108 उपनिषद: भारतीय आध्यात्मिक ज्ञान का सर्वोच्च शिखर
भारतीय वैदिक साहित्य के विशाल महासागर में उपनिषद वह दिव्य मोती हैं जिनमें आध्यात्मिक ज्ञान का सर्वोच्च सार समाहित है। ये केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं हैं, बल्कि मानव चेतना के उत्कर्ष और परम सत्य की खोज की अद्भुत यात्रा हैं। उपनिषदों को समझना ब्रह्मांड के रहस्यों को समझने के समान है, जहां आत्मा और परमात्मा के बीच का शाश्वत संबंध प्रकट होता है।
- 108 उपनिषद: भारतीय आध्यात्मिक ज्ञान का सर्वोच्च शिखर
- उपनिषद का वास्तविक अर्थ और महत्व
- उपनिषद शब्द की व्युत्पत्ति और गहन अर्थ
- महान विभूतियों द्वारा उपनिषदों की महत्ता की स्वीकृति
- उपनिषदों के स्रोत और उनकी संख्या का रहस्य
- उपनिषदों के रचनाकाल का निर्धारण
- उपनिषदों की अद्भुत शैली और प्रस्तुति
- उपनिषदों का भाव और भाषा का अद्भुत समन्वय
- १०८ उपनिषद् Part 1
- १०८ उपनिषद् Part 2
उपनिषद का वास्तविक अर्थ और महत्व
‘वेद’ शब्द ‘ज्ञान’ या ‘बोध’ का प्रतीक है। वैदिक विद्वानों और ऋषि-मुनियों ने संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद – इन चारों भागों के समन्वय को संपूर्ण वेद की संज्ञा दी है। उपनिषदों को ‘वेदांत’ कहा जाता है क्योंकि ये वेदों का अंतिम, सर्वोच्च और सबसे गूढ़ भाग हैं। यह नाम इसलिए भी सार्थक है क्योंकि ‘अंत’ शब्द यहां केवल समाप्ति का नहीं, बल्कि चरम लक्ष्य और सार तत्व का भी बोध कराता है। भारतीय दार्शनिक परंपरा में प्रसिद्ध ‘प्रस्थान-त्रयी’ में उपनिषद आदि और मूल ग्रंथ हैं, जबकि अन्य दो महत्वपूर्ण ग्रंथ – भगवद्गीता और ब्रह्मसूत्र – उपनिषदों पर ही आधारित और आश्रित हैं। उपनिषदों को एक आध्यात्मिक मानसरोवर के रूप में देखा जा सकता है, जिससे ज्ञान की अनगिनत पवित्र धाराएं प्रवाहित होकर इस पुण्यभूमि में मानवता के भौतिक उत्थान और आध्यात्मिक कल्याण का मार्ग प्रशस्त करती हैं।
उपनिषद शब्द की व्युत्पत्ति और गहन अर्थ
‘उपनिषद’ शब्द की व्युत्पत्ति अत्यंत गहन और बहुआयामी है। इस शब्द में ‘उप’ और ‘नि’ दो उपसर्ग जुड़े हैं, और ‘सद्’ धातु का प्रयोग किया गया है। संस्कृत व्याकरण में ‘सद्’ धातु का उपयोग मुख्यतः ‘गति’ के अर्थ में होता है। ‘गति’ शब्द तीन महत्वपूर्ण संदर्भों में प्रयुक्त होता है – ज्ञान की प्राप्ति, गमन या आवागमन, और अंतिम लक्ष्य की उपलब्धि। इन तीनों में से यहां ‘प्राप्ति’ का अर्थ सबसे अधिक प्रासंगिक और सटीक है।
