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कवचम्श्री गणेश स्तोत्रस्तोत्र

गणेश कवचम्

Sanatani
Last updated: जनवरी 22, 2026 6:20 अपराह्न
Sanatani
Published: जनवरी 22, 2026
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गणेश कवचम्

गणेश कवचम्(Ganesh Kavacham) एक शक्तिशाली स्तोत्र है, जो भगवान गणेश की कृपा प्राप्त करने के लिए पाठ किया जाता है। यह कवच भक्तों को सभी प्रकार की बाधाओं से रक्षा प्रदान करता है और सुख-समृद्धि का मार्ग प्रशस्त करता है। इसे विशेष रूप से गणेश चतुर्थी, बुधवार और संकष्टी चतुर्थी के दिन पाठ करना अत्यंत लाभकारी माना जाता है।

Contents
  • गणेश कवचम्
  • गणेश कवच के लाभ
  • गणेश कवच पाठ करने की विधि
  • गणेश कवचम्

भगवान गणेश को विघ्नहर्ता कहा जाता है, अर्थात वे सभी प्रकार के विघ्नों और संकटों को दूर करते हैं। गणेश कवचम् का पाठ करने से व्यक्ति के जीवन में आने वाली बाधाओं से मुक्ति मिलती है और उसे सफलता प्राप्त होती है। यह कवच न केवल आध्यात्मिक रूप से बल्कि मानसिक और शारीरिक रूप से भी शक्ति प्रदान करता है।

गणेश कवच के लाभ

गणेश कवच के नियमित पाठ से कई आध्यात्मिक और सांसारिक लाभ प्राप्त होते हैं –

  1. विघ्नों का नाश: यह कवच जीवन में आने वाली सभी बाधाओं और नकारात्मक शक्तियों को दूर करता है।
  2. विद्या एवं बुद्धि की प्राप्ति: विद्यार्थी अगर इस कवच का पाठ करें तो वे अपनी शिक्षा में उत्कृष्ट परिणाम प्राप्त कर सकते हैं।
  3. धन-समृद्धि: व्यापारियों के लिए यह कवच विशेष रूप से लाभकारी होता है, क्योंकि यह व्यापार में वृद्धि और आर्थिक उन्नति लाता है।
  4. स्वास्थ्य लाभ: यह कवच शरीर को स्वस्थ एवं ऊर्जावान बनाए रखता है और मानसिक शांति प्रदान करता है।
  5. कार्यसिद्धि: नौकरी, परीक्षा, विवाह, संतान प्राप्ति आदि कार्यों में सफलता के लिए इस कवच का पाठ अत्यंत फलदायी होता है।

गणेश कवच पाठ करने की विधि

  • समय: प्रातःकाल स्नान करके शुद्ध वस्त्र धारण करें और भगवान गणेश का स्मरण करें।
  • स्थान: पूजा स्थल में बैठकर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके पाठ करें।
  • मंत्र उच्चारण: पाठ के समय स्पष्ट उच्चारण करें और भगवान गणेश का ध्यान करें।
  • धूप-दीप प्रज्वलित करें: पाठ के दौरान दीप जलाएं और भगवान को मोदक का भोग अर्पित करें।
  • एकाग्रता: पूरे ध्यान और श्रद्धा के साथ पाठ करें ताकि अधिकतम लाभ प्राप्त हो।

गणेश कवचम्

एषोति चपलो दैत्यान् बाल्येपि नाशयत्यहो ।
अग्रे किं कर्म कर्तेति न जाने मुनिसत्तम ॥ 1 ॥

दैत्या नानाविधा दुष्टास्साधु देवद्रुमः खलाः ।
अतोस्य कंठे किंचित्त्यं रक्षां संबद्धुमर्हसि ॥ 2 ॥

ध्यायेत् सिंहगतं विनायकममुं दिग्बाहु माद्ये युगे
त्रेतायां तु मयूर वाहनममुं षड्बाहुकं सिद्धिदम् । ई
द्वापरेतु गजाननं युगभुजं रक्तांगरागं विभुं तुर्ये
तु द्विभुजं सितांगरुचिरं सर्वार्थदं सर्वदा ॥ 3 ॥

विनायक श्शिखांपातु परमात्मा परात्परः ।
अतिसुंदर कायस्तु मस्तकं सुमहोत्कटः ॥ 4 ॥

ललाटं कश्यपः पातु भ्रूयुगं तु महोदरः ।
नयने बालचंद्रस्तु गजास्यस्त्योष्ठ पल्लवौ ॥ 5 ॥

जिह्वां पातु गजक्रीडश्चुबुकं गिरिजासुतः ।
वाचं विनायकः पातु दंतान्​ रक्षतु दुर्मुखः ॥ 6 ॥

