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Reading: श्री सूक्तम् (ऋग्वेद) 
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SanatanWeb.com > Blog > गीतकाव्य > सूक्तम् > श्री सूक्तम् (ऋग्वेद) 
सूक्तम्

श्री सूक्तम् (ऋग्वेद) 

Sanatani
Last updated: जनवरी 24, 2026 7:14 अपराह्न
Sanatani
Published: जनवरी 24, 2026
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श्री सूक्तम् (ऋग्वेद) 

श्री सूक्तम्(Sri Suktam) एक प्रसिद्ध वैदिक स्तोत्र है, जो ऋग्वेद के अंतर्गत आता है और महालक्ष्मी की उपासना के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। यह स्तोत्र वैदिक साहित्य में देवी लक्ष्मी के महत्त्व, उनकी कृपा और उनके माध्यम से सुख-समृद्धि प्राप्ति की महिमा को प्रस्तुत करता है। श्री सूक्तम् को धन, वैभव, ऐश्वर्य और मानसिक शांति प्राप्त करने का एक सशक्त माध्यम माना गया है।

Contents
  • श्री सूक्तम् (ऋग्वेद) 
  • श्री सूक्तम् का महत्व
  • श्री सूक्तम् में देवी लक्ष्मी के स्वरूप
  • श्री सूक्तम् पाठ का समय और विधि
  • श्री सूक्तम् के लाभ
  • श्री सूक्तम् Sri Suktam in Sanskrit

श्री सूक्तम् का महत्व

श्री सूक्तम् में महालक्ष्मी को प्रकृति के समस्त सौंदर्य, संपदा और समृद्धि का प्रतीक माना गया है। यह स्तोत्र न केवल भौतिक संपत्ति बल्कि आध्यात्मिक शुद्धि और शांति का भी मार्गदर्शन करता है। श्री सूक्तम् का पाठ करने से व्यक्ति के जीवन में स्थिरता, सुख और समृद्धि आती है। इसे धार्मिक अनुष्ठानों, धन-पूजन और लक्ष्मी पूजन के समय विशेष रूप से पढ़ा जाता है।

श्री सूक्तम् में कुल 15 मंत्र या ऋचाएं हैं। प्रत्येक मंत्र में देवी लक्ष्मी की विभिन्न शक्तियों, स्वरूपों और गुणों का वर्णन किया गया है। इसे गायत्री छंद और अनुष्टुप छंद में रचा गया है।

  • इसमें देवी लक्ष्मी को कमल पर विराजमान, सुनहरी आभा से युक्त, शांति और सौम्यता की मूर्ति के रूप में वर्णित किया गया है।
  • हर ऋचा में उनके सौंदर्य, करुणा, दयालुता और उनकी कृपा से प्राप्त होने वाले लाभों का वर्णन किया गया है।

श्री सूक्तम् का पाठ मुख्य रूप से चार उद्देश्यों के लिए किया जाता है:

  1. धन प्राप्ति: धन की देवी लक्ष्मी की कृपा से आर्थिक समस्याओं का समाधान।
  2. वैभव और समृद्धि: जीवन में ऐश्वर्य और संपन्नता लाने के लिए।
  3. आध्यात्मिक उन्नति: आत्मिक शांति और आध्यात्मिक जागरण के लिए।
  4. संतुलित जीवन: भौतिक और आध्यात्मिक जीवन के बीच सामंजस्य स्थापित करने के लिए।

श्री सूक्तम् में देवी लक्ष्मी के स्वरूप

श्री सूक्तम् में देवी लक्ष्मी को प्रकृति की प्रधान देवी बताया गया है। उन्हें कमल के फूल पर विराजमान, चार भुजाओं वाली, सोने के आभूषणों से सुसज्जित और मुस्कान से युक्त दर्शाया गया है। उनके हाथों में कमल, शंख, चक्र और अभय मुद्रा होती है।

  • कमल: शुद्धता और दिव्यता का प्रतीक।
  • सोना और आभूषण: भौतिक समृद्धि और ऐश्वर्य।
  • अभय मुद्रा: भक्तों को भयमुक्त करने का संकेत।

