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SanatanWeb.com > Blog > गीतकाव्य > स्तोत्र > सरस्वती स्तोत्र > त्रिपुरा भारती स्तोत्रम्
सरस्वती स्तोत्रस्तोत्र

त्रिपुरा भारती स्तोत्रम्

Sanatani
Last updated: फ़रवरी 11, 2026 7:01 अपराह्न
Sanatani
Published: फ़रवरी 11, 2026
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त्रिपुरा भारती स्तोत्रम्

त्रिपुरा भारती स्तोत्रम् एक अत्यंत प्रभावशाली और स्तुतिपरक स्तोत्र है, जो देवी त्रिपुरा भारती (सरस्वती के अद्वितीय रूप) की स्तुति में रचा गया है। यह स्तोत्र अद्वैत वेदांत के महान आचार्य श्री आदि शंकराचार्य द्वारा रचित माना जाता है। इसमें देवी भारती की उपासना के माध्यम से ज्ञान, वाणी, बुद्धि और आध्यात्मिक उत्थान की प्रार्थना की जाती है।

Contents
  • त्रिपुरा भारती स्तोत्रम्
  • त्रिपुरा भारती स्तोत्रम् –Tripura Bharati Stotram
  • त्रिपुरा भारती स्तोत्रम् का पाठ कब और क्यों करें
  • देवी त्रिपुरा भारती की उपासना से लाभ:

यहाँ “त्रिपुरा” शब्द का अर्थ है तीन अवस्थाओं – जाग्रत (जाग्रति), स्वप्न (स्वप्न अवस्था) और सुषुप्ति (गहरी नींद) – में व्यापक देवी, और “भारती” का अर्थ है वाणी या विद्या की अधिष्ठात्री देवी। इस प्रकार, त्रिपुरा भारती ज्ञान और चेतना की वह दिव्य शक्ति हैं, जो सम्पूर्ण त्रिलोक में विद्यमान है और सभी प्राणियों में वाणी, विवेक तथा आत्मज्ञान प्रदान करती हैं।

त्रिपुरा भारती स्तोत्रम् –Tripura Bharati Stotram

ऐन्द्रस्येव शरासनस्य दधती मध्ये ललाटं प्रभां
शौक्लीं कान्तिमनुष्णगोरिव शिरस्यातन्वती सर्वतः ।
एषाऽसौ त्रिपुरा हृदि द्युतिरिवोष्णांशोः सदाहःस्थिता
छिन्द्यान्नः सहसा पदैस्त्रिभिरघं ज्योतिर्मयी वाङ्मयी ॥

या मात्रा त्रपुसीलतातनुलसत्तन्तूत्थितिस्पर्द्धिनी
वाग्बीजे प्रथमे स्थिता तव सदा तां मन्महे ते वयम् ।
शक्तिः कुण्डलिनीति विश्वजननव्यापारबद्धोद्यमा
ज्ञात्वेत्थं न पुनः स्पृशन्ति जननीगर्भेऽर्भकत्वं नराः ॥

दृष्ट्वा सम्भ्रमकारि वस्तु सहसा ऐ ऐ इति व्याहृतं
येनाकूतवशादपीह वरदे बिन्दुं विनाऽप्यक्षरम् ।
तस्यापि ध्रुवमेव देवि तरसा जाते तवाऽनुग्रहे
वाचः सूक्तिसुधारसद्रवमुचो निर्यान्ति वक्त्राम्बुजात् ॥

यन्नित्ये तव कामराजमपरं मन्त्राक्षरं निष्कलं
तत् सारस्वतमित्यवैति विरलः कश्चिद् बुधश्चेद् भुवि ।
आख्यानं प्रतिपर्व सत्यतपसो यत्कीर्तयन्तो द्विजाः
प्रारम्भे प्रणवास्पदं प्रणयितां नीत्वोच्चरन्ति स्फुटम् ॥

यत्सद्यो वचसां प्रवृत्तिकरणे दृष्टप्रभावं बुधै-
स्तार्तीयीकमहं नमामि मनसा तद्बीजमिन्दुप्रभम् ।
अस्त्वौर्वोऽपि सरस्वतीमनुगतो जाड्याम्बुविच्छित्तये
गौःशब्दो गिरि वर्तते स नियतं योगं विना सिद्धिदः ॥

