प्रभुके दो ही दास हैं साँचे ( राग शुद्ध कल्याण – ताल तिताला – प्रकीर्ण )
प्रभुके दो ही दास हैं साँचे।
नेमी होय चाहि हो प्रेमी होय न मनके काँचे ।
प्रथम भक्ति प्रेमीजन पावत दृजे नेमी राँचे ।।
प्रेम भाव लखि ब्रजगोपिनको तिनके सँग प्रभु नाँचे।
रूपकुँवरि यह सत्य जान लो हरि साँचेको साँचे ॥