श्री सूक्तम् पाठ का समय और विधि

श्री सूक्तम् का पाठ प्रातःकाल और सायं काल में विशेष फलदायक माना गया है। इसे पढ़ने से पहले स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करना चाहिए और एकाग्र मन से देवी लक्ष्मी की पूजा करनी चाहिए। पाठ के दौरान दीपक जलाना, फूल और नैवेद्य अर्पित करना शुभ होता है।

  • इसे शुद्ध उच्चारण और श्रद्धा के साथ पढ़ना चाहिए।
  • शुक्रवार के दिन श्री सूक्तम् का पाठ विशेष लाभकारी माना गया है।

श्री सूक्तम् के लाभ

  1. धन की वृद्धि और आर्थिक समृद्धि।
  2. मानसिक शांति और आत्मविश्वास में वृद्धि।
  3. कर्ज और आर्थिक समस्याओं से मुक्ति।
  4. व्यवसाय और नौकरी में सफलता।
  5. परिवार में सुख-शांति और समृद्धि।
Mahalaxmi
Sri Suktam in Sanskrit

श्री सूक्तम् Sri Suktam in Sanskrit

ओम् ॥ हिर॑ण्यवर्णां॒ हरि॑णीं सु॒वर्ण॑रज॒तस्र॑जाम् ।
च॒न्द्रां हि॒रण्म॑यीं-लँ॒क्ष्मी-ञ्जात॑वेदो म॒माव॑ह ॥

ता-म्म॒ आव॑ह॒ जात॑वेदो ल॒क्ष्मीमन॑पगा॒मिनी᳚म् ।
यस्यां॒ हिर॑ण्यं-विँ॒न्देय॒-ङ्गामश्व॒-म्पुरु॑षान॒हम् ॥

अ॒श्व॒पू॒र्वां र॑थम॒ध्यां ह॒स्तिना॑द-प्र॒बोधि॑नीम् ।
श्रिय॑-न्दे॒वीमुप॑ह्वये॒ श्रीर्मा॑ दे॒वीर्जु॑षताम् ॥

कां॒सो᳚स्मि॒ तां हिर॑ण्यप्रा॒कारा॑मा॒र्द्रा-ञ्ज्वल॑न्ती-न्तृ॒प्ता-न्त॒र्पय॑न्तीम् ।
प॒द्मे॒ स्थि॒ता-म्प॒द्मव॑र्णा॒-न्तामि॒होप॑ह्वये॒ श्रियम् ॥

च॒न्द्रा-म्प्र॑भा॒सां-यँ॒शसा॒ ज्वल॑न्तीं॒ श्रियं॑-लोँ॒के दे॒वजु॑ष्टामुदा॒राम् ।
ता-म्प॒द्मिनी॑मीं॒ शर॑णम॒ह-म्प्रप॑द्ये-ऽल॒क्ष्मीर्मे॑ नश्यता॒-न्त्वां-वृँ॑णे ॥

आ॒दि॒त्यव॑र्णे॒ तप॒सो-ऽधि॑जा॒तो वन॒स्पति॒स्तव॑ वृ॒क्षो-ऽथ॑ बि॒ल्वः ।
तस्य॒ फला॑नि॒ तप॒सानु॑दन्तु मा॒यान्त॑रा॒याश्च॑ बा॒ह्या अ॑ल॒क्ष्मीः ॥

उपै॑तु॒ मा-न्दे॑वस॒खः की॒र्तिश्च॒ मणि॑ना स॒ह ।
प्रा॒दु॒र्भू॒तो-ऽस्मि॑ राष्ट्रे॒-ऽस्मिन् की॒र्ति॒मृ॑द्धि-न्द॒दातु॑ मे ॥

क्षु॒त्पि॒पा॒साम॑ला-ञ्ज्ये॒ष्ठाम॒ल॒क्षी-र्ना॑शया॒म्यहम् ।
अभू॑ति॒मस॑मृद्धि॒-ञ्च स॒र्वा॒-न्निर्णु॑द मे॒ गृहात् ॥