एकैकं तव देवि बीजमनघं सव्यञ्जनाव्यञ्जनं
कूटस्थं यदि वा पृथक्क्रमगतं यद्वा स्थितं व्युत्क्रमात् ।
यं यं काममपेक्ष्य येन विधिना केनापि वा चिन्तितं
जप्तं वा सफलीकरोति तरसा तं तं समस्तं नृणाम् ॥

वामे पुस्तकधारिणीमभयदां साक्षस्रजं दक्षिणे
भक्तेभ्यो वरदानपेशलकरां कर्पूरकुन्दोज्ज्वलाम् ।
उज्जृम्भाम्बुजपत्रकान्तनयनस्निग्धप्रभालोकिनीं
ये त्वामम्ब न शीलयन्ति मनसा तेषां कवित्वं कुतः ॥

ये त्वां पाण्डुरपुण्डरीकपटलस्पष्टाभिरामप्रभां
सिञ्चन्तीममृतद्रवैरिव शिरो ध्यायन्ति मूर्ध्नि स्थिताम् ।
अश्रान्तं विकटस्फुटाक्षरपदा निर्याति वक्त्राम्बुजात्
तेषां भारति भारती सुरसरित्कल्लोललोलोर्म्मिभिः ॥

ये सिन्दूरपरागपुञ्जपिहितां त्वत्तेजसा द्यामिमा-
मुर्वी चापि विलीनयावकरसप्रस्तारमग्नामिव ।
पश्यन्ति क्षणमप्यनन्यमनसस्तेषामनङ्गज्वर-
क्लान्तास्त्रस्तकुरङ्गशावकदृशो वश्या भवन्ति स्त्रियः ॥

चञ्चत्काञ्चनकुण्डलाङ्गदधरामाबद्धकाञ्चीस्रजं
ये त्वां चेतसि तद्गते क्षणमपि ध्यायन्ति कृत्वा स्थिरम् ।
तेषां वेश्मनि विभ्रमादहरहः स्फारी भवन्त्यश्चिराद्
माद्यत्कुञ्जरकर्णतालतरलाः स्थैर्यं भजन्ते श्रियः ॥

आर्भट्या शशिखण्डमण्डितजटाजूटां नृमुण्डस्रजं
बन्धूकप्रसवारुणाम्बरधरां प्रेतासनाध्यासिनीम् ।
त्वां ध्यायन्ति चतुर्भुजां त्रिनयनामापीनतुङ्गस्तनीं
मध्ये निम्नवलित्रयाङ्किततनुं त्वद्रूपसम्पत्तये ॥

जातोऽप्यल्पपरिच्छदे क्षितिभृतां सामान्यमात्रे कुले
निःशेषावनिचक्रवर्तिपदवीं लब्ध्वा प्रतापोन्नतः ।
यद्विद्याधरवृन्दवन्दितपदः श्रीवत्सराजोऽभवद्
देवि त्वच्चरणाम्बुजप्रणतिजः सोऽयं प्रसादोदयः ॥

चण्डि त्वच्चरणाम्बुजार्चनकृते बिल्वीदलोल्लुण्टन-
त्रुट्यत्कण्टककोटिभिः परिचयं येषां न जग्मुः कराः ।
ते दण्डाङ्कुशचक्रचापकुलिशश्रीवत्समत्स्याङ्कितै-
र्जायन्तेपृथिवीभुजः कथमिवाम्भोजप्रभैः पाणिभिः ॥

विप्राः क्षोणिभुजो विशस्तदितरे क्षीराज्यमध्वैक्षवै
स्त्वां देवि त्रिपुरे परापरकलां सन्तर्प्य पूजाविधौ ।
यां यां प्रार्थयते मनः स्थिरधियां तेषां त एव ध्रुवं
तां तां सिद्धिमवाप्नुवन्ति तरसा विघ्नैरविघ्नीकृता ॥

