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Reading: दीनबन्धो कृपासिन्धो कृपाबिन्दू दो प्रभो
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भजनविष्णु भजन

दीनबन्धो कृपासिन्धो कृपाबिन्दू दो प्रभो

Sanatani
Last updated: जनवरी 23, 2026 7:53 अपराह्न
Sanatani
Published: जनवरी 23, 2026
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दीनबन्धो कृपासिन्धो कृपाबिन्दू दो प्रभो – प्रार्थना | Dinabandho Krpasindho Krpaabindo Do Prabho

दीनबन्धो ! कृपासिन्धो ! कृपाबिन्दू दो प्रभो ।

उस कृपाकी बूँदसे फिर बुद्धि ऐसी हो प्रभो ।

वृत्तियाँ द्रुतगामिनी हो जा समावें नाथमें ।

नदी-नद जैसे समाते हैं सभी जलनाथमें ।॥

जिस तरफ देखूँ उधर ही दरस हो श्रीरामका ।

आँख भी मूँदूँ तो दीखै मुखकमल घनश्यामका ।।

आपमे मैं आ मिलूँ प्रभु ! यह मुझे वरदान दो ।

मिलती तरंग समुद्रमे जैसे, मुझे भी स्थानो हो ।।

छूट जावें दुःख सारे, क्षुद्र सीमा दूर हो ।

देतकी दुबिधा मिडै, आनन्दमे भरपूर हो ।।

आनन्द सीमारहित हो, आनन्द पूर्णानन्द हो ।

आनन्द सत आनन्द हो, आनन्द चित आनन्द हो ।।

आनन्दका आनन्द हो, आनन्दमें आनन्द हो ।

आनन्दको आनन्द हो, आनन्द ही आनन्द हो ।।

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