प्राचीन संस्कृत ग्रंथों में एक सुंदर व्याख्या मिलती है: “उप सामीप्येन, नि-नितरां, प्राप्नुवन्ति परं ब्रह्म यया विद्यया सा उपनिषद्।” इसका अर्थ है कि जिस विशिष्ट विद्या के माध्यम से परब्रह्म का सामीप्य, उसकी निकटता और उसके साथ पूर्ण तादात्म्य प्राप्त किया जाता है, वही ‘उपनिषद’ है। दूसरे शब्दों में कहें तो ‘उप’ और ‘नि’ उपसर्गों के साथ ‘सद्’ धातु में ‘क्विप्’ प्रत्यय जोड़कर ‘उपनिषद’ शब्द की रचना हुई है।
संस्कृत व्याकरण के अनुसार ‘सद्’ धातु के तीन प्रमुख अर्थ स्वीकार किए गए हैं: पहला, विशरण अर्थात विनाश या नाश करना; दूसरा, गति जिसका अर्थ ज्ञान प्राप्ति और उपलब्धि है; और तीसरा, अवसादन यानी शिथिल करना या कमजोर बनाना। इस व्युत्पत्ति के आधार पर उपनिषद का समग्र अर्थ यह होता है: “वह विद्या जो पाप और ताप का विनाश करे, सच्चे और शाश्वत ज्ञान को प्रदान करे, आत्मा की प्रत्यक्ष प्राप्ति कराए और अज्ञान तथा अविद्या के बंधनों को शिथिल करके नष्ट कर दे, वही उपनिषद है।”
पाणिनि की प्रसिद्ध अष्टाध्यायी में सूत्र संख्या एक-चार-उनासी (१.४.७९) में ‘जीविकोपनिषदा-वौपम्ये’ सूत्र के अनुसार उपनिषद शब्द का प्रयोग परोक्ष, गुप्त या रहस्यमय अर्थ में किया गया है। महान राजनीतिशास्त्री कौटिल्य ने अपने विश्व प्रसिद्ध अर्थशास्त्र में युद्धकालीन गुप्त रणनीतियों और गोपनीय प्रयोगों की चर्चा करते समय ‘औपनिषद प्रयोग’ शब्द का व्यवहार किया है। इससे यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि उपनिषद शब्द का तात्पर्य गूढ़ रहस्य और गुप्त ज्ञान से भी है।
संस्कृत के प्रसिद्ध कोशग्रंथ अमरकोष में भी कहा गया है: “धर्मे रहस्युपनिषत् स्यात्” अर्थात उपनिषद शब्द गूढ़ धर्म, रहस्यमय तत्वज्ञान और गुह्य विद्या के अर्थ में प्रयुक्त होता है। इस आधार पर हम उपनिषदों को परोक्ष या रहस्यात्मक ज्ञान के अमूल्य स्रोत भी मान सकते हैं।
अनेक विद्वानों ने ‘उपनिषद’ शब्द की व्युत्पत्ति एक और दृष्टिकोण से समझाई है: ‘उप’ का अर्थ है सामीप्य या व्यवधान रहित निकटता, ‘नि’ का अर्थ है विशिष्ट या संपूर्ण, और ‘सद्’ का अर्थ है ज्ञान या बोध। इस प्रकार उपनिषद का अर्थ हुआ ‘सामीप्य द्वारा प्राप्त विशिष्ट बोध’ अथवा ‘व्यवधान रहित संपूर्ण ज्ञान’। उपनिषदों में जिस अलौकिक और परम ज्ञान की अभिव्यक्ति हुई है, उसे निश्चित रूप से इन विशेषणों से युक्त कहा जा सकता है।
एक अन्य महत्वपूर्ण मत के अनुसार: ‘उपनिषद्यते प्राप्यते ब्रह्मात्मभावोऽनया इति उपनिषद्।’ अर्थात जिस विद्या से ब्रह्म का साक्षात्कार, आत्मा का परमात्मा के साथ एकत्व और परम तत्व की प्रत्यक्ष अनुभूति की जा सके, वही उपनिषद है। इसका तात्पर्य यह है कि उपनिषदों में ब्रह्मज्ञान, आत्मज्ञान, तत्वज्ञान और ब्रह्मविद्या का ही मुख्य रूप से विवेचन किया गया है। इसीलिए उपनिषदों को अध्यात्म विद्या भी कहा जाता है। ब्रह्मज्ञान, आत्मज्ञान, तत्वज्ञान और ब्रह्मविद्या – ये सभी पर्यायवाची शब्द हैं जो एक ही परम सत्य की ओर संकेत करते हैं।

