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SanatanWeb.com > Blog > गीतकाव्य > कवचम् > सरस्वती कवचम्
कवचम्सरस्वती स्तोत्रस्तोत्र

सरस्वती कवचम्

Sanatani
Last updated: जनवरी 22, 2026 5:31 अपराह्न
Sanatani
Published: जनवरी 22, 2026
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सरस्वती कवचम् (Saraswati Kavach) एक शक्तिशाली स्तोत्र है, जो माता सरस्वती की कृपा प्राप्त करने के लिए पढ़ा जाता है। यह कवच विद्या, बुद्धि, स्मरण शक्ति और वाणी में सुधार लाने के लिए अत्यंत प्रभावशाली माना जाता है। विद्यार्थी, विद्वान, संगीतकार, लेखक और वक्ता इस कवच का नित्य पाठ करने से विशेष लाभ प्राप्त करते हैं। यह कवच साधक को आत्मविश्वास प्रदान करता है और उसे आध्यात्मिक रूप से भी सशक्त बनाता है।

Contents
  • Saraswati Kavach
  • सरस्वती कवच के लाभ
  • सरस्वती कवच के जप की विधि

Saraswati Kavach

सरस्वती कवचम् संस्कृत भाषा में रचित है और इसे विशेष रूप से परीक्षा, लेखन, संगीत अभ्यास या कोई नई विद्या सीखने से पहले पढ़ना शुभ माना जाता है। इसका पाठ इस प्रकार है—

(ब्रह्मवैवर्त महापुराणांतर्गतं)

भृगुरुवाच ।
ब्रह्मन्ब्रह्मविदांश्रेष्ठ ब्रह्मज्ञानविशारद ।
सर्वज्ञ सर्वजनक सर्वपूजकपूजित ॥ 60

सरस्वत्याश्च कवचं ब्रूहि विश्वजयं प्रभो ।
अयातयाममंत्राणां समूहो यत्र संयुतः ॥ 61 ॥

ब्रह्मोवाच ।
शृणु वत्स प्रवक्ष्यामि कवचं सर्वकामदम् ।
श्रुतिसारं श्रुतिसुखं श्रुत्युक्तं श्रुतिपूजितम् ॥ 62 ॥

उक्तं कृष्णेन गोलोके मह्यं वृंदावने वने ।
रासेश्वरेण विभुना रासे वै रासमंडले ॥ 63 ॥

अतीव गोपनीयंच कल्पवृक्षसमं परम् ।
अश्रुताद्भुतमंत्राणां समूहैश्च समन्वितम् ॥ 64 ॥

यद्धृत्वा पठनाद्ब्रह्मन्बुद्धिमांश्च बृहस्पतिः ।
यद्धृत्वा भगवांछुक्रः सर्वदैत्येषु पूजितः ॥ 65 ॥

पठनाद्धारणाद्वाग्मी कवींद्रो वाल्मिकी मुनिः ।
स्वायंभुवो मनुश्चैव यद्धृत्वा सर्वपूजिताः ॥ 66 ॥

कणादो गौतमः कण्वः पाणिनिः शाकटायनः ।
ग्रंथं चकार यद्धृत्वा दक्षः कात्यायनः स्वयम् ॥ 67 ॥

धृत्वा वेदविभागंच पुराणान्यखिलानि च ।
चकार लीलामात्रेण कृष्णद्वैपायनः स्वयम् ॥ 68 ॥

शातातपश्च संवर्तो वसिष्ठश्च पराशरः ।
यद्धृत्वा पठनाद्ग्रंथं याज्ञवल्क्यश्चकार सः ॥ 69 ॥

ऋष्यशृंगो भरद्वाजश्चास्तीको देवलस्तथा ।
जैगीषव्योऽथ जाबालिर्यद्धृत्वा सर्वपूजितः ॥ 70 ॥

कवचस्यास्य विप्रेंद्र ऋषिरेष प्रजापतिः ।
स्वयं बृहस्पतिश्छंदो देवो रासेश्वरः प्रभुः ॥ 71 ॥

सर्वतत्त्वपरिज्ञाने सर्वार्थेऽपि च साधने ।
कवितासु च सर्वासु विनियोगः प्रकीर्तितः ॥ 72 ॥

( कवचं )
ॐ ह्रीं सरस्वत्यै स्वाहा शिरो मे पातु सर्वतः ।
श्रीं वाग्देवतायै स्वाहा भालं मे सर्वदाऽवतु ॥ 73 ॥

ॐ ह्रीं सरस्वत्यै स्वाहेति श्रोत्रे पातु निरंतरम् ।
ॐ श्रीं ह्रीं भगवत्यै सरस्वत्यै स्वाहा नेत्रयुग्मं सदाऽवतु ॥ 74 ॥

ऐं ह्रीं वाग्वादिन्यै स्वाहा नासां मे सर्वदाऽवतु ।
ह्रीं विद्याधिष्ठातृदेव्यै स्वाहा चोंष्ठ सदाऽवतु ॥ 75 ॥

ॐ श्रीं ह्रीं ब्राह्म्यै स्वाहेति दंतपंक्तिं सदाऽवतु ।
ऐमित्येकाक्षरो मंत्रो मम कंठं सदाऽवतु ॥ 76 ॥