ग॒न्ध॒द्वा॒रा-न्दु॑राध॒र्​षा॒-न्नि॒त्यपु॑ष्टा-ङ्करी॒षिणी᳚म् ।
ई॒श्वरीग्ं॑ सर्व॑भूता॒ना॒-न्तामि॒होप॑ह्वये॒ श्रियम् ॥

श्री᳚र्मे भ॒जतु । अल॒क्षी᳚र्मे न॒श्यतु ।

मन॑सः॒ काम॒माकू॑तिं-वाँ॒च-स्स॒त्यम॑शीमहि ।
प॒शू॒नाग्ं रू॒पमन्य॑स्य॒ मयि॒ श्री-श्श्र॑यतां॒-यँशः॑ ॥

क॒र्दमे॑न प्र॑जाभू॒ता॒ म॒यि॒ सम्भ॑व क॒र्दम ।
श्रियं॑-वाँ॒सय॑ मे कु॒ले॒ मा॒तर॑-म्पद्म॒मालि॑नीम् ॥

आपः॑ सृ॒जन्तु॑ स्नि॒ग्धा॒नि॒ चि॒क्ली॒त व॑स मे॒ गृहे ।
नि च॑ दे॒वी-म्मा॒तरं॒ श्रियं॑-वाँ॒सय॑ मे कु॒ले ॥

आ॒र्द्रा-म्पु॒ष्करि॑णी-म्पु॒ष्टिं॒ पि॒ङ्ग॒ला-म्प॑द्ममा॒लिनीम् ।
च॒न्द्रां हि॒रण्म॑यीं-लँ॒क्ष्मी-ञ्जात॑वेदो म॒माव॑ह ॥

आ॒र्द्रां-यँः॒ करि॑णीं-यँ॒ष्टिं॒ सु॒व॒र्णां हे॑ममा॒लिनीम् ।
सू॒र्यां हि॒रण्म॑यीं-लँ॒क्ष्मी॒-ञ्जात॑वेदो म॒माव॑ह ॥

ता-म्म॒ आव॑ह॒ जात॑वेदो ल॒क्षीमन॑पगा॒मिनी᳚म् ।
यस्यां॒ हिर॑ण्य॒-म्प्रभू॑त॒-ङ्गावो॑ दा॒स्यो-ऽश्वा᳚न्, वि॒न्देय॒-म्पुरु॑षान॒हम् ॥

यश्शुचिः॑ प्रयतो भू॒त्वा॒ जु॒हुया॑-दाज्य॒-मन्व॑हम् ।
श्रियः॑ प॒ञ्चद॑शर्च-ञ्च श्री॒काम॑स्सत॒त॒-ञ्ज॑पेत् ॥

आनन्दः कर्द॑मश्चै॒व चिक्ली॒त इ॑ति वि॒श्रुताः ।
ऋष॑य॒स्ते त्र॑यः पुत्रा-स्स्व॒यं॒ श्रीरे॑व दे॒वता ॥

पद्मानने प॑द्म ऊ॒रू॒ प॒द्माक्षी प॑द्मस॒म्भवे ।
त्व-म्मा᳚-म्भ॒जस्व॑ पद्मा॒क्षी ये॒न सौख्यं॑-लँभा॒म्यहम् ॥

अ॒श्वदा॑यी च गोदा॒यी॒ ध॒नदा॑यी म॒हाध॑ने ।
धन॑-म्मे॒ जुष॑ता-न्दे॒वी स॒र्वका॑मार्थ॒ सिद्ध॑ये ॥

पुत्रपौत्र धन-न्धान्यं हस्त्यश्वाजाविगो रथम् ।
प्रजाना-म्भवसि माता आयुष्मन्त-ङ्करोतु माम् ॥

चन्द्राभां-लँक्ष्मीमीशानां सूर्याभां᳚ श्रियमीश्वरीम् ।
चन्द्र सूर्याग्नि सर्वाभां श्री महालक्ष्मी-मुपास्महे ॥

धन-मग्नि-र्धनं-वाँयु-र्धनं सूर्यो॑ धनं-वँसुः ।
धनमिन्द्रो बृहस्पति-र्वरु॑ण-न्धनम॑श्नुते ॥