महान विभूतियों द्वारा उपनिषदों की महत्ता की स्वीकृति
भारतीय और पाश्चात्य दोनों ही परंपराओं के विद्वानों, दार्शनिकों और आध्यात्मिक गुरुओं ने उपनिषदों की महानता को मुक्त कंठ से स्वीकार किया है। स्वामी विवेकानंद, जिन्होंने भारतीय अध्यात्म को विश्व पटल पर स्थापित किया, ने अपने एक प्रभावशाली प्रवचन में कहा था: “जब मैं उपनिषदों को पढ़ता हूं, तो मेरे आंसू अनायास ही बहने लगते हैं। यह कितना महान और अद्वितीय ज्ञान है! हमारे लिए यह अत्यंत आवश्यक है कि हम उपनिषदों में सन्निहित तेजस्विता, शक्ति और दिव्य चेतना को अपने दैनिक जीवन में विशेष रूप से धारण करें। हमें शक्ति चाहिए, सच्ची आंतरिक शक्ति। इस शक्ति के बिना जीवन में कोई वास्तविक उन्नति संभव नहीं है। यह अलौकिक शक्ति कहां से प्राप्त हो सकती है? उपनिषदें ही शक्ति की अक्षय खानें हैं। इनमें ऐसी दिव्य शक्ति भरी पड़ी है जो संपूर्ण विश्व को बल, शौर्य, साहस और नवजीवन प्रदान कर सकती है।”
स्वामी विवेकानंद आगे कहते हैं: “उपनिषदें किसी एक देश, जाति, मत या संप्रदाय तक सीमित नहीं हैं। ये किसी भी भेदभाव के बिना हर दीन, दुर्बल, दुखी और दलित प्राणी को पुकार-पुकारकर कहती हैं – उठो, जागो, अपने पैरों पर खड़े हो जाओ और सभी बंधनों को काट डालो। शारीरिक स्वाधीनता, मानसिक स्वतंत्रता और आध्यात्मिक मुक्ति – यही उपनिषदों का मूल मंत्र और सार संदेश है।”
स्वामी विवेकानंद ने उपनिषद-ज्ञान की आवश्यकता को केवल ब्रह्म प्राप्ति या मोक्ष के लिए ही नहीं, बल्कि दैनिक जीवन के संघर्षों और चुनौतियों का सामना करने के लिए भी अत्यंत उपयोगी बताया है। उनका स्पष्ट कथन है कि उपनिषदें वह आंतरिक शक्ति प्रदान करती हैं जिसके द्वारा मनुष्य जीवन-संग्राम का धैर्य, साहस और दृढ़ता से मुकाबला कर सकता है। जीवन का प्रत्येक क्षेत्र चाहे वह आध्यात्मिक हो या भौतिक, सामाजिक हो या व्यक्तिगत – दोनों में उपनिषदों की शिक्षाएं अत्यंत आवश्यक और प्रासंगिक हैं।
उपनिषदों के स्रोत और उनकी संख्या का रहस्य
