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Reading: श्री वेङ्कटेश्वर प्रपत्ति
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श्री वेङ्कटेश्वर स्वामि स्तोत्राणिस्तोत्र

श्री वेङ्कटेश्वर प्रपत्ति

Sanatani
Last updated: फ़रवरी 11, 2026 6:53 अपराह्न
Sanatani
Published: फ़रवरी 11, 2026
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श्री वेङ्कटेश्वर प्रपत्ति

श्री वेङ्कटेश्वर प्रपत्ति (Sri Venkateswara Prapatti) भगवान श्री वेङ्कटेश्वर (तिरुपति बालाजी) के प्रति आत्मसमर्पण का एक महत्त्वपूर्ण स्तोत्र है, जो विशिष्टाद्वैत परंपरा में विशेष स्थान रखता है। यह प्रपत्ति भक्त द्वारा भगवान के चरणों में पूर्ण समर्पण का प्रतीक है, जिसमें वह अपनी सारी चिंताओं और समस्याओं को भगवान पर छोड़ देता है और उनकी कृपा की याचना करता है।

Contents
  • श्री वेङ्कटेश्वर प्रपत्ति
  • श्री वेङ्कटेश्वर प्रपत्ति का महत्त्व
  • श्री वेङ्कटेश्वर प्रपत्ति का लाभ
  • श्री वेङ्कटेश्वर प्रपत्ति का पाठ कब करें?
  • श्री वेङ्कटेश्वर प्रपत्ति – Sri Venkateswara Prapatti

श्री वेङ्कटेश्वर प्रपत्ति का महत्त्व

यह स्तोत्र भगवान वेङ्कटेश्वर के प्रति निष्काम भक्ति को प्रकट करता है। भक्त इसमें अपने मन, वचन और कर्म से भगवान को समर्पित करने का संकल्प लेता है। यह शरणागति का एक सशक्त माध्यम है, जिससे व्यक्ति सांसारिक मोह से मुक्त होकर केवल भगवान पर भरोसा करता है।

विशिष्टाद्वैत वेदान्त में शरणागति को मोक्ष प्राप्ति का सर्वोत्तम साधन माना गया है। इसे प्रपत्ति मार्ग कहते हैं, जो भगवान के प्रति पूर्ण आत्मसमर्पण का निर्देश देता है। इस प्रक्रिया में भक्त अपनी सभी इच्छाओं और अहंकार को त्यागकर, स्वयं को ईश्वर के चरणों में समर्पित कर देता है।

श्री वेङ्कटेश्वर प्रपत्ति का लाभ

  • यह स्तोत्र भक्त में पूर्ण समर्पण की भावना जाग्रत करता है।
  • मानसिक शांति प्रदान करता है और जीवन की कठिनाइयों से मुक्ति दिलाने में सहायक होता है।
  • व्यक्ति को आध्यात्मिक उन्नति की ओर प्रेरित करता है।
  • भगवान श्री वेङ्कटेश्वर की कृपा से सभी बाधाएं दूर होती हैं।

श्री वेङ्कटेश्वर प्रपत्ति का पाठ कब करें?

इस प्रपत्ति का पाठ प्रतिदिन प्रातःकाल या संध्या समय, विशेष रूप से तिरुपति बालाजी के दर्शन के पूर्व अथवा किसी संकट के समय किया जा सकता है। इसे नवरात्रि, वैकुंठ एकादशी, श्रावण मास, पूर्णिमा तथा अन्य पवित्र अवसरों पर पाठ करना विशेष फलदायी माना जाता है।

श्री वेङ्कटेश्वर प्रपत्ति – Sri Venkateswara Prapatti

ईशानां जगतोऽस्य वेङ्कटपते र्विष्णोः परां प्रेयसीं
तद्वक्षःस्थल नित्यवासरसिकां तत्-क्षान्ति संवर्धिनीम् ।
पद्मालङ्कृत पाणिपल्लवयुगां पद्मासनस्थां श्रियं
वात्सल्यादि गुणोज्ज्वलां भगवतीं वन्दे जगन्मातरम् ॥

श्रीमन् कृपाजलनिधे कृतसर्वलोक
सर्वज्ञ शक्त नतवत्सल सर्वशेषिन् ।
स्वामिन् सुशील सुल भाश्रित पारिजात
श्रीवेङ्कटेशचरणौ शरणं प्रपद्ये ॥ 2 ॥

आनूपुरार्चित सुजात सुगन्धि पुष्प
सौरभ्य सौरभकरौ समसन्निवेशौ ।
सौम्यौ सदानुभनेऽपि नवानुभाव्यौ
श्रीवेङ्कटेश चरणौ शरणं प्रपद्ये ॥ 3 ॥

सद्योविकासि समुदित्त्वर सान्द्रराग
सौरभ्यनिर्भर सरोरुह साम्यवार्ताम् ।
सम्यक्षु साहसपदेषु विलेखयन्तौ
श्रीवेङ्कटेश चरणौ शरणं प्रपद्ये ॥ 4 ॥