वैनतेय सोम-म्पिब सोम॑-म्पिबतु वृत्रहा ।
सोम॒-न्धनस्य सोमिनो॒ मह्य॑-न्ददातु सोमिनी॑ ॥

न क्रोधो न च मात्स॒र्य-न्न लोभो॑ नाशुभा मतिः ।
भवन्ति कृत पुण्याना-म्भ॒क्तानां श्री सू᳚क्त-ञ्जपेत्सदा ॥

वर्​ष᳚न्तु॒ ते वि॑भाव॒रि॒ दि॒वो अभ्रस्य विद्यु॑तः ।
रोह᳚न्तु सर्व॑बीजान्यव ब्रह्म द्वि॒षो᳚ ज॑हि ॥

पद्मप्रिये पद्मिनि पद्महस्ते पद्मालये पद्म-दलायताक्षी ।
विश्वप्रिये विष्णु मनोनुकूले त्वत्पादपद्म-म्मयि सन्निधत्स्व ॥

या सा पद्मासनस्था विपुलकटितटी पद्मपत्रायताक्षी ।
गम्भीरा वर्तनाभि-स्स्तनभरनमिता शुभ्र वस्तोत्तरीया ॥

लक्ष्मी-र्दिव्यै-र्गजेन्द्रै-र्मणिगण खचितै-स्स्नापिता हेमकुम्भैः ।
नित्यं सा पद्महस्ता मम वसतु गृहे सर्व माङ्गल्ययुक्ता ॥

लक्ष्मी-ङ्क्षीर समुद्र राजतनयां श्रीरङ्ग धामेश्वरीम् ।
दासीभूत समस्त देव वनितां-लोँकैक दीपाङ्कुराम् ।
श्रीमन्मन्द कटाक्ष लब्ध विभव ब्रह्मेन्द्र गङ्गाधराम् ।
त्वा-न्त्रैलोक्य कुटुम्बिनीं सरसिजां-वँन्दे मुकुन्दप्रियाम् ॥

सिद्धलक्ष्मी-र्मोक्षलक्ष्मी-र्जयलक्ष्मी-स्सरस्वती ।
श्रीलक्ष्मी-र्वरलक्ष्मीश्च प्रसन्ना मम सर्वदा ॥

वराङ्कुशौ पाशमभीति मुद्राम् ।
करैर्वहन्ती-ङ्कमलासनस्थाम् ।
बालार्ककोटि प्रतिभा-न्त्रिनेत्राम् ।
भजे-ऽहमम्बा-ञ्जगदीश्वरी-न्ताम् ॥

सर्वमङ्गल माङ्गल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके ।
शरण्ये त्य्रम्बके देवी नारायणि नमोस्तुते ॥

ओ-म्म॒हा॒दे॒व्यै च॑ वि॒द्महे॑ विष्णुप॒त्नी च॑ धीमहि ।
तन्नो॑ लक्ष्मीः प्रचो॒दया᳚त् ॥

श्री-र्वर्च॑स्व॒-मायु॑ष्य॒-मारो᳚ग्य॒-मावी॑धा॒त्-शोभ॑मान-म्मही॒यते᳚ ।
धा॒न्य-न्ध॒न-म्प॒शु-म्ब॒हुपु॑त्रला॒भं श॒तसं᳚​वँत्स॒र-न्दी॒र्घमायुः॑ ॥

ॐ शान्ति॒-श्शान्ति॒-श्शान्तिः॑ ॥

श्री सूक्तम् केवल एक धार्मिक पाठ नहीं है, बल्कि यह मानव जीवन में सुख-समृद्धि और आत्मिक शांति का मार्ग प्रशस्त करता है। इसे श्रद्धा और विश्वास के साथ पढ़ने से न केवल भौतिक बल्कि आध्यात्मिक लाभ भी प्राप्त होते हैं। श्री सूक्तम् के माध्यम से देवी लक्ष्मी की कृपा प्राप्त कर व्यक्ति अपने जीवन को धन्य बना सकता है।

हिरण्य गर्भ सूक्तम्
पितृ सूक्तम्
सर्प सूक्तम्
मृत्तिका सूक्तम् (महानारायण उपनिषद्)
दुर्वा सूक्तम् (महानारायण उपनिषद्)
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