उपनिषदों की प्राप्ति के स्रोत के विषय में यदि कोई एक निश्चित बात कही जा सकती है, तो वह यही है कि इनका उद्भव प्राचीन ऋषियों और द्रष्टाओं के गहन अनुभूति जन्य ज्ञान से हुआ है। ये ऋषि केवल पुस्तकीय ज्ञान के विद्वान नहीं थे, बल्कि वे साक्षात द्रष्टा थे जिन्होंने गहन ध्यान, तपस्या और आत्मसाक्षात्कार के माध्यम से परम सत्य का प्रत्यक्ष अनुभव किया था। जैसा कि पहले उल्लेख किया गया है, उपनिषदों को वेद के ब्राह्मण और आरण्यक प्रभाग के अंतर्गत माना जाता है।
कुछ उपनिषदें वैदिक संहिता के मंत्र भाग, ब्राह्मण और आरण्यक की अंगभूता या अंशभूता हैं। ये उन महान ग्रंथों का अभिन्न हिस्सा हैं। जबकि अधिकांश उपनिषदें वैदिक और उत्तर वैदिक काल के महान ऋषियों के प्रातिभ चक्षु से दृष्ट हैं, जिनका स्वतंत्र अस्तित्व है। उदाहरण के लिए, ‘ऐतरेयोपनिषद’ ऋग्वेद के ऐतरेय आरण्यक का भाग है, विशेष रूप से द्वितीय आरण्यक के चौथे, पांचवें और छठे अध्याय। इसी प्रकार ‘तैत्तिरीय उपनिषद’ कृष्ण यजुर्वेद के तैत्तिरीय आरण्यक का भाग है, जो सातवें और आठवें प्रपाठक में मिलता है। उसी आरण्यक का अंतिम दसवां प्रपाठक ‘नारायणोपनिषद’ कहलाता है, जो अथर्ववेदीय महानारायणोपनिषद से भिन्न और अलग है।
शुक्ल यजुर्वेदीय शतपथ ब्राह्मण के अंतिम चौदहवें काण्ड के अंतिम छः अध्यायों को ‘बृहदारण्यकोपनिषद’ कहा गया है। यह ब्राह्मण ग्रंथ का वह विशिष्ट भाग है जो आरण्यक भी है और उपनिषद भी है, जो इसकी बहुआयामी प्रकृति को दर्शाता है। इसी प्रकार प्रसिद्ध ‘ईशावास्योपनिषद’ या ‘ईशोपनिषद’ यजुर्वेद की माध्यंदिन और काष्व दोनों शाखाओं की संहिताओं का चालीसवां अध्याय है।
सामवेद की कौथुमी शाखा के तलवकार ब्राह्मण ग्रंथ के अंतिम भागों, विशेष रूप से तैंतीसवें से चालीसवें अध्यायों तक, को ‘छान्दोग्योपनिषद’ कहा गया है। ऋग्वेदीय ‘कौषीतकि’ या ‘शाङ्खायन आरण्यक’ के तीसरे से छठे अध्यायों को ‘कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद’ या ‘कौषीतकि उपनिषद’ के नाम से जाना जाता है।
मुक्तिकोपनिषद, जो स्वयं एक महत्वपूर्ण उपनिषद है, के श्लोक क्रमांक तीस से उनतालीस तक में एक सौ आठ उपनिषदों की विस्तृत सूची प्रस्तुत की गई है। इन एक सौ आठ उपनिषदों में से ऋग्वेद से संबंधित दस उपनिषदें हैं, शुक्ल यजुर्वेद से उन्नीस उपनिषदें, कृष्ण यजुर्वेद से बत्तीस उपनिषदें, सामवेद से सोलह उपनिषदें और अथर्ववेद से इकतीस उपनिषदें जुड़ी हुई बताई गई हैं। मुक्तिकोपनिषद में चारों वेदों की असंख्य शाखाओं की संख्या का उल्लेख करते हुए यह भी कहा गया है कि प्रत्येक शाखा की अपनी एक-एक उपनिषद होती है।
