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बुधवार, जनवरी 28, 2026

नारायण सूक्तम्

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Narayana Suktam In Hindi

नारायण सूक्तम्(Narayana Suktam) वैदिक साहित्य का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा है, जो यजुर्वेद के तैत्तिरीय आरण्यक के दसवें प्रपाठक में मिलता है। यह सूक्तम् विशेष रूप से परमात्मा नारायण के स्वरूप, उनकी महिमा और उनके अस्तित्व की व्यापकता को वर्णित करता है। इसे वेदों का हृदय माना जाता है क्योंकि इसमें ब्रह्माण्ड के मूल तत्व, जीव, जगत और ईश्वर के संबंध को समझाया गया है।

नारायण सूक्तम् का उद्देश्य

नारायण सूक्तम् का मुख्य उद्देश्य नारायण को सर्वोच्च सत्ता के रूप में स्थापित करना है। यह सूक्तम् यह बताता है कि नारायण ही समस्त सृष्टि के कर्ता, पालनकर्ता और संहारकर्ता हैं। उनकी महिमा अपरिमेय है, और वे ही संपूर्ण ब्रह्मांड के आधार हैं। इस सूक्तम् का पाठ ध्यान, साधना और आत्मसाक्षात्कार के लिए किया जाता है।

नारायण सूक्तम् के लाभ Narayana Suktam Benifits

नारायण सूक्तम् के नियमित पाठ से आध्यात्मिक उन्नति होती है। यह मन को शांति प्रदान करता है और मनुष्य को अपनी आत्मा के साथ जोड़ता है।

  1. शांति और संतुलन: यह सूक्तम् मानसिक तनाव को दूर करता है।
  2. आध्यात्मिक जागरूकता: नारायण के प्रति भक्ति को प्रबल करता है।
  3. सकारात्मक ऊर्जा: यह नकारात्मकता को समाप्त कर सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है।
  4. सिद्धि प्राप्ति: साधकों के लिए यह सूक्तम् सिद्धियों को प्राप्त करने का मार्ग दिखाता है।

नारायण सूक्तम् संस्कृत में Narayana Suktam in Sanskrit

ॐ स॒ह ना॑ववतु । स॒ह नौ॑ भुनक्तु । स॒ह वी॒र्य॑-ङ्करवावहै ।
ते॒ज॒स्विना॒वधी॑तमस्तु॒ मा वि॑द्विषा॒वहै᳚ ॥
ॐ शान्ति॒-श्शान्ति॒-श्शान्तिः॑ ॥

[धा॒ता पु॒रस्ता॒द्यमु॑दाज॒हार॑ । श॒क्रः प्रवि॒द्वान्-प्र॒दिश॒श्चत॑स्रः ।
तमे॒वं-विँ॒द्वान॒मृत॑ इ॒ह भ॑वति । नान्यः पन्था॒ अय॑नाय विद्यते ॥]

ओम् ॥ स॒ह॒स्र॒शीर्॑​ष-न्दे॒वं॒ वि॒श्वाक्षं॑-विँ॒श्वश॑म्भुवम् ।
विश्व॑-न्ना॒राय॑ण-न्दे॒व॒म॒क्षर॑-म्पर॒म-म्प॒दम् ।

वि॒श्वतः॒ पर॑मान्नि॒त्यं॒-विँ॒श्व-न्ना॑राय॒णग्ं ह॑रिम् ।
विश्व॑मे॒वेद-म्पुरु॑ष॒-स्तद्विश्व-मुप॑जीवति ।

पतिं॒-विँश्व॑स्या॒त्मेश्व॑र॒ग्ं॒ शाश्व॑तग्ं शि॒व-म॑च्युतम् ।
ना॒राय॒ण-म्म॑हाज्ञे॒यं॒-विँ॒श्वात्मा॑न-म्प॒राय॑णम् ।

ना॒राय॒णप॑रो ज्यो॒ति॒रा॒त्मा ना॑राय॒णः प॑रः ।
ना॒राय॒णपर॑-म्ब्र॒ह्म॒ तत्त्व-न्ना॑राय॒णः प॑रः ।

