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धार्मिक पुस्तकेवेद

ऋग्वेद हिंदी में

Sanatani
Last updated: फ़रवरी 13, 2026 8:00 अपराह्न
Sanatani
Published: फ़रवरी 13, 2026
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ऋग्वेद हिंदी में | Rigveda in Hindi

ऋग्वेद (Rigveda in Hindi) अर्थात “ऋचाओं का ज्ञान” वैदिक साहित्य का प्राचीनतम और सबसे महत्वपूर्ण ग्रंथ है। यह सनातन हिंदू धर्म के चार वेद ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद में प्रथम वेद है और विश्व के सबसे पुराने धार्मिक ग्रंथों में से एक माना जाता है। इसे मानवता का उद्धार करने वाली पहली पुस्तक भी कहा जाता है। यह मुख्य रूप से देवताओं की स्तुति, पूजा पद्धति, हवन, प्रकृति, ब्रह्मांड, और मानव जीवन के रहस्यों को विस्तार से प्रकाशित करती है।

Contents
  • ऋग्वेद हिंदी में | Rigveda in Hindi
  • ऋग्वेद हिंदी में
  • ऋग्वेद भारतीय साहित्य के प्राचीनतम ग्रंथ का सम्पूर्ण परिचय :-
  • ऋग्वेद की उत्पत्ति और रचना | Origin of Rigveda in Hindi
  • ऋग्वेद की संरचना (अनुक्रमणिका) | Index of Rigveda
  • सामग्री और विषय-वस्तु
  • ऋग्वेद के महत्व और प्रभाव – Rigveda Importane
  • संरक्षण और प्रसारण
    • ऋग्वेद का संग्रह | Rigveda Sangrah
    • ऋग्वेद की भाषा | Rigveda Language
    • ऋग्वेद के विषय
  • ऋग्वेद में दर्शाएँ गए प्रमुख देवता – Devtas of Rigveda
  • ऋग्वेद के प्रमुख ऋषियों का उलेख़ – Rishi of Rigveda
  • ऋग्वेद के विभिन्न सूक्त | Rigveda Suktas
  • Rigveda pdf download in hindi

ऋग्वेद हिंदी में

ऋग्वेद भारतीय साहित्य के प्राचीनतम ग्रंथ का सम्पूर्ण परिचय :-

ऋग्वेद मुख्य रूप से वैदिक संस्कृत भाषा मे है औरआगे जाके यह ग्रन्थ को कई और भाखा में रूपांतरित किया गया है जिनमे से मुख्य रूप से ऋग्वेद को हिंदी में भी भाषांतरित किया गया है। ऋग्वेद, प्राचीन संस्कृत मंत्रो का एक पवित्र संग्रह है, जो भारतीय साहित्य और धार्मिक परंपराओं में सबसे महत्वपूर्ण ग्रंथों में से एक है। लगभग 1500-1200 ईसा पूर्व या उससे पहले रचित, यह प्राचीन शास्त्र शुरुआती इंडो-आर्यों के विश्वासों, अनुष्ठानों और सामाजिक मापदंडों में एक अमूल्य ज्ञान प्रदान करता है। अपनी गहरी आध्यात्मिक अंतर्दृष्टि, काव्य प्रतिभा और ऐतिहासिक महत्व के साथ, ऋग्वेद विद्वानों, शोधकर्ताओं और आध्यात्मिक साधकों को समान रूप से आकर्षित करता रहा है। यह ग्रंथ भारतीय दार्शनिक और आध्यात्मिक धारणाओं का महत्वपूर्ण स्रोत है।

rigveda
rigveda Pandulipi(Manuscript)

ऋग्वेद की उत्पत्ति और रचना | Origin of Rigveda in Hindi

ऋग्वेद, संस्कृत शब्द “ऋक्” (प्रशंसा) और “वेद” (ज्ञान) से लिया गया है, जो वैदिक लोगों द्वारा पूजे जाने वाले विभिन्न देवताओं को समर्पित श्लोको के संकलन का प्रतिनिधित्व करता है। इसकी उत्पत्ति का पता भारतीय उपमहाद्वीप के उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र में लगाया जा सकता है, जहाँ इंडो-आर्यन सभ्यता पनपी थी। ऋग्वेद को में आठ अष्टक और हर एक अष्टक में आठ अध्याय है सब मिलके चौसठ अध्याय होते हैं। आठो अष्टक को २०२४ वर्गों में विभाजित किया गया है। तथा इसमें १० मंडल है सभी मंडलों को मिलकर १०२८ सूक्त और १०५८९ मंत्र दिए गए हैं।