शब्दानां जननी त्वमत्र भुवने वाग्वादिनीत्युच्यसे
त्वत्तः केशववासवप्रभृतयोऽप्याविर्भवन्ति ध्रुवम् ।
लीयन्ते खलु यत्र कल्पविरतौ ब्रह्मादयस्तेऽप्यमी
सा त्वं काचिदचिन्त्यरूपमहिमा शक्तिः परा गीयसे ॥

देवानां त्रितयं त्रयी हुतभुजां शक्तित्रयं त्रिस्वरा
स्त्रैलोक्यं त्रिपदी त्रिपुष्करमथ त्रिब्रह्म वर्णास्त्रयः ।
यत्किञ्चिज्जगति त्रिधा नियमितं वस्तु त्रिवर्गादिकं
तत्सर्वं त्रिपुरेति नाम भगवत्यन्वेति ते तत्त्वतः ॥

लक्ष्मीं राजकुले जयां रणमुखे क्षेमङ्करीमध्वनि
क्रव्यादद्विपसर्पभाजि शबरीं कान्तारदुर्गे गिरौ ।
भूतप्रेतपिशाचजृम्भकभये स्मृत्वा महाभैरवीं
व्यामोहे त्रिपुरां तरन्ति विपदस्तारां च तोयप्लवे ॥

माया कुण्डलिनी क्रिया मधुमती काली कलामालिनी
मातङ्गी विजया जया भगवती देवी शिवा शाम्भवी ।
शक्तिः शङ्करवल्लभा त्रिनयना वाग्वादिनी भैरवी
ह्रीङ्कारी त्रिपुरा परापरमयी माता कुमारीत्यसि ॥

आ ई पल्लवितैः परस्परयुतैर्द्वित्रिक्रमाद्यक्षरैः
काद्यैः क्षान्तगतैः स्वरादिभिरथ क्षान्तैश्च तैः सस्वरैः ।
नामानि त्रिपुरे भवन्ति खलु यान्यत्यन्तगुह्यानि ते
तेभ्यो भैरवपत्नि विंशतिसहस्रेभ्यः परेभ्यो नमः ॥

बोद्धव्या निपुणं बुधैस्तुतिरियं कृत्वा मनस्तद्गतं
भारत्यास्त्रिपुरेत्यनन्यमनसो यत्राद्यवृत्ते स्फुटम् ।
एकद्वित्रिपदक्रमेण कथितस्तत्पादसङ्ख्याक्षरै-
र्मन्त्रोद्धारविधिर्विशेषसहितः सत्संप्रदायान्वितः ॥

सावद्यं निरवद्यमस्तु यदि वा किंवाऽनया चिन्तया
नूनं स्तोत्रमिदं पठिष्यति जनो यस्यास्ति भक्तिस्त्वयि ।
सञ्चिन्त्यापि लघुत्वमात्मनि दृढं सञ्जायमानं हठात्
त्वद्भक्त्या मुखरीकृतेन रचितं यस्मान्मयापि ध्रुवम् ॥

त्रिपुरा भारती स्तोत्रम् का पाठ कब और क्यों करें

  • विद्या आरंभ के समय (विशेषकर विद्यार्थी)
  • बुद्धि, स्मरण शक्ति, वाणी में सुधार हेतु
  • सांस्कृतिक और संगीत साधना में सिद्धि हेतु
  • शुद्ध वाणी और तर्कशक्ति हेतु
  • प्रभु के साथ जुड़ने व आत्मानुभूति के लिए

नवरात्रि, वसंत पंचमी और शरद पूर्णिमा पर इसका पाठ विशेष फलदायक माना गया है।

देवी त्रिपुरा भारती की उपासना से लाभ:

  1. वाणी में माधुर्य और प्रभावशीलता आती है।
  2. वाक् सिद्धि प्राप्त होती है – अर्थात जो बोले वह सत्य हो।
  3. मनःशक्ति और निर्णय क्षमता बढ़ती है।
  4. संगीत, लेखन, शिक्षण, कला, वक्तृत्व जैसे क्षेत्रों में उन्नति होती है।
  5. ध्यान करने वालों को आत्मज्ञान की अनुभूति होती है।
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