ना॒राय॒णप॑रो ध्या॒ता॒ ध्या॒न-न्ना॑राय॒णः प॑रः ।
यच्च॑ कि॒ञ्चिज्ज॑गत्स॒र्व॒-न्दृ॒श्यते᳚ श्रूय॒ते-ऽपि॑ वा ॥

अन्त॑र्ब॒हिश्च॑ तत्स॒र्वं॒-व्याँ॒प्य ना॑राय॒ण-स्स्थि॑तः ।
अनन्त॒मव्यय॑-ङ्क॒विग्ं स॑मु॒द्रें-ऽतं॑-विँ॒श्वश॑म्भुवम् ।

प॒द्म॒को॒श-प्र॑तीका॒श॒ग्ं॒ हृ॒दय॑-ञ्चाप्य॒धोमु॑खम् ।
अधो॑ नि॒ष्ट्या वि॑तस्या॒न्ते॒ ना॒भ्यामु॑परि॒ तिष्ठ॑ति ।

ज्वा॒ल॒मा॒लाकु॑ल-म्भा॒ती॒ वि॒श्वस्या॑यत॒न-म्म॑हत् ।
सन्त॑तग्ं शि॒लाभि॑स्तु॒ लम्ब॑त्याकोश॒सन्नि॑भम् ।

तस्यान्ते॑ सुषि॒रग्ं सू॒क्ष्म-न्तस्मिन्᳚ स॒र्व-म्प्रति॑ष्ठितम् ।
तस्य॒ मध्ये॑ म॒हान॑ग्नि-र्वि॒श्वार्चि॑-र्वि॒श्वतो॑मुखः ।

सो-ऽग्र॑भु॒ग्विभ॑जन्ति॒ष्ठ॒-न्नाहा॑रमज॒रः क॒विः ।
ति॒र्य॒गू॒र्ध्वम॑धश्शा॒यी॒ र॒श्मय॑स्तस्य॒ सन्त॑ता ।

स॒न्ता॒पय॑ति स्व-न्दे॒हमापा॑दतल॒मस्त॑कः ।
तस्य॒ मध्ये॒ वह्नि॑शिखा अ॒णीयो᳚र्ध्वा व्य॒वस्थि॑तः ।

नी॒लतो॑-यद॑मध्य॒स्था॒-द्वि॒ध्युल्ले॑खेव॒ भास्व॑रा ।
नी॒वार॒शूक॑वत्त॒न्वी॒ पी॒ता भा᳚स्वत्य॒णूप॑मा ।

तस्या᳚-श्शिखा॒या म॑ध्ये प॒रमा᳚त्मा व्य॒वस्थि॑तः ।
स ब्रह्म॒ स शिव॒-स्स हरि॒-स्सेन्द्र॒-स्सो-ऽक्ष॑रः पर॒म-स्स्व॒राट् ॥

ऋतग्ं स॒त्य-म्प॑र-म्ब्र॒ह्म॒ पु॒रुष॑-ङ्कृष्ण॒पिङ्ग॑लम् ।
ऊ॒र्ध्वरे॑तं-विँ॑रूपा॒क्षं॒-विँ॒श्वरू॑पाय॒ वै नमो॒ नमः॑ ॥

ओ-न्ना॒रा॒य॒णाय॑ वि॒द्महे॑ वासुदे॒वाय॑ धीमहि ।
तन्नो॑ विष्णुः प्रचो॒दया᳚त् ॥

ॐ शान्ति॒-श्शान्ति॒-श्शान्तिः॑ ॥

नारायण सूक्तम् न केवल वैदिक साहित्य का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा है, बल्कि यह हमारी आध्यात्मिक यात्रा में भी एक मार्गदर्शक के रूप में कार्य करता है। इसकी प्रत्येक पंक्ति हमें नारायण की असीम महिमा का बोध कराती है और हमें ब्रह्माण्ड के साथ एकात्मता का अनुभव कराती है। इसका नियमित पाठ व्यक्ति को उच्चतम आध्यात्मिक स्थिति तक पहुंचा सकता है।

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