ऋग्वेद की संरचना (अनुक्रमणिका) | Index of Rigveda

ऋग्वेद के मंत्र मुख्य रूप से अग्नि, इंद्र, वरुण, सूर्य, सोम और अन्य वैदिक देवताओं को संबोधित हैं। प्रत्येक मंडल में अलग-अलग ऋषियों के योगदान हैं, जिनमें विश्वामित्र, वशिष्ठ, और भारद्वाज जैसे महान ऋषि शामिल हैं। इस ग्रंथ में छंदबद्ध काव्य शैली का प्रयोग किया गया है, जो इसे साहित्यिक दृष्टिकोण से भी अद्वितीय बनाता है।

मंडल (अध्याय)
1 मंडल (प्रथम मंडल)191 सूक्त
2 मंडल (द्वितीय मंडल)43 सूक्त
3 मंडल (तृतीय मंडल)62 सूक्त
4 मंडल (चतुर्थ मंडल)58 सूक्त
5 मंडल (पंचम मंडल)87 सूक्त
6 मंडल (षष्ठ मंडल)75 सूक्त
7 मंडल (सप्तम मंडल)104 सूक्त
8 मंडल (अष्टम मंडल)103 सूक्त
9 मंडल (नवम मंडल)114 सूक्त
10 मंडल (दशम मंडल)191 सूक्त
  • मंडल 1–7: “परिवार-केंद्रित” – प्रत्येक मंडल किसी एक ऋषि परिवार द्वारा रचित।
  • मंडल 8–9: सोम यज्ञ और विशिष्ट अनुष्ठानों पर केंद्रित।
  • मंडल 10: दार्शनिक प्रश्न, सामाजिक मूल्य, और ब्रह्मांड विज्ञान पर गहन चिंतन।

यह संरचना ऋग्वेद को न केवल धार्मिक बल्कि बौद्धिक और वैज्ञानिक दृष्टि से भी अद्वितीय बनाती है। प्रत्येक मंडल की अपनी विशिष्टता है, जो वैदिक ऋषियों की बहुमुखी प्रतिभा को प्रदर्शित करती है।

सामग्री और विषय-वस्तु

ऋग्वेद में विषयों की एक विविध श्रेणी शामिल है: ब्रह्मांड विज्ञान, रिवाज, पौराणिक कथा, नैतिकता, दार्शनिक चिंतन भजन मुख्य रूप से इंद्र, अग्नि, वरुण, वायु और कई अन्य देवताओं के देवताओं को समर्पित हैं। इन देवताओं का आह्वान वैदिक लोगों को समृद्धि, सुरक्षा और ज्ञान का आशीर्वाद देने के लिए किया गया था। ऋग्वेद के छंद भी वैदिक समाज के दैनिक जीवन, सामाजिक संरचना और धार्मिक प्रथाओं में अंतर्दृष्टि प्रदान करते हैं। वे बलिदान अनुष्ठानों के महत्व, प्रकृति और खगोलीय पिंडों के प्रति सम्मान, पशु धन के महत्व और देवताओं और मनुष्यों के बीच मध्यस्थ के रूप में पुजारियों की भूमिका को दर्शाते हैं। इसके अतिरिक्त, भजन भाषण की शक्ति का जश्न मनाते हैं, काव्य उत्साह व्यक्त करते हैं, और अस्तित्व के रहस्यों पर चिंतन करते हैं।

ऋग्वेद के महत्व और प्रभाव – Rigveda Importane

भारतीय उपमहाद्वीप में ऋग्वेद का अत्यधिक सांस्कृतिक, धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व है। इसने बाद के वैदिक ग्रंथों की नींव के रूप में कार्य किया और हिंदू धर्म के विकास को प्रभावित किया। इसकी दार्शनिक पूछताछ ने उपनिषदों के लिए नींव रखी, जो आध्यात्मिक और आध्यात्मिक अवधारणाओं में गहराई से उतरे। ऋग्वैदिक भजन बाद के हिंदू ग्रंथों जैसे भगवद गीता और रामायण में भी गूँज पाते हैं। इसके अलावा, ऋग्वेद प्राचीन इंडो-आर्यन सभ्यता के भाषाई, सामाजिक-सांस्कृतिक और धार्मिक पहलुओं पर प्रकाश डालता है। यह वैदिक लोगों के प्रवास पैटर्न, सामाजिक पदानुक्रम और धार्मिक अनुष्ठानों के बारे में बहुमूल्य जानकारी प्रदान करता है। यह पाठ प्राचीन भारत की समृद्ध बौद्धिक और कलात्मक परंपराओं के लिए एक वसीयतनामा के रूप में कार्य करता है और विभिन्न क्षेत्रों में विद्वानों और शोधकर्ताओं को प्रेरित करता रहता है।

