणानि तस्य।
चण्डिकाष्टकम् का पाठ करने के लाभ
- साहस और शक्ति की प्राप्ति: यह स्तोत्र साहस और आत्मविश्वास बढ़ाने में सहायक है।
- भय और संकट से मुक्ति: देवी चण्डिका की कृपा से जीवन में आने वाले भय और संकट दूर होते हैं।
- शांति और संतोष: नियमित पाठ से मानसिक शांति और संतोष प्राप्त होता है।
- सकारात्मक ऊर्जा: चण्डिकाष्टकम् के पाठ से वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
पाठ की विधि
- पाठ करने से पहले स्नान कर स्वच्छ वस्त्र पहनें।
- देवी दुर्गा या चण्डिका की मूर्ति या चित्र के सामने दीपक और अगरबत्ती जलाएं।
- शांत मन से चण्डिकाष्टकम् का पाठ करें।
- पाठ के बाद देवी को फूल और नैवेद्य अर्पित करें।
नवरात्रि के पवित्र पर्व पर चण्डिकाष्टकम् का विशेष महत्व है। भक्तगण इसे नौ दिनों तक नियमित रूप से पढ़ते हैं। यह माना जाता है कि नवरात्रि के दौरान देवी चण्डिका की कृपा से सभी प्रकार की बाधाएं दूर हो जाती हैं और जीवन में सुख-समृद्धि आती है।
चण्डिकाष्टकम् से संबंधित अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न और उनके उत्तर
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चण्डिकाष्टकम् क्या है?
चण्डिकाष्टकम् देवी चण्डिका की स्तुति में रचित एक संस्कृत स्तोत्र है, जिसमें उनकी महिमा, शक्ति और कृपा का वर्णन किया गया है।
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चण्डिकाष्टकम् का पाठ करने से क्या लाभ होता है?
चण्डिकाष्टकम् का पाठ करने से साधक को मानसिक शांति, भय से मुक्ति, और देवी की कृपा प्राप्त होती है। यह जीवन में साहस और सकारात्मक ऊर्जा लाता है।
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चण्डिकाष्टकम् का पाठ किस समय करना चाहिए?
चण्डिकाष्टकम् का पाठ प्रातःकाल या संध्या के समय, शुद्ध मन और पवित्र स्थान पर करना उचित माना जाता है।
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चण्डिकाष्टकम् में कितने श्लोक हैं?
चण्डिकाष्टकम् में कुल आठ श्लोक हैं, जो देवी चण्डिका की स्तुति करते हैं।
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चण्डिकाष्टकम् का मुख्य उद्देश्य क्या है?
चण्डिकाष्टकम् का मुख्य उद्देश्य देवी चण्डिका की आराधना करके उनके आशीर्वाद से साधक के जीवन में सुख, समृद्धि और शक्ति प्राप्त करना है।