ॐ श्रीं ह्रीं पातु मे ग्रीवां स्कंधं मे श्रीं सदाऽवतु ।
ॐ ह्रीं विद्याधिष्ठातृदेव्यै स्वाहा वक्षः सदाऽवतु ॥ 77 ॥

ॐ ह्रीं विद्यास्वरूपायै स्वाहा मे पातु नाभिकाम् ।
ॐ ह्रीं क्लीं वाण्यै स्वाहेति मम पृष्ठं सदाऽवतु ॥ 78 ॥

ॐ सर्ववर्णात्मिकायै पादयुग्मं सदाऽवतु ।
ॐ रागाधिष्ठातृदेव्यै सर्वांगं मे सदाऽवतु ॥ 79 ॥

ॐ सर्वकंठवासिन्यै स्वाहा प्रच्यां सदाऽवतु ।
ॐ ह्रीं जिह्वाग्रवासिन्यै स्वाहाऽग्निदिशि रक्षतु ॥ 80 ॥

ॐ ऐं ह्रीं श्रीं सरस्वत्यै बुधजनन्यै स्वाहा ।
सततं मंत्रराजोऽयं दक्षिणे मां सदाऽवतु ॥ 81 ॥

ॐ ह्रीं श्रीं त्र्यक्षरो मंत्रो नैरृत्यां मे सदाऽवतु ।
कविजिह्वाग्रवासिन्यै स्वाहा मां वारुणेऽवतु ॥ 82 ॥

ॐ सदंबिकायै स्वाहा वायव्ये मां सदाऽवतु ।
ॐ गद्यपद्यवासिन्यै स्वाहा मामुत्तरेऽवतु ॥ 83 ॥

ॐ सर्वशास्त्रवासिन्यै स्वाहैशान्यां सदाऽवतु ।
ॐ ह्रीं सर्वपूजितायै स्वाहा चोर्ध्वं सदाऽवतु ॥ 84 ॥

ऐं ह्रीं पुस्तकवासिन्यै स्वाहाऽधो मां सदावतु ।
ॐ ग्रंथबीजरूपायै स्वाहा मां सर्वतोऽवतु ॥ 85 ॥

इति ते कथितं विप्र सर्वमंत्रौघविग्रहम् ।
इदं विश्वजयं नाम कवचं ब्रह्मारूपकम् ॥ 86 ॥

पुरा श्रुतं धर्मवक्त्रात्पर्वते गंधमादने ।
तव स्नेहान्मयाऽऽख्यातं प्रवक्तव्यं न कस्यचित् ॥ 87 ॥

गुरुमभ्यर्च्य विधिवद्वस्त्रालंकारचंदनैः ।
प्रणम्य दंडवद्भूमौ कवचं धारयेत्सुधीः ॥ 88 ॥

पंचलक्षजपेनैव सिद्धं तु कवचं भवेत् ।
यदि स्यात्सिद्धकवचो बृहस्पति समो भवेत् ॥ 89 ॥

महावाग्मी कवींद्रश्च त्रैलोक्यविजयी भवेत् ।
शक्नोति सर्वं जेतुं स कवचस्य प्रभावतः ॥ 90 ॥

इदं ते काण्वशाखोक्तं कथितं कवचं मुने ।
स्तोत्रं पूजाविधानं च ध्यानं वै वंदनं तथा ॥ 91 ॥

इति श्री ब्रह्मवैवर्ते महापुराणे प्रकृतिखंडे नारदनारायणसंवादे सरस्वतीकवचं नाम चतुर्थोऽध्यायः ।

सरस्वती कवच के लाभ

  1. बुद्धि और स्मरण शक्ति में वृद्धि – यह कवच विद्यार्थियों और शोधकर्ताओं के लिए अत्यंत लाभकारी है।
  2. वाणी में मधुरता और प्रभाव – वक्तृत्व कला, गायन और लेखन में निपुणता बढ़ती है।
  3. विद्या और ज्ञान की प्राप्ति – यह कवच अध्ययन में रुचि बढ़ाता है और समझने की क्षमता को तेज करता है।
  4. आत्मविश्वास में वृद्धि – परीक्षा, प्रतियोगिता और साक्षात्कार में सफलता पाने के लिए यह कवच सहायक है।
  5. नकारात्मकता और जड़ता का नाश – यह आलस्य और अज्ञान को दूर कर सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करता है।

सरस्वती कवच के जप की विधि

  • प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
  • माता सरस्वती की प्रतिमा के समक्ष दीपक जलाएं।
  • सफेद पुष्प, चंदन और नैवेद्य अर्पित करें।
  • सरस्वती बीज मंत्र “ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः” का 108 बार जाप करें।
  • तत्पश्चात सरस्वती कवच का पाठ करें।
  • पाठ के बाद माता सरस्वती से विद्या और वाणी में प्रखरता की प्रार्थना करें।

सरस्वती कवचम् केवल एक धार्मिक पाठ ही नहीं, बल्कि आत्मिक और मानसिक बल प्रदान करने वाला एक प्रभावशाली साधन भी है। इसके नित्य पाठ से जीवन में विद्या, बुद्धि और सफलता का मार्ग प्रशस्त होता है। जो भी व्यक्ति ज्ञान और शिक्षा के क्षेत्र में उन्नति चाहता है, उसके लिए यह कवच अत्यंत लाभकारी है।

दत्तात्रेय वज्र कवचम्
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श्यामला दंडकम् – ஷ்யாமளா தண்டகம்
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