ऋग्वेद में संकलित ऋचाओं के माध्यम से भारतीय संस्कृति की अविराम विकास यात्रा का प्रतिवेदन किया जाता है। इसमें विभिन्न देवताओं की प्रशंसा, पृथ्वी, आकाश, आदित्य, अग्नि, वायु, वरुण, मरुत, इंद्र, विष्णु, आदि के महत्वपूर्ण मंत्र संकलित हैं। यह ग्रंथ अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि इसके माध्यम से हमें विशाल संस्कृति, धार्मिक आचरण और भारतीय जीवनशैली का ज्ञान प्राप्त होता है।

ऋग्वेद की महत्वपूर्णता का एक अभिप्रेत उदाहरण है कि इसे वेदिक साहित्य का प्रथम और मुख्य स्तंभ माना जाता है। इसका अर्थ है कि ऋग्वेद ने भारतीय साहित्य के नीचे एक मजबूत आधार रखा है और अन्य साहित्यिक कृतियों के विकास को प्रेरित किया है। इसके साथ ही, ऋग्वेद में संकलित मंत्रों का पाठ अग्नि-यज्ञों में होता था और इसे भारतीय धार्मिक परंपरा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।

संरक्षण और प्रसारण

ऋग्वेद का संरक्षण और प्रसारण मुख्य रूप से मौखिक परंपराएं थीं। कुशल पुजारी, जिन्हें ब्राह्मण के रूप में जाना जाता है, भजनों को अत्यंत सटीकता के साथ याद करने और पढ़ने के लिए जिम्मेदार थे। मौखिक प्रसारण ने सदियों तक ऋग्वेद की दीर्घायु सुनिश्चित की, इससे पहले कि यह अंततः बाद के काल में लिखा गया। ज्ञान के इस विशाल निकाय के संरक्षण के लिए भजनों के सही उच्चारण, उच्चारण और मीटर को बनाए रखने के लिए सावधानीपूर्वक प्रयासों की आवश्यकता थी।

ऋग्वेद का संग्रह | Rigveda Sangrah

ऋग्वेद का संग्रह चार प्रमुख संहिताओं से मिलकर बना हुआ है।

  1. मण्डल संहिता: ऋग्वेद की यह संहिता सबसे प्राचीन और सबसे महत्वपूर्ण है। इसमें 10 मण्डलों में 1028 सूक्त शामिल हैं। प्रत्येक मण्डल में अनेक ऋषियों के द्वारा रचित मंत्र हैं जो विभिन्न देवताओं की प्रशंसा करते हैं।
  2. यजुर्वेद संहिता: इस संहिता में ऋग्वेद के मंत्रों के साथ-साथ विभिन्न यज्ञों के संबंध में मंत्रों का संकलन है। यह संहिता दो भागों में विभाजित है: कृष्ण यजुर्वेद और शुक्ल यजुर्वेद।
  3. सामवेद संहिता: यह संहिता ऋग्वेद के मंत्रों को संगीत के रूप में प्रस्तुत करती है। इसमें ऋग्वेद के मंत्रों की पठन पद्धति बदलकर संगीतीय रूप में प्रदर्शित की जाती है।
  4. अथर्ववेद संहिता: यह संहिता ऋग्वेद की अन्यतम संहिता है और इसमें भूतपूर्व और भविष्यत्काल की बातें, ज्योतिषीय ज्ञान, नुस्खे दर्शाए गए है।

ऋग्वेद की भाषा | Rigveda Language

ऋग्वेद की भाषा संस्कृत में है और वह संस्कृत के प्राचीनतम रूपों में से एक है। इसमें ऋग्वेदीय संस्कृत का प्रयोग होता है, जिसमें विशेष व्याकरण और शब्दावली के नियम होते हैं।

इस ग्रंथ के मंत्रों में अलंकार, छंद और उपमा का प्रयोग होता है। यह भाषा विशेषता से प्रस्तुत होती है, जिससे ध्वनियों का मनोहारी संगम होता है। भाषा की इस खूबसूरती ने ऋग्वेद को एक आकर्षक और अद्वितीय ग्रंथ बनाया है।