रेखामय ध्वज सुधाकलशातपत्र
वज्राङ्कुशाम्बुरुह कल्पक शङ्खचक्रैः ।
भव्यैरलङ्कृततलौ परतत्त्व चिह्नैः
श्रीवेङ्कटेश चरणौ शरणं प्रपद्ये ॥ 5 ॥

ताम्रोदरद्युति पराजित पद्मरागौ
बाह्यैर्-महोभि रभिभूत महेन्द्रनीलौ ।
उद्य न्नखांशुभि रुदस्त शशाङ्क भासौ
श्रीवेङ्कटेश चरणौ शरणं प्रपद्ये ॥ 6 ॥

स प्रेमभीति कमलाकर पल्लवाभ्यां
संवाहनेऽपि सपदि क्लम माधधानौ ।
कान्ता नवाङ्मानस गोचर सौकुमार्यौ
श्रीवेङ्कटेश चरणौ शरणं प्रपद्ये ॥ 7 ॥

लक्ष्मी मही तदनुरूप निजानुभाव
नीलादि दिव्य महिषी करपल्लवानाम् ।
आरुण्य सङ्क्रमणतः किल सान्द्ररागौ
श्रीवेङ्कटेश चरणौ शरणं प्रपद्ये ॥ 8 ॥

नित्यानमद्विधि शिवादि किरीटकोटि
प्रत्युप्त दीप्त नवरत्नमहः प्ररोहैः ।
नीराजनाविधि मुदार मुपादधानौ
श्रीवेङ्कटेश चरणौ शरणं प्रपद्ये ॥ 9 ॥

“विष्णोः पदे परम” इत्युदित प्रशंसौ
यौ “मध्व उत्स” इति भोग्य तयाऽप्युपात्तौ ।
भूयस्तथेति तव पाणितल प्रदिष्टौ
श्रीवेङ्कटेश चरणौ शरणं प्रपद्ये ॥ 10 ॥

पार्थाय तत्-सदृश सारधिना त्वयैव
यौ दर्शितौ स्वचरणौ शरणं व्रजेति ।
भूयोऽपि मह्य मिह तौ करदर्शितौ ते
श्रीवेङ्कटेश चरणौ शरणं प्रपद्ये ॥ 11 ॥

मन्मूर्थ्नि कालियफने विकटाटवीषु
श्रीवेङ्कटाद्रि शिखरे शिरसि श्रुतीनाम् ।
चित्तेऽप्यनन्य मनसां सममाहितौ ते
श्रीवेङ्कटेश चरणौ शरणं प्रपद्ये ॥ 12 ॥

अम्लान हृष्य दवनीतल कीर्णपुष्पौ
श्रीवेङ्कटाद्रि शिखराभरणाय-मानौ ।
आनन्दिताखिल मनो नयनौ तवै तौ
श्रीवेङ्कटेश चरणौ शरणं प्रपद्ये ॥ 13 ॥

प्रायः प्रपन्न जनता प्रथमावगाह्यौ
मातुः स्तनाविव शिशो रमृतायमाणौ ।
प्राप्तौ परस्पर तुला मतुलान्तरौ ते
श्रीवेङ्कटेश चरणौ शरणं प्रपद्ये ॥ 14 ॥

सत्त्वोत्तरैः सतत सेव्यपदाम्बुजेन
संसार तारक दयार्द्र दृगञ्चलेन ।
सौम्योपयन्तृ मुनिना मम दर्शितौ ते
श्रीवेङ्कटेश चरणौ शरणं प्रपद्ये ॥ 15 ॥

श्रीश श्रिया घटिकया त्वदुपाय भावे
प्राप्येत्वयि स्वयमुपेय तया स्फुरन्त्या ।
नित्याश्रिताय निरवद्य गुणाय तुभ्यं
स्यां किङ्करो वृषगिरीश न जातु मह्यम् ॥ 16 ॥

इति श्रीवेङ्कटेश प्रपत्तिः

श्री वेङ्कटेश्वर प्रपत्ति भक्तों के लिए भगवान श्री वेङ्कटेश्वर के चरणों में पूर्ण आत्मसमर्पण का एक प्रभावशाली साधन है। यह न केवल भक्त की श्रद्धा को दृढ़ करता है, बल्कि जीवन की सभी समस्याओं से मुक्ति दिलाने में सहायक होता है। जो भी भक्त निष्काम भाव से इस प्रपत्ति का पाठ करता है, उसे भगवान श्री वेङ्कटेश्वर की कृपा अवश्य प्राप्त होती है।

विज्ञान गणराज स्तोत्रम्
श्री वेङ्कटेश्वर अष्टोत्तर शत नामावलि
श्री लक्ष्मी अष्टोत्तर शतनाम स्तोत्रम्
आदित्य स्तुति
श्री राम कर्णामृतम्
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