श्रवणौ पाशपाणिस्तु नासिकां चिंतितार्थदः ।
गणेशस्तु मुखं पातु कंठं पातु गणाधिपः ॥ 7 ॥

स्कंधौ पातु गजस्कंधः स्तने विघ्नविनाशनः ।
हृदयं गणनाथस्तु हेरंबो जठरं महान् ॥ 8 ॥

धराधरः पातु पार्श्वौ पृष्ठं विघ्नहरश्शुभः ।
लिंगं गुह्यं सदा पातु वक्रतुंडो महाबलः ॥ 9 ॥

गजक्रीडो जानु जंघो ऊरू मंगलकीर्तिमान् ।
एकदंतो महाबुद्धिः पादौ गुल्फौ सदावतु ॥ 10 ॥

क्षिप्र प्रसादनो बाहु पाणी आशाप्रपूरकः ।
अंगुलीश्च नखान् पातु पद्महस्तो रिनाशनः ॥ 11 ॥

सर्वांगानि मयूरेशो विश्वव्यापी सदावतु ।
अनुक्तमपि यत् स्थानं धूमकेतुः सदावतु ॥ 12 ॥

आमोदस्त्वग्रतः पातु प्रमोदः पृष्ठतोवतु ।
प्राच्यां रक्षतु बुद्धीश आग्नेय्यां सिद्धिदायकः ॥ 13 ॥

दक्षिणस्यामुमापुत्रो नैऋत्यां तु गणेश्वरः ।
प्रतीच्यां विघ्नहर्ता व्याद्वायव्यां गजकर्णकः ॥ 14 ॥

कौबेर्यां निधिपः पायादीशान्याविशनंदनः ।
दिवाव्यादेकदंत स्तु रात्रौ संध्यासु यःविघ्नहृत् ॥ 15 ॥

राक्षसासुर बेताल ग्रह भूत पिशाचतः ।
पाशांकुशधरः पातु रजस्सत्त्वतमस्स्मृतीः ॥ 16 ॥

ज्ञानं धर्मं च लक्ष्मी च लज्जां कीर्तिं तथा कुलम् । ई
वपुर्धनं च धान्यं च गृहं दारास्सुतान्सखीन् ॥ 17 ॥

सर्वायुध धरः पौत्रान् मयूरेशो वतात् सदा ।
कपिलो जानुकं पातु गजाश्वान् विकटोवतु ॥ 18 ॥

भूर्जपत्रे लिखित्वेदं यः कंठे धारयेत् सुधीः ।
न भयं जायते तस्य यक्ष रक्षः पिशाचतः ॥ 19 ॥

त्रिसंध्यं जपते यस्तु वज्रसार तनुर्भवेत् ।
यात्राकाले पठेद्यस्तु निर्विघ्नेन फलं लभेत् ॥ 20 ॥

युद्धकाले पठेद्यस्तु विजयं चाप्नुयाद्ध्रुवम् ।
मारणोच्चाटनाकर्ष स्तंभ मोहन कर्मणि ॥ 21 ॥

सप्तवारं जपेदेतद्दनानामेकविंशतिः ।
तत्तत्फलमवाप्नोति साधको नात्र संशयः ॥ 22 ॥

एकविंशतिवारं च पठेत्तावद्दिनानि यः ।
कारागृहगतं सद्यो राज्ञावध्यं च मोचयोत् ॥ 23 ॥

राजदर्शन वेलायां पठेदेतत् त्रिवारतः ।
स राजानं वशं नीत्वा प्रकृतीश्च सभां जयेत् ॥ 24 ॥

इदं गणेशकवचं कश्यपेन सविरितम् ।
मुद्गलाय च ते नाथ मांडव्याय महर्षये ॥ 25 ॥

मह्यं स प्राह कृपया कवचं सर्व सिद्धिदम् ।
न देयं भक्तिहीनाय देयं श्रद्धावते शुभम् ॥ 26 ॥

अनेनास्य कृता रक्षा न बाधास्य भवेत् व्याचित् ।
राक्षसासुर बेताल दैत्य दानव संभवाः ॥ 27 ॥

॥ इति श्री गणेशपुराणे श्री गणेश कवचं संपूर्णम् ॥

गणेश कवचम् एक दिव्य स्तोत्र है जो भगवान गणेश की कृपा प्राप्त करने और जीवन की सभी बाधाओं को दूर करने के लिए अत्यंत प्रभावशाली है। यदि व्यक्ति नियमित रूप से इस कवच का पाठ करता है तो उसे सफलता, सुख-समृद्धि, स्वास्थ्य और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है। श्रद्धा और विश्वास के साथ इस कवच का पाठ करने से भगवान गणेश की असीम कृपा प्राप्त होती है।

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