ऋग्वेद के विषय

ऋग्वेद में विभिन्न विषयों पर मंत्र संकलित हैं। इसमें देवताओं, प्रकृति तत्वों, यज्ञों, ऋषियों, सत्यता, आदर्शों, मनुष्यता, ज्ञान, आनंद और आध्यात्मिकता जैसे विषयों पर व्याख्यान किया गया है। इन मंत्रों के माध्यम से भारतीय संस्कृति और धार्मिक तत्वों का महत्वपूर्ण प्रचार हुआ है।

ऋग्वेद में दर्शाएँ गए प्रमुख देवता – Devtas of Rigveda

ऋग्वेद में कई प्रमुख देवताएं उल्लेखित हैं। इनमें से कुछ महत्वपूर्ण देवताएं हैं:

  1. अग्नि: अग्नि ऋग्वेद में प्रमुख देवता है। इसे अग्नि-देव, अग्नि-मुख और अग्नि-विश्वानि के नाम से भी जाना जाता है। अग्नि को प्रकृति के देवता, ज्ञान का प्रतीक और यज्ञों का प्रमुख कारक माना जाता है।
  2. इंद्र: ऋग्वेद में इंद्र को महादेव, सहस्राक्ष, सौरी, वज्री आदि नामों से जाना जाता है। यह देवता सबसे प्रमुख और शक्तिशाली देवता माना जाता है। उसकी शक्ति, वीरता और विजय के विषय में कई मंत्रों में वर्णन किया गया है।
  3. वरुण: वरुण ऋग्वेद में जल और अध्यात्म का देवता माना जाता है। इसे जल-राजा और अनंत स्वधा के नाम से भी जाना जाता है। वरुण की प्रकृति के प्रतिबिम्ब के साथ-साथ उसकी दया, वरदान और दण्ड के विषय में कई मंत्रों में व्याख्यान किया गया है।
  4. वायु: ऋग्वेद में वायुदेव का भी वर्णन मिलता है।

ऋग्वेद के प्रमुख ऋषियों का उलेख़ – Rishi of Rigveda

ऋग्वेद में कई प्रमुख ऋषियों के नाम उल्लेखित हैं। इनमें से कुछ महत्वपूर्ण ऋषियों के बारे में जानते हैं:

  1. ऋषि विश्वामित्र: ऋषि विश्वामित्र ऋग्वेद के मशहूर ऋषियों में से एक हैं। उन्होंने कई मंत्रों का रचनाकार होने के साथ-साथ विशेष योगदान दिया है। विश्वामित्र ऋषि को तपस्वी, महर्षि और गुरु के रूप में सम्मानित किया जाता है।
  2. ऋषि वामदेव: ऋषि वामदेव ऋग्वेद के एक प्रमुख ऋषि हैं। उन्होंने मानवता, सत्यता और धर्म के विषय में गहरे विचार किए हैं। वामदेव ऋषि को ज्ञानी, तपस्वी और ध्यानी के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।
  3. ऋषि आगस्त्य: ऋषि आगस्त्य ऋग्वेद के प्रमुख ऋषि माने जाते हैं। उन्होंने धर्म, तपस्या और विज्ञान के विषय में अपूर्व ज्ञान प्राप्त किया था। आगस्त्य ऋषि को अतींद्रिय, विचारशील और महर्षि के रूप में सम्मानित किया जाता है।

ऋग्वेद के विभिन्न सूक्त | Rigveda Suktas

ऋग्वेद के विभिन्न सूक्तों में विभिन्न विषयों पर बात की गई है। इन सूक्तों में ऋषियों द्वारा देवताओं की प्रशंसा, यज्ञों की महत्वता, आध्यात्मिकता, सत्यता, ज्ञान और जीवन के मार्ग पर विचार किए गए हैं। आइए हम कुछ महत्वपूर्ण सूक्तों के बारे में जानते हैं:

  1. अग्निसूक्त: अग्नि देवता की स्तुति, यज्ञ की अग्नि को प्रज्वलित करने का आह्वान।
  2. वृत्रहनसूक्त (इंद्र-वृत्र वध): वृत्रहनसूक्त ऋग्वेद में वृत्रहन के विषय में व्याख्यान किया गया है। इस सूक्त में इंद्र की शक्ति, वीरता और विजय के बारे में वर्णन किया गया है। यह सूक्त इंद्र की प्रमुखता और उसके शौर्य को प्रशंसा करता है।
  3. विश्वरूपसूक्त: विश्वरूपसूक्त ऋग्वेद में देवताओं के विषय में बतायागया है।
  4. सूक्त 1.164 (अस्य वामीय सूक्त): रहस्यमयी प्रतीकात्मक भाषा में ब्रह्मांड, समय, और ऋत (नैतिक व्यवस्था) की चर्चा।
  5. सूक्त 1.50 (सूर्य सूक्त): सूर्य देवता के रथ और प्रकाश का वर्णन।
  6. सूक्त 2.12 (इंद्र स्तुति): इंद्र की वीरता और वर्षा लाने की शक्ति का गुणगान।
  7. सूक्त 2.23-24 (बृहस्पति सूक्त): बृहस्पति (देवगुरु) की प्रार्थना, ज्ञान और मार्गदर्शन की कामना।
  8. सूक्त 3.62.10 (गायत्री मंत्र): सवितृ (सूर्य) देवता को समर्पित, ज्ञान और प्रकाश की प्राप्ति का प्रसिद्ध मंत्र।
  9. सूक्त 3.53 (विश्वामित्र-वसिष्ठ संवाद): ऋषियों के बीच आध्यात्मिक ज्ञान का संवाद।
  10. सूक्त 4.58 (उषा सूक्त): उषा (भोर) की देवी के सौंदर्य और प्रकाश का वर्णन।
  11. सूक्त 4.26 (सोम स्तुति): सोम रस के महत्व और दिव्य प्रभाव की व्याख्या।
  12. सूक्त 5.44 (वरुण सूक्त): वरुण (जल और नैतिकता के देवता) की स्तुति, पापों से मुक्ति की प्रार्थना।
  13. सूक्त 5.63 (विष्णु स्तुति): विष्णु के तीन पगों (त्रिविक्रम) द्वारा ब्रह्मांड को मापने का प्रसंग।
  14. सूक्त 6.9 (अश्विनीकुमार स्तुति): अश्विनीकुमारों (चिकित्सा और कल्याण के देवताओं) की कृपा की याचना।
  15. सूक्त 6.75 (ऋभु स्तुति): ऋभु (दिव्य कारीगर) द्वारा निर्मित अस्त्र-शस्त्रों का वर्णन।
  16. सूक्त 7.33 (सरस्वती स्तुति): सरस्वती नदी की पवित्रता और ज्ञान प्रदान करने की शक्ति का वर्णन।
  17. सूक्त 7.86 (वरुण प्रार्थना): वरुण से पापों के प्रायश्चित और मोक्ष की याचना।
  18. सूक्त 8.48 (इंद्र की शक्ति): इंद्र की वीरता और असुरों पर विजय का विस्तृत वर्णन।
  19. सूक्त 8.100 (अपां नपात): जल में निवास करने वाले देवता की स्तुति, जल की शुद्धता का महत्व।
  20. सूक्त 9.1-114 (सोम सूक्त): सम्पूर्ण मंडल सोम रस (दिव्य पेय) की महिमा को समर्पित है।
  21. सूक्त 10.90 (पुरुष सूक्त): ब्रह्मांडीय पुरुष (विराट पुरुष) की अवधारणा, जिसके अंगों से समस्त सृष्टि उत्पन्न हुई।
  22. सूक्त 10.129 (नासदीय सूक्त): सृष्टि के आदि में “अस्तित्व और अनस्तित्व” के रहस्य पर दार्शनिक चिंतन।
  23. सूक्त 10.125 (वाक सूक्त): वाणी (वाक्) को देवी के रूप में वर्णित, जो समस्त ज्ञान और सृष्टि की स्रोत है।
  24. सूक्त 10.191 (संगठन सूक्त): “संगच्छध्वं संवदध्वं…” – सामाजिक एकता और सहयोग का आह्वान।

ऋग्वेद महत्त्वपूर्ण वेदिक साहित्य का अहम हिस्सा है और यह हमारी पूर्वजों की सोच और ज्ञान की संग्रहशाला है। इसके मंत्रों में समग्र ब्रह्माण्ड और मनुष्य के सम्बंध पर गहरी चिंतन की जाती है। ऋषियों द्वारा सम्पादित यह विशाल ज्ञान का सागर हमें धार्मिक और आध्यात्मिक दिशा में प्रेरित करता है। ऋग्वेद एक आदर्शवादी विचारधारा की प्रतिष्ठित प्रतीक है और हमें सत्य, ज्ञान और धर्म की महत्ता को स्वीकार करने के लिए प्रोत्साहित करता है। इसके व्याख्यान और अध्ययन से हमें ज्ञान का उद्गम होता है और हम अपने जीवन को धार्मिकता, न्यायपूर्णता, प्रेम और सद्व्यवहार के मार्ग पर चलाने के लिए प्रेरित होते हैं।


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