मुक्तिकोपनिषद में कहा गया है: “ऋग्वेदादिविभागेन वेदाश्चत्वार ईरिताः। तेषां शाखा ह्यनेकाः स्युस्तासूपनिषदस्तथा॥” अर्थात ऋग्वेद आदि के विभाजन से चार वेद कहे गए हैं और उनकी अनेक शाखाएं हैं, और उन सभी शाखाओं की अपनी-अपनी उपनिषदें हैं। आगे कहा गया है: “ऋग्वेदस्य तु शाखाः स्युरेकविंशति संख्यकाः। नवाधिकशतं शाखा यजुषो मारुतात्मज॥ सहस्रसंख्यया जाताः शाखाः साम्रः परन्तप। अथर्वणस्य शाखाः स्युः पंचाशद्भदतो हरे॥ एकैकस्यास्तु शाखाया एकैकोपनिषन्मता।” अर्थात ऋग्वेद की इक्कीस शाखाएं हैं, यजुर्वेद की एक सौ नौ शाखाएं, सामवेद की एक हजार शाखाएं और अथर्ववेद की पचास शाखाएं हैं, और प्रत्येक शाखा की एक-एक उपनिषद मानी गई है।
उपनिषदों के रचनाकाल का निर्धारण
उपनिषदों के रचनाकाल के संबंध में विद्वानों में कोई एक सर्वमान्य मत स्वीकार नहीं किया जा सकता है। यह एक अत्यंत जटिल और बहुस्तरीय प्रश्न है। कुछ उपनिषदें वेद की मूल संहिताओं का अंश हैं, इसलिए उन्हें सबसे प्राचीन माना जाता है और उनका रचनाकाल वैदिक युग के प्रारंभिक काल में रखा जा सकता है। कुछ उपनिषदें ब्राह्मण और आरण्यक ग्रंथों के अंश हैं, इसलिए उनका रचनाकाल निश्चित रूप से संहिता काल के बाद का ही सिद्ध होता है। और कुछ उपनिषदें पूर्णतः स्वतंत्र हैं, जो विभिन्न कालखंडों में क्रमशः अस्तित्व में आईं।
काल निर्धारण के संदर्भ में विद्वान मंत्रों और श्लोकों में प्राप्त विभिन्न विवरणों का सहारा लेते हैं। मंत्रों में जो संदर्भ मिलते हैं, उनमें मुख्यतः तीन प्रकार की जानकारियां होती हैं: पहली, भौगोलिक परिस्थितियां और स्थानों का उल्लेख; दूसरी, सूर्यवंशी-चंद्रवंशी राजाओं या प्रसिद्ध ऋषियों के नाम; और तीसरी, खगोलीय योगों और ग्रह-नक्षत्रों की स्थिति के विवरण।
भौगोलिक परिस्थितियों के आधार पर गंगा, सरस्वती, सिंधु आदि प्रमुख नदियों के नाम और विभिन्न स्थानों के उल्लेख से केवल यही संकेत मिलते हैं कि इन उपनिषदों का रचनाकाल उन संदर्भित नदियों या स्थानों के उद्भव और प्रसिद्धि के बाद का ही है। लेकिन इस आधार पर कोई सुनिश्चित और सटीक काल निर्धारण नहीं हो पाता है। राजाओं और ऋषियों के नामों को आधार बनाने में भी समान समस्या बनी रहती है। प्राचीन भारतीय इतिहास में एक ही नाम के अनेक राजा और ऋषि पाए जाते हैं, जिनके बीच कई पीढ़ियों और शताब्दियों का अंतर होता है। ऐसी जटिल स्थिति में रचनाकाल का सही निर्णय करना अत्यंत कठिन हो जाता है।
जहां उपनिषदों में खगोलीय योगों, ग्रहों की विशेष स्थिति और नक्षत्रों का स्पष्ट वर्णन मिल जाता है, वहां ज्योतिष गणित और खगोलीय विज्ञान के आधार पर बहुत कुछ सुनिश्चित गणना की जा सकती है। संहिताओं, ब्राह्मणों और स्वतंत्र उपनिषदों के काल निर्धारण के संदर्भ में अधिकांश विद्वानों ने इसी वैज्ञानिक विधि का उपयोग किया है।
