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शिव स्तोत्रस्तोत्र

चरणशृङ्गरहित नटराजस्तोत्रम् – श्री पतंजलिकृतम्

Sanatani
Last updated: जनवरी 29, 2026 5:24 अपराह्न
Sanatani
Published: जनवरी 29, 2026
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चरणशृङ्गरहित नटराजस्तोत्रम् – श्री पतंजलिकृतम्

सदञ्चितमुदञ्चित निकुञ्चितपदम् झलझलच्चलितमञ्जुकटकम्
पतञ्जलिदृगञ्जनमनञ्जनमचञ्चलपदम् जननभञ्जनकरम् ।
कदम्बरुचिमम्बरवसम् परममम्बुदकदम्बकविडम्बकगलम्
चिदम्बुधिमणिम् बुधहृदम्बुजरविम् परचिदम्बरनटम् हृदि भज ॥१॥

हरम् त्रिपुरभञ्जनमनन्तकृतकङ्कणमखण्डदयमन्तरहितम्
विरिञ्चिसुरसम्हतिपुरन्दरविचिन्तितपदम् तरुणचन्द्रमकुटम् ।
परम्पदविखण्डितयमम् भसितमण्डिततनुम् मदनवञ्चनपरम्
चिरन्तनममुम् प्रणवसञ्चितनिधिम् परचिदम्बरनटम् हृदि भज ॥२॥

अवन्तमखिलम् जगदभङ्गगुणतुङ्गममतम् धृतविधुम् सुरसरि-
त्तरङ्गनिकुरम्बधृतिलम्पटजटम् शमनडम्भसुहरम् भवहरम् ।
शिवम् दशदिगन्तरविजृम्भितकरम् करलसन्मृगशिशुम् पशुपतिम्
हरम् शशिधनञ्जयपतङ्गनयनम् परचिदम्बरनटम् हृदि भज ॥३॥

अनन्तनवरत्नविलसत् कटककिङ्किणी झलम् झलझलम् झलरवम्
मुकुन्दविधिहस्तगतमद्दललयध्वनि धिमिद्धिमित नर्तनपदम् ।
शकुन्तरथ बर्हिरथ नन्दिमुख भृङ्गिरिटि सङ्घनिकटम्
सनन्दसनकप्रमुखवन्दितपदम् परचिदम्बरनटम् हृदि भज ॥४॥

अनन्तमहसं त्रिदशवन्द्यचरणम् मुनिहृदन्तरवसन्तममलम्
कबन्धवियदिन्द्ववनिगन्धवहवह्निमखबन्धुरविमञ्जुवपुषम् ।
अनन्तविभवं त्रिजगदन्तरमणिम् त्रिणयनम् त्रिपुरखण्डनपरम्
सनन्दमुनिवन्दितपदम् सकरुणम् परचिदम्बरनटम् हृदि भज ॥५॥

अचिन्त्यमणिबृन्दरुचिबन्धुरगलम् कुरितकुन्दनिकुरुम्बधवलम्
मुकुन्दसुरबृन्दबलहन्तृकृतवन्दनलसन्तमहिकुण्डलधरम् ।
अकम्पमनुकम्पितरतिम् सुजनमङ्गलनिधिम् गजहरम् पशुपतिम्
धनञ्जयनुतम् प्रणतरञ्जनपरम् परचिदम्बरनटम् हृदि भज ॥६॥

परम् सुरवरम् पुरहरम् पशुपतिम् जनितदन्तिमुखषण्मुखममुम्
मृडम् कनकपिङ्गलजटम् सनकपङ्कजरविम् सुमनसम् हिमरुचिम् ।
असंगमनसम् जलधिजन्मगरलम्कबलयन्तमतुलम्गुणनिधिम्
सनन्दवरदम् शमितमिन्दुवदनं प परचिदम्बरनटम् हृदि भज ॥७॥

अजं क्षितिरथम् भुजङ्गपुङ्गवगुणम् कनकशृङ्गिधनुषम्
करलसत्कुरङ्गपृथुटङ्कपरशुम् रुचिरकुङ्कुमरुचिम् डमरुकम् च दधतम् ।
मुकुन्दविशिखम् नमदवन्ध्यफलदम् निगमवृन्दतुरगम् निरुपमम्
सचण्डिकममुम् झटिति सम्हृतपुरम् परचिदम्बरनटम् हृदि भज ॥८॥

अनङ्गपरिपन्थिनमजं क्षितिधुरन्धरमलम्करुणयन्तमखिलम्
ज्वलन्तमनलम् दधतमन्तकरिपुम् सततमिन्द्रसुरवन्दितपदम् ।
उदञ्चदरविन्दकुलबन्धुशतबिम्बरुचिसम्हति सुगन्धि वपुषम्
पतञ्जलिनुतम् प्रणवपञ्जरशुकम् परचिदम्बरनटम् हृदि भज ॥९॥

इति स्तवममुं भुजगपुङ्गवकृतम् प्रतिदिनम् पठति यः कृतमुखः
सदः प्रभु पदद्वितय दर्शनपदम् सुललितम् चरणशृङ्गरहितम् ।
सरः प्रभवसंभव हरित्पति हरिप्रमुख दिव्यनुत शङ्करपदम्
स गच्छति परम् न तु जनुर्जलनिधिम् परमदुःखजनकम् दुरितदम् ॥१०॥

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