उपनिषदों की अद्भुत शैली और प्रस्तुति
उपनिषदों की अपनी शैली अद्भुत, अद्वितीय और अत्यंत प्रभावशाली है। इनमें गूढ़ रहस्यों को समझने की तीव्र उत्कंठा, अनुभूति की गहन क्षमता और अभिव्यक्ति की अद्वितीय सहजता का दर्शन जगह-जगह होता है। प्रत्येक उपनिषद अपने आप में एक अनोखा आध्यात्मिक अनुभव है।
कठोपनिषद में युवा ब्राह्मण नचिकेता अपनी तीव्र जिज्ञासा और सत्य की खोज को लेकर मृत्यु के देवता यम के समक्ष इतने अविचल भाव और दृढ़ संकल्प से डटे रहते हैं कि अंततः यम को द्रवित होना पड़ता है और वे नचिकेता को मृत्यु के रहस्य और आत्मा के अमरत्व का ज्ञान प्रदान करते हैं। छान्दोग्योपनिषद में महान ऋषि आरुणि अपने पुत्र श्वेतकेतु के साथ सच्ची जिज्ञासु भावना से क्षत्रिय राजा प्रवाहण जैवलि से उपदेश प्राप्त करने में कोई संकोच या अहंकार नहीं दिखाते। यह दर्शाता है कि सच्चा ज्ञान जाति या वर्ग की सीमाओं से परे है। ऐतरेय उपनिषद में ऋषि वामदेव प्रजनन चक्र और जन्म-मृत्यु के रहस्य को समझने के लिए अपनी चेतना को उस चक्र में घुमाकर प्रत्यक्ष अनुभव प्राप्त करते हैं। इस प्रकार प्राप्त अनुभूतिजन्य गहन ज्ञान को जनहितार्थ बड़ी सहजता और सरलता से व्यक्त किया जाता है।
उपनिषदों में कर्मकांड का और उनकी फलश्रुतियों का उल्लेख भी जगह-जगह मिलता है, लेकिन वे केवल वहीं तक सीमित नहीं रह जाते। उपनिषद कर्मकांड के स्थूल बाहरी स्वरूप को भेदकर उसके गूढ़ आंतरिक मर्म और आध्यात्मिक अर्थ तक पहुंचते हैं। जब वे सामगान की व्याख्या करते हैं, तो उसे केवल यज्ञीय कर्मकांड में कुछ मंत्रों के गायन तक ही सीमित नहीं रहने देते। छान्दोग्योपनिषद के प्रथम अध्याय के तेरहवें खंड में और द्वितीय अध्याय के दूसरे खंड में प्रकृति चक्र में अनेक प्रकार के साम प्रवाह, अर्थात संतुलित प्रवाहों का गहन स्वरूप समझाया गया है। उपनिषदों में पुरुषमेध, सर्वमेध आदि यज्ञ केवल बाहरी अनुष्ठान नहीं रह जाते, बल्कि आत्म निग्रह, आत्मसंयम और आंतरिक शुद्धि के विधान बन जाते हैं।
बृहदारण्यकोपनिषद के प्रसिद्ध अश्वमेध प्रकरण में अश्वमेध यज्ञ को व्यक्ति द्वारा संपूर्ण विश्व को समर्पित करने की समाधि जैसी गहन आध्यात्मिक प्रक्रिया के रूप में प्रस्तुत किया गया है। यह दृष्टिकोण उपनिषदों की गहराई और व्यापकता को दर्शाता है।
उपनिषदों का भाव और भाषा का अद्भुत समन्वय
उपनिषदों में भाव और भाषा की सहजता का अत्यंत सुंदर और कलात्मक तालमेल मिलता है। गहन अनुभूति से उपजे सहज और स्वाभाविक भावों को सहज, सरल और प्रवाहमय भाषा में व्यक्त करने का ईमानदार प्रयास किया गया है। ऋषियों ने अपने भाषा ज्ञान को प्रदर्शित करने के लिए आडंबरपूर्ण, क्लिष्ट या कृत्रिम भाषा को थोपने का प्रयास नहीं किया है। इसके लिए तर्क, समीक्षा, संवाद या कथोपकथन, उदाहरण, उपाख्यान, रूपक, प्रतीक और अलंकार आदि विभिन्न साहित्यिक शैलियों का समयानुकूल और प्रासंगिक उपयोग करते हुए भावों को सहज ग्राह्य और समझने योग्य बनाने का सफल प्रयास किया गया है।
यह सब होते हुए भी उपनिषदों में रहस्यात्मकता जगह-जगह परिलक्षित होती है। इसके कई महत्वपूर्ण कारण हैं। सबसे पहले, गूढ़ ज्ञान-विज्ञान और आध्यात्मिक सत्य को चाहे कितना भी सुगम और सरल बनाया जाए, उन्हें समझने के लिए अध्येता या साधक का अपना भी कुछ आध्यात्मिक स्तर, तैयारी और योग्यता होनी चाहिए। द्रष्टा ऋषि ने गहन ध्यान और समाधि में जो देखा, अनुभव किया, उसे पूरी तरह भाषा के सीमित शब्दों में बांधना तो कभी संभव ही नहीं होता। भाषा में केवल संकेतात्मक अभिव्यक्ति ही हो सकती है, पूर्ण अभिव्यक्ति नहीं।
यदि कोई महान संगीत विशेषज्ञ किसी सुंदर राग में मधुर भावों को गाकर व्यक्त करे, तो सुनने वाला श्रोता उस संगीतकार के अंदर के भाव प्रवाह की एक झलक भर ही पा सकता है, पूरा अनुभव नहीं। और यदि वह गायन स्वर संकेतों के साथ लिपिबद्ध किया जाए, तब तो उसके भावों को समझने के लिए और भी अधिक साधना, अभ्यास और संवेदनशीलता चाहिए।
आज के युग में पदार्थ विज्ञान या भौतिक विज्ञान को समझने के लिए केवल भाषा की समीक्षा करके तथ्य जानने की परिपाटी चल पड़ी है। पदार्थ विज्ञान के संदर्भ में यह पद्धति कुछ हद तक चल भी जाती है क्योंकि वह मूर्त और प्रत्यक्ष है। लेकिन भाव विज्ञान, आध्यात्मिक विज्ञान और चेतना के क्षेत्र में तो केवल भाषा की बौद्धिक समीक्षा से काम चल नहीं सकता। गूढ़ आध्यात्मिक भावों को अनुभव करने के लिए सूक्ष्म संवेदनात्मक क्षमताएं, आंतरिक शुद्धि और ध्यान की गहराई चाहिए। आज की भौतिकवादी जीवनशैली में इन सूक्ष्म क्षमताओं का बड़ा अभाव हो गया है। इसीलिए उपनिषदों द्वारा सहज भाषा में प्रस्तुत गहन भाव भी आज के पाठकों को रहस्यात्मक और जटिल प्रतीत होते हैं।
जिस प्रकार वेदमंत्रों का वास्तविक भाव ऋषि, देवता और छंद को समझे बिना स्पष्ट नहीं होता, उसी प्रकार उपनिषदों के अध्ययन में भी द्रष्टा-उपदेष्टा के आध्यात्मिक स्तर, उनके लक्ष्य और अभिव्यक्ति की विशिष्ट शैली पर गहराई से ध्यान देने पर ही उनके भावों और कथनों का सही-सही लाभ उठाया जा सकता है। उपनिषदों का अध्ययन केवल बौद्धिक व्यायाम नहीं है, बल्कि यह एक आध्यात्मिक साधना और आंतरिक परिवर्तन की यात्रा है।



